मोदी-पूतिन-शी की नज़दीकी पर अमेरिका की चिंता: क्यों ट्रंप के सलाहकार ने कही ‘मुश्किल’ बात

SCO समिट में दिखी ‘ट्रायो’ की तिकड़ी: अमेरिका को क्यों लगी मिर्ची?
मोदी, पुतिन और शी की साथ में मौजूदगी: एक ग्लोबल स्टेटमेंट-हाल ही में हुई शंघाई सहयोग संगठन (SCO) समिट में जब हमारे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन और चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग एक साथ मंच पर नजर आए, तो दुनिया भर की निगाहें उन पर टिक गईं। यह तस्वीर सिर्फ एक मुलाकात नहीं थी, बल्कि भू-राजनीतिक समीकरणों में एक बड़ा संदेश दे रही थी। इस एकजुटता को देखकर अमेरिका की बेचैनी बढ़ गई। अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के एक खास सलाहकार, पीटर नवारो, ने तो इसे “चिंताजनक” तक कह दिया। उनका मानना था कि भारत जैसे बड़े लोकतंत्र को रूस और चीन जैसे सत्तावादी नेताओं के साथ खड़े होने के बजाय अमेरिका, यूरोप और यूक्रेन के साथ रहना चाहिए। यह बयान ऐसे समय आया है जब भारत और अमेरिका के रिश्ते पहले से ही कुछ तनावपूर्ण चल रहे हैं, जिससे यह मुलाकात और भी अहम हो जाती है।
व्हाइट हाउस की तीखी प्रतिक्रिया: ‘यह समझ से परे है’-नवारो ने तो व्हाइट हाउस में पत्रकारों से बात करते हुए यहाँ तक कह दिया कि यह “परेशान करने वाला, वाकई परेशान करने वाला” है। उनका कहना था कि दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र का मुखिया, पुतिन और शी जैसे तानाशाहों के साथ खड़ा हो, यह बात समझ से परे है। उन्होंने भारत और चीन के बीच दशकों से चले आ रहे सीमा विवाद और कई बार युद्ध जैसे हालात बनने का भी ज़िक्र किया। उनके मुताबिक, मोदी का चीन और रूस की ओर झुकाव अमेरिका के लिए “निराशाजनक” है। नवारो की यह राय सीधे तौर पर भारत की विदेश और ऊर्जा नीति पर सवाल उठाती है, खासकर तब जब भारत रूस से तेल खरीद रहा है।
भारत-अमेरिका रिश्तों में तनाव का नया दौर: टैरिफ का खेल-यह पूरा मामला ऐसे समय में सामने आया है जब भारत और अमेरिका के रिश्ते पिछले करीब बीस सालों में सबसे नाजुक दौर से गुजर रहे हैं। ट्रंप प्रशासन लगातार भारत पर दबाव बनाने की कोशिश कर रहा है। उन्होंने भारत से आने वाले कुछ उत्पादों पर 25% का टैरिफ लगा दिया है। इसके अलावा, रूस से तेल खरीदने पर भी 25% अतिरिक्त शुल्क लगा दिया गया है, जिससे कुल शुल्क 50% तक पहुँच गया है। यह दुनिया में सबसे ज़्यादा है। अमेरिका का यह कदम भारत के लिए एक बड़ी चुनौती है, जिसे भारत ने “अनुचित और अव्यवहारिक” बताया है। अमेरिका की सबसे बड़ी शिकायत यही है कि भारत रूस से लगातार कच्चा तेल खरीद रहा है, जिस पर पश्चिमी देशों ने प्रतिबंध लगा रखे हैं।
भारत का स्टैंड: राष्ट्रीय हित सर्वोपरि, ऊर्जा सुरक्षा ज़रूरी-अमेरिका की इन आपत्तियों के बावजूद, भारत ने अपना रुख स्पष्ट कर दिया है। भारत का कहना है कि उसकी ऊर्जा से जुड़ी ज़रूरतें उसके राष्ट्रीय हित और बाज़ार की मौजूदा स्थिति के आधार पर तय होती हैं। भारत को जहाँ से भी सस्ता और भरोसेमंद तेल मिलेगा, वह वहीं से खरीदेगा। पश्चिमी देशों द्वारा रूस पर प्रतिबंध लगाने के बाद, रूस भारत के लिए तेल का सबसे बड़ा सप्लायर बन गया है। पिछले कुछ महीनों में रूस, भारत का सबसे बड़ा ऊर्जा साझेदार बन चुका है। भारत का मानना है कि किसी भी देश की अर्थव्यवस्था और आम नागरिकों के लिए ऊर्जा सुरक्षा सबसे महत्वपूर्ण होती है। ऐसे में, वह केवल अमेरिका की नाराज़गी की वजह से अपनी नीतियों में बदलाव नहीं कर सकता।



