खारंग जलाशय लबालब, फिर भी सूखे जैसे हालात – किसानों की फसल पर संकट

बांध में पानी, खेतों में सूखा: ये कैसी सिंचाई व्यवस्था?
योजनाएं कागजों पर, किसान प्यासे: खारंग जलाशय की कहानी-ज़रा सोचिए, एक तरफ खारंग जलाशय लबालब भरा हो, जैसे अगस्त में हुआ था, और जल संसाधन विभाग बड़े गर्व से कहे कि जिले के 212 गांवों की प्यास बुझेगी, नहरों में पानी ही पानी होगा। विभाग ने तो बाकायदा 150 क्यूसेक पानी हर मिनट छोड़ने का ऐलान भी कर दिया था। लेकिन ज़मीनी हकीकत बिल्कुल अलग है। मस्तूरी ब्लॉक के लगभग दो दर्जन गांवों में आज भी किसान अपने सूखे खेतों को देखकर मायूस हैं और बस आसमान की ओर उम्मीद भरी नज़रों से देख रहे हैं।
पानी छोड़ने का ऐलान, पर खेतों तक पहुंचा ही नहीं!-विभाग ने पानी छोड़ने की घोषणा तो बड़े धूम-धड़ाके से की थी, पर हुआ क्या? एक पखवाड़ा बीत जाने के बाद भी कई गांवों में नहरों से पानी का नामोनिशान तक नहीं है। ग्रामीणों का कहना है कि उनके खेतों में अब तक मुश्किल से 40 सेंटीमीटर पानी ही पहुंचा है। सबसे बड़ी दिक्कत यह है कि ऊपरी इलाकों के लोग नहरों से पानी को रोक ले रहे हैं, जिसकी वजह से निचले इलाकों यानी टेल एरिया तक पानी पहुँच ही नहीं पा रहा। किसानों की चिंता जायज़ है, क्योंकि अगर समय पर पानी नहीं मिला तो धान की फसल का भारी नुकसान हो सकता है।
बांध लबालब, फिर भी उम्मीदें अधूरी-यह साल जल संसाधन विभाग के लिए खास था, क्योंकि 10 साल में पहली बार ऐसा हुआ कि किसानों की मांग का इंतज़ार किए बिना ही जुलाई के मध्य में बांध का वेस्टवियर ओवरफ्लो होने लगा, जो अपने आप में एक रिकॉर्ड था। विभाग ने खुद ही पानी छोड़ने का फैसला लिया। लेकिन सवाल यह उठता है कि जब बांध में इतना पानी है, तो वह खेतों तक क्यों नहीं पहुँच पा रहा? किसानों का मानना है कि अगर बारिश कम हुई तो हालात और भी बदतर हो सकते हैं।
दावों की पोल खोलती ज़मीनी हकीकत-विभाग भले ही दावा करे कि किसानों तक पानी पहुँच रहा है और उनकी फसलों को कोई नुकसान नहीं होगा, पर जब गांवों में जाकर हकीकत जानी तो सारे दावे खोखले साबित हुए। कई किसानों ने बताया कि उनके खेतों में इतनी भी नमी नहीं है कि फसल की शुरुआती बढ़वार हो सके। इससे धान की बुवाई और फसल की ग्रोथ दोनों पर बुरा असर पड़ रहा है। यह साफ दिखाता है कि विभाग के सारे वादे और दावे सिर्फ कागजों की शोभा बढ़ा रहे हैं।
किसानों की पुकार, विभाग की बेरुखी-कागजों में तो खारंग जलाशय का पानी पूरे जिले के किसानों तक पहुँच रहा है, पर हकीकत यह है कि खेत अब भी प्यासे हैं। किसान या तो बारिश का इंतज़ार कर रहे हैं या फिर विभाग से किसी चमत्कार की उम्मीद लगाए बैठे हैं। वे जानते हैं कि अगर समय पर पानी नहीं मिला तो उनकी पूरी फसल बर्बाद हो जाएगी और उनकी साल भर की मेहनत पर पानी फिर जाएगा।
कुप्रबंधन ही है असली विलेन-सबसे बड़ा सवाल यही है कि जब जलाशय पूरा भरा है और पानी छोड़ा भी जा रहा है, तो वह खेतों तक क्यों नहीं पहुँच रहा? किसानों और ग्रामीणों का सीधा आरोप है कि सिंचाई विभाग का लचर प्रबंधन और नहरों की ठीक से देखभाल न करना ही इस समस्या की जड़ है। अगर विभाग ने समय रहते इन खामियों को दूर नहीं किया, तो भले ही बांध में पानी भरा हो, खेतों में सूखा ही रहेगा और किसान बर्बादी की कगार पर पहुँच जाएंगे।



