ईरान-अमेरिका टकराव के बीच छुपी असली कहानी: जब रोज़मर्रा का विरोध बन जाता है क्रांति

ईरान में जो कुछ हो रहा है, वह सिर्फ राजनीतिक टकराव या बड़े नेताओं की लड़ाई नहीं है। यह एक गहरी सामाजिक क्रांति है, जो रोज़मर्रा के छोटे-छोटे विरोधों से जन्म ले रही है। इस लेख में हम समझेंगे कि कैसे आम लोग, खासकर महिलाएं, अपने छोटे-छोटे कदमों से एक बड़े बदलाव की नींव रख रहे हैं, और क्यों यह क्रांति नायकों से ज्यादा निरंतरता और हिम्मत की कहानी है।
ईरानी समाज में बदलाव की वो रेखा जो अब पार हो चुकी है-ईरान की महिलाएं और आम लोग लंबे समय से दबाव और पाबंदियों के बीच जी रहे हैं। लेकिन अब जो तस्वीरें बाहर आ रही हैं, वे साफ दिखाती हैं कि समाज ने एक बड़ा मोड़ पार कर लिया है। डर और चुप्पी वाली पुरानी जिंदगी अब वापस नहीं आने वाली। यह बदलाव गहरा और स्थायी है, जो शासन के लिए बड़ी चुनौती बन चुका है।
बाहरी दखल और इतिहास के पुराने ज़ख्म-अमेरिका और पश्चिमी देशों का दबाव ईरान की राजनीति में नया मोड़ ला सकता है, लेकिन इतिहास बताता है कि बाहरी हस्तक्षेप से क्रांतियों के घाव गहरे होते हैं। 1979 की क्रांति के बाद भी देश की दिशा पूरी तरह बदल गई थी। आज भी वही पुरानी कहानी दोहराई जा रही है, जहां बाहरी ताकतें अंदरूनी बदलावों को प्रभावित करती हैं, लेकिन साथ ही नए संघर्ष भी जन्म लेते हैं।
कट्टरता की जगह नई लड़ाई-1979 के बाद धार्मिक कट्टरता ने सत्ता पर कब्जा कर लिया था। पुराने ढांचे को तोड़ने के बाद नए सख्त नियम बने। लेकिन आज का विरोध इससे कहीं ज्यादा गहरा है। यह सिर्फ सत्ता के खिलाफ नहीं, बल्कि उस पूरी सोच के खिलाफ है जो आज्ञाकारिता को मजबूरी मानती है। इस बार लोग पीछे हटने को तैयार नहीं हैं।
पहले आंदोलनों से अलग, गहरा और व्यापक विरोध-1999 के छात्र आंदोलन, 2009 के ग्रीन मूवमेंट या 2019 के ईंधन विरोध से यह लहर बिल्कुल अलग है। यह विरोध अब सिर्फ कुछ सुधारों की मांग नहीं, बल्कि सत्ता की वैधता पर सवाल है। लोग अब सत्ता के प्रति आज्ञाकारी नहीं रहना चाहते। यह दरार किसी भी व्यवस्था की नींव हिला सकती है।
विरोध की धुरी: ईरानी महिलाएं-इस पूरे आंदोलन की असली ताकत ईरानी महिलाएं हैं। दशकों तक राज्य ने महिलाओं के शरीर और पहनावे को नियंत्रण का जरिया बनाया। अनिवार्य हिजाब और नैतिकता पुलिस ने उनकी जिंदगी पर पहरा रखा। आज वही महिलाएं रोज़मर्रा की जिंदगी में खड़ी होकर सत्ता को चुनौती दे रही हैं, जो बदलाव की सबसे बड़ी वजह है।
रोज़मर्रा की जिंदगी बनाम सत्ता का नियंत्रण-समाजशास्त्री आसेफ बायात के अनुसार, सत्ता बड़े आदेशों से नहीं, बल्कि रोज़मर्रा के छोटे-छोटे दबावों से चलती है। लेकिन आज वही रोज़मर्रा के छोटे-छोटे विरोध शासन की वैधता को कमजोर कर रहे हैं। यह कोई अचानक हुई घटना नहीं, बल्कि धीरे-धीरे बढ़ती हुई चिंगारी है जो अंदर से जल रही है।
निजी फैसले अब राजनीतिक बयान बन गए हैं-हिजाब उतारना, बाल काटना या खुले में नाचना जैसे काम अब निजी नहीं रहे। जब निजी जिंदगी को राष्ट्रीय मुद्दा बना दिया जाता है, तो हर छोटा कदम सत्ता के लिए चुनौती बन जाता है। इसलिए ये छोटे-छोटे काम आज सबसे बड़े राजनीतिक बयान बन गए हैं।
फूको की सोच और आज का ईरान-दार्शनिक मिशेल फूको ने कहा था कि आध्यात्मिक राजनीति टेक्नोक्रेटिक राज्य के खिलाफ लोगों को जोड़ सकती है। लेकिन जब आध्यात्मिक सत्ता संस्थान बन जाती है, तो वह खुद दमनकारी हो जाती है। आज का ईरान उसी निरंकुशता के खिलाफ खड़ा है, जो थकी हुई और कठोर है।
इतिहास जीत की गारंटी नहीं देता-ईरानी शासन के पास अभी भी हिंसा के साधन हैं। इतिहास में कई बार नैतिक सच्चाई हार गई है। पेरिस कम्यून कुचल दी गई थी, अरब स्प्रिंग गृहयुद्ध में बदल गया। इसलिए यह लड़ाई भी जोखिमों से भरी है, और जीत की कोई गारंटी नहीं।
1979 की क्रांति का सच जो कम बताया गया-1979 की क्रांति को अक्सर एक रोमांटिक जीत के रूप में देखा जाता है, लेकिन उसने भी अपनी विविध आवाज़ों को दबा दिया। पश्चिम-विरोधी सोच ने सख्त धार्मिक सत्तावाद को जन्म दिया, जो आज भी ईरान की राजनीति में गहराई से मौजूद है।
क्रांति: एक दिन की घटना नहीं, लंबी प्रक्रिया है-इतिहासकार चार्ल्स टिली के अनुसार, क्रांति कोई एक दिन की घटना नहीं, बल्कि राज्य और जनता के बीच लंबा संघर्ष होती है। इस नजरिए से देखें तो ईरान पहले से ही एक क्रांतिकारी दौर में है, चाहे सत्ता औपचारिक रूप से बनी रहे या बदले।
शासन जिंदा है, लेकिन जनता का भरोसा खो चुका है-संस्थाएं चल सकती हैं, लेकिन भरोसा लौटाना मुश्किल होता है। खासकर महिलाओं का भरोसा ईरानी शासन ने खो दिया है। डर अब सिर्फ जनता में नहीं, सत्ता में भी है। राज्य खुद अपनी जनता से आशंकित हो गया है।
प्रतीकों का टूटना: सबसे बड़ा संकेत-जब बिना हिजाब की किशोरियां सुरक्षाबलों के सामने नारे लगाती हैं, तो सत्ता का प्रतीकात्मक ढांचा दरकता है। हिजाब जलते हैं, बाल काटे जाते हैं, तस्वीरों का अपमान होता है। ईरान की युवा आबादी के लिए ये पाबंदियां उनकी जिंदगी की हकीकत हैं।
बिना चेहरे वाला विद्रोह, जिसे रोकना मुश्किल-यह कोई एक नेता या घोषणापत्र वाला आंदोलन नहीं है। इसका कोई एक चेहरा नहीं है। यही बात शासन और विदेशी विश्लेषकों दोनों को परेशान करती है। जिसे पकड़ना मुश्किल हो, उसे खत्म करना भी आसान नहीं होता।
होरिजोंटल ताकत: इस आंदोलन की असली शक्ति-यह बिखरा हुआ और फैला हुआ आंदोलन ही इसकी ताकत है। जेम्स सी. स्कॉट के अनुसार, जब अवज्ञा आम हो जाती है, तब सत्ता सबसे कमजोर होती है। ईरान में अवज्ञा अब रोज़मर्रा का हिस्सा बन चुकी है, और शासन का नैतिक आधार टूट चुका है।
इतिहास नायकों से नहीं, निरंतरता से बदलता है-ईरानी महिलाएं, जिन्हें लंबे समय तक हाशिए पर रखा गया, अब केंद्र में हैं। उन्होंने आदेश मानने से इनकार कर दिया है। यही वह सच्चाई है कि इतिहास किसी एक नायक से नहीं, बल्कि लगातार चलते प्रतिरोध से बदलता है।



