ताशकंद समझौते पर मंडरा रहा है खतरा, जानिए भारत-पाकिस्तान में किसे होगा फायदा?

पहलागाम हमला: भारत की कड़ी कार्रवाई से भड़का पाकिस्तान, ताशकंद समझौता भी खतरे में जम्मू-कश्मीर के पहलगाम में हुए आतंकी हमले के बाद भारत और पाकिस्तान के रिश्तों में फिर से जबरदस्त तनाव आ गया है। भारत ने इस हमले के बाद एक के बाद एक सख्त कदम उठाए हैं। सबसे पहले तो भारत ने पाकिस्तान के साथ हुई सिंधु जल संधि को फिलहाल रोक दिया है। इसके साथ ही पाकिस्तानी सैन्य राजनयिकों की संख्या घटा दी गई है और वाघा-अटारी बॉर्डर को भी बंद कर दिया गया है। भारत की इन कार्रवाइयों से पाकिस्तान घबरा गया है। इसी घबराहट में उसने गुरुवार को 1972 के शिमला समझौते को खत्म करने की धमकी दे दी। ये वही समझौता है जो 1971 की भारत-पाक लड़ाई के बाद हुआ था और जिसमें दोनों देशों ने नियंत्रण रेखा (LoC) को स्थायी सीमा की तरह मानने पर सहमति जताई थी। अब ये भी कहा जा रहा है कि पाकिस्तान 1966 के ताशकंद समझौते को भी खत्म कर सकता है। अब सवाल ये उठता है कि ताशकंद समझौता आखिर है क्या? और अगर पाकिस्तान इसे खत्म करता है, तो इसका भारत पर क्या असर पड़ेगा – फायदा होगा या नुकसान? क्या है ताशकंद समझौता? भारत और पाकिस्तान के बीच ताशकंद समझौता 10 जनवरी 1966 को हुआ था। दोनों देशों के नेताओं ने उस वक्त के सोवियत संघ की पहल पर उज्बेकिस्तान की राजधानी ताशकंद में इस समझौते पर दस्तखत किए थे। उस समय भारत के प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री थे और पाकिस्तान के राष्ट्रपति अयूब खान। इस समझौते का मकसद था – 1965 की जंग को खत्म करना।
इस समझौते की ज़रूरत क्यों पड़ी? भारत और पाकिस्तान के बीच रिश्तों में उस वक्त काफी तनाव था। ऐसे में इस समझौते के जरिए दोनों देशों को बातचीत के रास्ते पर लाना, आपसी विवादों को शांति से सुलझाना और सेनाओं को अपनी-अपनी पुरानी जगहों पर लौटाना इस समझौते का मुख्य मकसद था। इसमें ये भी तय हुआ था कि दोनों देश एक-दूसरे के अंदरूनी मामलों में दखल नहीं देंगे, एक-दूसरे के खिलाफ झूठी बातें फैलाना बंद करेंगे और राजनयिक रिश्ते सामान्य बनाएंगे। ताशकंद समझौते की खास बातें: इस समझौते की बुनियाद शांति और सहयोग पर रखी गई थी। दोनों देश आपस में बेहतर रिश्ते बनाने के लिए कदम उठाएंगे। विवादों को बातचीत से सुलझाने की कोशिश करेंगे। व्यापार और सांस्कृतिक आदान-प्रदान को फिर से शुरू करेंगे। युद्धबंदियों की रिहाई, शरणार्थियों और अवैध प्रवासियों के मुद्दों पर चर्चा और आपसी हितों के लिए संयुक्त समिति बनाने की बात भी इसमें शामिल थी। इस समझौते के बाद क्या हुआ था? ताशकंद समझौते पर दस्तखत के ठीक अगले दिन प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री की रहस्यमयी मौत हो गई थी, जिससे इस समझौते को लेकर कई तरह की बातें कही गईं। कुछ लोगों ने इसे शास्त्री जी की मौत की वजह तक बता दिया। कहा जाता है कि रात को साढ़े नौ बजे अयूब खान से उनकी मुलाकात हुई थी, जिसके बाद यह हादसा हुआ। ताशकंद समझौते की आलोचना क्यों हुई? भारत में इस समझौते की काफी आलोचना हुई थी, खासकर रणनीतिक इलाकों को पाकिस्तान को लौटाने के फैसले को लेकर। स्वतंत्रता सेनानी और तत्कालीन केंद्रीय मंत्री महावीर त्यागी ने तो इसे सीधी-सीधी रणनीतिक गलती बताया था।
अब क्या होगा अगर पाकिस्तान इसे खत्म करता है? पहलगाम हमले के बाद भारत की सख्त कार्रवाई से बौखलाए पाकिस्तान ने शिमला समझौते को रद्द करने की धमकी दी है, और अब ताशकंद समझौते को लेकर भी अटकलें तेज हो गई हैं। याद रखना चाहिए कि शिमला और ताशकंद समझौते ही भारत-पाक रिश्तों की नींव रहे हैं, जिनका मकसद आपसी शांति और कश्मीर जैसे मुद्दों को द्विपक्षीय तरीके से सुलझाना रहा है। अगर पाकिस्तान ताशकंद समझौते को रद्द करता है, तो इससे भारत को नुकसान भी हो सकता है और कुछ फायदे भी। भारत को क्या हो सकता है फायदा? भारत नियंत्रण रेखा पर ज्यादा लचीलापन दिखा पाएगा। कश्मीर मुद्दे पर भारत का पक्ष और मजबूत हो सकता है। पाकिस्तान पर आर्थिक और जल संसाधनों को लेकर दबाव बढ़ाया जा सकता है। पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर में भारत अपनी सैन्य रणनीति में बदलाव कर सकता है। वैश्विक मंचों पर पाकिस्तान को अलग-थलग करने का मौका भारत को मिल सकता है। क्या होंगे जोखिम? क्षेत्र में सैन्य तनाव बढ़ सकता है। किसी भी छोटी चिंगारी से बड़ा संघर्ष हो सकता है। लेकिन वहीं, यह भारत को दक्षिण एशिया में अपना नेतृत्व साबित करने का भी एक मौका देगा। अगर भारत अपने पड़ोसी देशों से रिश्ते मजबूत करता है और शांति के लिए अपनी प्रतिबद्धता दिखाता है, तो इससे उसकी छवि और पकड़ और भी मजबूत हो सकती है। पाकिस्तान अगर ताशकंद समझौते को रद्द करता है, तो इससे उसकी अंतरराष्ट्रीय साख पर भी असर पड़ेगा। खासकर रूस जैसे देशों के साथ उसके रिश्ते कमजोर हो सकते हैं, क्योंकि उस समय सोवियत संघ (अब रूस) ने ही इस समझौते में मध्यस्थ की भूमिका निभाई थी। भारत इस मौके को भुना सकता है और पाकिस्तान को अंतरराष्ट्रीय मंचों पर और भी अलग-थलग कर सकता है.



