मिडिल ईस्ट संघर्ष का भारत की अर्थव्यवस्था पर असर: क्या है सच?

मिडिल ईस्ट में बढ़ रहे संघर्ष का असर सिर्फ उस क्षेत्र तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका प्रभाव पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था पर पड़ सकता है। भारत भी इससे अछूता नहीं रहेगा। हालांकि विशेषज्ञों का मानना है कि यह असर फिलहाल अल्पकालिक होगा और भारत की लंबी अवधि की आर्थिक विकास गति पर ज्यादा असर नहीं पड़ेगा। इस लेख में हम विस्तार से समझेंगे कि मिडिल ईस्ट संघर्ष का भारत की अर्थव्यवस्था पर क्या प्रभाव हो सकता है और सरकार तथा रिजर्व बैंक को किन नीतियों के जरिए इसका सामना करना चाहिए।
मिडिल ईस्ट संघर्ष से भारत को किन चुनौतियों का सामना करना पड़ सकता है?-मिडिल ईस्ट में तनाव बढ़ने से भारत की अर्थव्यवस्था को कई तरह की अल्पकालिक चुनौतियों का सामना करना पड़ सकता है। सबसे पहले तेल की कीमतों में बढ़ोतरी हो सकती है, क्योंकि यह क्षेत्र विश्व के प्रमुख तेल उत्पादक देशों में से एक है। इसके अलावा, वहां काम कर रहे भारतीयों से आने वाली रेमिटेंस यानी पैसे की आवक में भी रुकावट आ सकती है। साथ ही, भारतीय निर्यात पर भी असर पड़ सकता है, जो उस क्षेत्र में जाता है। इन सबका मिलाजुला प्रभाव भारत की आर्थिक गतिविधियों को अस्थिर कर सकता है।
तेल की कीमतों और वैश्विक आर्थिक स्थिरता पर नजर-अमेरिका और इजराइल के बीच सैन्य कार्रवाई के कारण कच्चे तेल की कीमतें बढ़ने की संभावना है। हालांकि, विशेषज्ञों का मानना है कि वैश्विक हितों को देखते हुए यह संकट ज्यादा लंबे समय तक नहीं चलेगा। अगर यह तनाव जल्दी खत्म हो जाता है, तो तेल की कीमतों में संतुलन आ सकता है और वैश्विक बाजारों में स्थिरता लौट सकती है। इससे भारत जैसी उभरती अर्थव्यवस्थाओं को राहत मिलेगी और आर्थिक विकास की राह आसान होगी।
तेल आपूर्ति में विविधता से जोखिम कम होगा-भारत के लिए यह जरूरी है कि वह तेल की आपूर्ति के लिए विविध स्रोतों को अपनाए। विशेषज्ञों के अनुसार, अगर भारत वेनेजुएला जैसे देशों से तेल खरीदना शुरू करता है, तो यह एक सकारात्मक कदम होगा। इसके साथ ही, अगर मिडिल ईस्ट संकट जल्दी खत्म हो जाता है और ईरान पर लगे प्रतिबंध हट जाते हैं, तो भारत को सस्ता तेल मिलने की संभावना बढ़ जाएगी। इससे देश की ऊर्जा लागत कम होगी और आर्थिक विकास को मजबूती मिलेगी।
महंगाई पर फिलहाल नियंत्रण बना हुआ है-भले ही भू-राजनीतिक तनाव बढ़ा हो, लेकिन महंगाई के मामले में फिलहाल स्थिति संतुलित बनी हुई है। दिसंबर 2025 में उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (CPI) महज 1.3 प्रतिशत था। विशेषज्ञों का अनुमान है कि वित्त वर्ष 2026 में महंगाई लगभग 2.5 प्रतिशत के आसपास रहेगी। फिलहाल महंगाई में तेज बढ़ोतरी या ओवरहीटिंग के कोई संकेत नहीं दिख रहे हैं, जो अर्थव्यवस्था के लिए एक सकारात्मक संकेत है।
भारत के लिए “गोल्डीलॉक्स” स्थिति का अवसर-मौजूदा समय में भारत की अर्थव्यवस्था के लिए एक खास अवसर बन रहा है, जिसे अर्थशास्त्र में “गोल्डीलॉक्स जोन” कहा जाता है। इस स्थिति में अर्थव्यवस्था न तो बहुत धीमी होती है और न ही बहुत ज्यादा गर्म। यानी विकास की गति अच्छी होती है और महंगाई भी नियंत्रण में रहती है। अगर मिडिल ईस्ट संकट ज्यादा लंबा नहीं चलता, तो भारत इस अनुकूल स्थिति का फायदा लंबे समय तक उठा सकता है।
7 से 8 प्रतिशत की जीडीपी ग्रोथ की दिशा में भारत-विशेषज्ञों का मानना है कि भारत के पास अपनी आर्थिक विकास दर को करीब 7 प्रतिशत से बढ़ाकर लगभग 8 प्रतिशत तक पहुंचाने का मौका है। इसके लिए मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर को मजबूत करना और सर्विस सेक्टर की तेजी को बनाए रखना जरूरी होगा। इससे रोजगार के बेहतर अवसर पैदा होंगे, लोगों की आय बढ़ेगी और देश में स्थायी समृद्धि का रास्ता खुलेगा।
सरकार और आरबीआई के बीच समन्वय की जरूरत-आगे बढ़ने के लिए सरकार की राजकोषीय नीतियों और भारतीय रिजर्व बैंक की मौद्रिक नीतियों को मिलकर काम करना होगा। तभी भारत की अर्थव्यवस्था को ऊंची विकास दर की ओर ले जाना संभव होगा। मजबूत मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर और तेज आर्थिक विकास से देश में बड़े पैमाने पर रोजगार पैदा होंगे और आर्थिक समृद्धि लंबे समय तक कायम रहेगी।
मिडिल ईस्ट संघर्ष का असर भारत की अर्थव्यवस्था पर जरूर पड़ेगा, लेकिन यह प्रभाव फिलहाल सीमित और अल्पकालिक रहेगा। सही नीतिगत कदमों और वैश्विक हालात के अनुकूल भारत अपनी विकास गति को बनाए रख सकता है। सरकार और आरबीआई के समन्वय से भारत 7-8 प्रतिशत की विकास दर तक पहुंचने का सपना साकार कर सकता है, जिससे देश की आर्थिक समृद्धि और स्थिरता सुनिश्चित होगी।



