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Chhattisgarh

25 लाख की ईनामी नक्सली सुजाता ने किया सरेंडर, 43 साल बाद हथियार छोड़े

43 साल का नक्सल सफर खत्म: 25 लाख की इनामी महिला नक्सली ने किया सरेंडर!

एक युग का अंत: सुजाता का मुख्यधारा में वापसी का फैसला-कभी नक्सलबाड़ी की आग में तपकर निकली पोथुला पद्मावती, जिन्हें दुनिया सुजाता के नाम से जानती है, ने आखिरकार 43 साल के उग्रवादी जीवन को अलविदा कह दिया है। 62 साल की उम्र में, उन्होंने तेलंगाना पुलिस के सामने आत्मसमर्पण कर दिया। दंडकारण्य स्पेशल जोनल कमेटी जैसे महत्वपूर्ण संगठन में कई बड़े पदों पर रहने वाली सुजाता, अपने पति, शीर्ष माओवादी नेता किशनजी, जिनकी 2011 में मुठभेड़ में मौत हो गई थी, के नक्शेकदम पर चलती रहीं। उनका यह फैसला न केवल व्यक्तिगत जीवन में एक नया अध्याय शुरू करने की ओर इशारा करता है, बल्कि नक्सल आंदोलन के लिए एक बड़ा झटका भी माना जा रहा है।

किशनजी की पत्नी: एक कद्दावर नक्सली नेता का सफर-सुजाता की पहचान सिर्फ एक नक्सली के तौर पर नहीं, बल्कि कुख्यात माओवादी नेता किशनजी की पत्नी के रूप में भी रही है। किशनजी, जो खुद एक बड़े कैडर के नेता थे, की मृत्यु के बाद भी सुजाता ने संगठन के भीतर अपनी सक्रियता बनाए रखी। वह केंद्रीय समिति की सदस्य के रूप में संगठन की गतिविधियों में गहराई से जुड़ी रहीं। उन पर 25 लाख रुपये का भारी इनाम भी घोषित था, जो उनके कद और संगठन में उनकी अहमियत को दर्शाता है। उनका यह लंबा और खूनी सफर अब थम गया है, जिसने कई सवाल खड़े कर दिए हैं।

पुलिस के सामने आत्मसमर्पण: एक नई सुबह की ओर-जोगुलम्बा गडवाल जिले के पेंचिकाल्पाडु गांव की रहने वाली सुजाता ने तेलंगाना के पुलिस महानिदेशक की उपस्थिति में विधिवत रूप से आत्मसमर्पण किया। यह घटनाक्रम कई मायनों में महत्वपूर्ण है। पुलिस अधिकारियों का मानना है कि सुजाता जैसे वरिष्ठ और अनुभवी कैडर का आत्मसमर्पण, नक्सली संगठन के मनोबल को तोड़ने और उनकी गतिविधियों को कमजोर करने में मील का पत्थर साबित होगा। यह उनके लिए एक बड़ा संगठनात्मक और रणनीतिक नुकसान है, जिससे संगठन की कमर टूटने की उम्मीद है।

समाज की ओर वापसी: शांति और सकारात्मक योगदान की चाह-आत्मसमर्पण के समय सुजाता ने अपनी मंशा स्पष्ट कर दी। उन्होंने कहा कि अब वह बंदूक छोड़कर समाज की मुख्यधारा में लौटना चाहती हैं और देश के विकास में सकारात्मक योगदान देना चाहती हैं। हथियार और हिंसा का रास्ता छोड़कर एक सामान्य जीवन जीने की उनकी इच्छा, एक नई शुरुआत का प्रतीक है। पुलिस अधिकारियों का यह भी मानना है कि उनके इस कदम से अन्य नक्सलियों पर भी आत्मसमर्पण का दबाव बढ़ेगा और नक्सलवाद को जड़ से उखाड़ने में मदद मिलेगी। यह एक ऐसे सफर का अंत है जिसने कई जिंदगियों को प्रभावित किया।

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