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Chhattisgarh

भारतमाला प्रोजेक्ट में करोड़ों का खेल! फरार अफसरों के चलते रुक गई जांच

छत्तीसगढ़ का भारतमाला घोटाला: क्या है पूरा मामला?-छत्तीसगढ़ में भारतमाला प्रोजेक्ट से जुड़े एक बड़े घोटाले ने राज्य को हिलाकर रख दिया है। कई बड़े अफ़सरों के नाम सामने आने के बावजूद, वे फरार हैं और इस वजह से जांच में बहुत परेशानी आ रही है। आर्थिक अपराध अन्वेषण शाखा (EOW) ने केस दर्ज कर लिया है, लेकिन अभी तक कोई बड़ी सफलता नहीं मिली है।

कौन हैं फरार अफ़सर?-इस घोटाले में अभनपुर तहसील के तत्कालीन एसडीएम निर्भय साहू, तहसीलदार शशिकांत कर्रे, राजस्व निरीक्षक रोशनलाल वर्मा और पटवारी दिनेश पटेल, और गोबरानवापारा के तत्कालीन नायब तहसीलदार लखेश्वर प्रसाद किरण, पटवारी जीतेंद्र लहरे, बसंती घृतलहरे और लेखराम पटेल जैसे कई अफ़सर शामिल हैं, जो अभी तक फरार हैं। इनके फरार होने की वजह से पूरे मामले की तह तक पहुँचना मुश्किल हो रहा है। पहले ही कुछ लोगों को गिरफ़्तार किया जा चुका है, लेकिन असली मास्टरमाइंड अभी भी पुलिस की पकड़ से बाहर हैं। जांच एजेंसियां इन फरार अफ़सरों की तलाश में जुटी हुई हैं ताकि इस घोटाले की जड़ तक पहुँचा जा सके।

 क्या NHAI से लीक हुआ था प्रोजेक्ट का नक्शा?-इस घोटाले का सबसे बड़ा सवाल है कि क्या भारतमाला प्रोजेक्ट का नक्शा नेशनल हाईवे अथॉरिटी ऑफ इंडिया (NHAI) से लीक हुआ था? अगर नक्शा लीक हुआ है, तो यह कैसे हुआ और इसमें किन-किन लोगों की मिलीभगत थी, ये जानना बहुत ज़रूरी है। कई लोगों का मानना है कि मुआवजा पाने के लिए जमीन को पहले ही छोटे-छोटे टुकड़ों में बांट दिया गया था, ताकि एक ही जमीन पर कई लोगों को मुआवजा मिल सके। ऐसा तभी संभव है जब नक्शा पहले ही लीक हो चुका हो। इससे साफ़ है कि इस घोटाले की साज़िश बहुत पहले से रची गई थी।

 नक्शा लीक होते ही शुरू हो गया था खेल-भारतमाला प्रोजेक्ट की अधिसूचना जारी होते ही कुछ किसानों ने अपनी जमीन को पिछली तारीख में छोटे-छोटे टुकड़ों में बांट दिया। ये टुकड़े उनके रिश्तेदारों या परिवार के अन्य सदस्यों के नाम कर दिए गए ताकि एक ही जमीन पर कई लोगों को मुआवजा मिल सके। जांच में पता चला है कि जमीन के टुकड़े बैक डेट में किए गए थे, जिससे मुआवजे की रकम कई गुना बढ़ गई। इससे साफ़ है कि नक्शा लीक होने के बाद ही इस घोटाले को अंजाम दिया गया।

 क्या किसानों की भी थी मिलीभगत?-जांच में ये भी पता चला है कि जिन किसानों को मुआवजा मिला, उनके खातों से लाखों-करोड़ों रुपये निकाल लिए गए। अब सवाल ये है कि ये पैसे किसने निकाले? क्या किसानों ने खुद निकाले या किसी और ने? अगर किसानों की जानकारी के बिना पैसा निकला है, तो ये और भी गंभीर मामला है।

14 और नए नाम जांच के घेरे में- अब तक की जांच में 14 और नए संदिग्धों के नाम सामने आए हैं, जिनमें जमीन दलाल से लेकर राजस्व विभाग के कर्मचारी और अफ़सर तक शामिल हैं। ईओडब्ल्यू और एसीबी इनसे पूछताछ करने की तैयारी में हैं।

48 करोड़ का घोटाला, लेकिन आंकड़ा बढ़ सकता है- अभी तक करीब 48 करोड़ रुपये का घोटाला सामने आया है, लेकिन जानकारों का मानना है कि ये रकम सिर्फ़ शुरुआत है। अगर दूसरे जिलों में भी इसी तरह की गड़बड़ी हुई है, तो घोटाले की रकम कई गुना बढ़ सकती है।

 क्या रायपुर पैटर्न की कॉपी हो रही थी दूसरे जिलों में?- शक है कि रायपुर में जो तरीका अपनाया गया, वही दूसरे जिलों में भी इस्तेमाल किया गया। जैसे ही जमीन अधिग्रहण की जानकारी मिली, भू-माफ़िया और जमीन कारोबारियों ने पटवारी, आरआई और राजस्व अफ़सरों से मिलकर जमीन कम दाम में खरीदी और फिर उसे टुकड़ों में बांटकर मोटा मुनाफ़ा कमाया। अगर ये सच है, तो ये मामला सिर्फ़ घोटाले का नहीं, बल्कि सुनियोजित लूट का है।

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