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सोनिया गांधी की एंट्री से बिहार में महागठबंधन की सीट बंटवारे की गुत्थी सुलझी

बिहार में महागठबंधन का तालमेल: कांग्रेस-आरजेडी में कैसे सुलझी सीटों की गुत्थी?

 सोनिया गांधी का पटना में जलवा: क्या बदल गई कांग्रेस की किस्मत?-बिहार की सियासत में इन दिनों कांग्रेस और आरजेडी के बीच सीट बंटवारे को लेकर काफी गहमागहमी थी। आरजेडी की तरफ से यह साफ संकेत मिल रहे थे कि वे तेजस्वी यादव को ही मुख्यमंत्री के चेहरे के तौर पर आगे बढ़ाना चाहते हैं, लेकिन कांग्रेस इस बात पर पूरी तरह सहमत नहीं थी। इस अनिश्चितता के माहौल में, तेजस्वी यादव ने अपनी ‘समाधान यात्रा’ शुरू कर दी और यह भी इशारा कर दिया कि वे सभी 243 सीटों पर चुनाव लड़ने के लिए तैयार हैं। पर अब लग रहा है कि पर्दे के पीछे हुई बातचीत से दोनों पार्टियों के बीच सब ठीक हो गया है।

 सीटों का फाइनल फॉर्मूला: कांग्रेस को मिलीं 58, आरजेडी लड़ेगी 130 सीटों पर!-शुरुआत में कांग्रेस 70 सीटों पर चुनाव लड़ने की अपनी मांग पर अड़ी हुई थी, वहीं आरजेडी 144 सीटों से कम पर मानने को तैयार नहीं थी। लेकिन, अब एक समझौते के तहत कांग्रेस 58 सीटों पर चुनाव लड़ने के लिए राज़ी हो गई है, जबकि आरजेडी 130 सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारेगी। खास बात यह है कि सीपीआई-एमएल को पिछले चुनाव में उनके अच्छे प्रदर्शन को देखते हुए 19 से बढ़ाकर 27 सीटें दी गई हैं। यह नया बंटवारा महागठबंधन के अंदर एकता और तालमेल को मजबूत करने का एक बड़ा कदम है।

छोटे दलों को भी मिला सम्मान: महागठबंधन में सबको साथ लेकर चलने की तैयारी-इस बार महागठबंधन में नए साथियों को भी खास तवज्जो दी गई है। झारखंड मुक्ति मोर्चा (जेएमएम) और पशुपति कुमार पारस की लोक जनशक्ति पार्टी (एलजेपी) को दो-दो सीटें दी जाएंगी। इसके अलावा, सीपीआई को छह, सीपीएम को चार और वीआईपी पार्टी को 14 सीटें मिलने की उम्मीद है। इस तरह, महागठबंधन ने सभी छोटे दलों को साथ लेकर चलने की पूरी कोशिश की है, ताकि बीजेपी और एनडीए के खिलाफ एक मजबूत और एकजुट मोर्चा खड़ा किया जा सके।

 पिछले चुनाव की गलतियों से सीखा सबक: कांग्रेस का घटा दबदबा, सीपीआई-एमएल का बढ़ा कद-साल 2020 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस ने 70 सीटों पर चुनाव लड़ा था, लेकिन जीत सिर्फ 19 सीटों पर ही मिली। वहीं, सीपीआई-एमएल ने 19 में से 12 सीटें जीतकर सबको चौंका दिया था। आरजेडी ने 144 सीटों पर चुनाव लड़कर 75 सीटें जीतीं और राज्य की सबसे बड़ी पार्टी बनी, लेकिन कांग्रेस के कमजोर प्रदर्शन के कारण वे सरकार बनाने से चूक गए। इसी अनुभव को देखते हुए, इस बार सीट बंटवारे में कांग्रेस को अपनी मांग कम करनी पड़ी और सीपीआई-एमएल जैसे दलों का महत्व बढ़ गया।

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