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झारखंड एयर एम्बुलेंस हादसा: एक उड़ान जो कभी मंजिल तक नहीं पहुंची, सात जिंदगियां और कई सपने खत्म

झारखंड के चतरा में एयर एम्बुलेंस हादसा: एक परिवार की जिंदगी से छीन ली सात जानें, दर्द और सवालों का सैलाब
दर्दनाक हादसा जिसने परिवारों की खुशियों को छीन लिया- 23 फरवरी की रात झारखंड के चतरा जिले के कसियातु जंगल में रांची से दिल्ली जा रही एयर एम्बुलेंस दुर्घटनाग्रस्त हो गई। इस हादसे में विमान में सवार सभी सात लोगों की मौके पर ही मौत हो गई। यह हादसा सिर्फ एक दुर्घटना नहीं, बल्कि कई परिवारों के लिए एक गहरा सदमा बन गया है। जिनके सपने, उम्मीदें और जिंदगी के अनमोल पल अचानक खत्म हो गए। इस घटना ने उन परिवारों के दिलों में एक खालीपन छोड़ दिया है, जिसे भर पाना मुश्किल है। हर कोई इस हादसे की वजह जानने और भविष्य में ऐसी त्रासदियों से बचने की उम्मीद कर रहा है।

सह-पायलट सबराजदीप सिंह की आखिरी बात और परिवार का टूटता दिल-इस हादसे की सबसे दिल दहला देने वाली कहानी सह-पायलट सबराजदीप सिंह की है। उड़ान भरने से ठीक पहले उन्होंने अपनी मां को फोन किया था और कहा था कि वे रांची से दिल्ली जा रहे हैं, लैंडिंग के बाद फिर बात करेंगे। मां को यह नहीं पता था कि यह उनकी आखिरी बातचीत होगी। दो घंटे बाद जब परिवार ने उनसे संपर्क करने की कोशिश की, तो फोन बंद मिला। धीरे-धीरे खबरें आने लगीं और कंपनी की ओर से एक ईमेल ने उनके निधन की पुष्टि कर दी। सबराजदीप की शादी को अभी 20 महीने ही हुए थे और उनका तीन महीने का बच्चा है, जो अब पिता के बिना बड़ा होगा। पड़ोसियों के अनुसार, वह मेहनती, विनम्र और जिम्मेदार थे, जिनके पास 300 घंटे से ज्यादा उड़ान का अनुभव था। उनका अधूरा वादा परिवार के लिए एक गहरा दर्द बन गया है।

अनुभवी पायलट और मेडिकल टीम के बावजूद बच नहीं सकी उड़ान-इस एयर एम्बुलेंस के पायलट-इन-कमांड विवेक विकास भगत रांची के रहने वाले एक अनुभवी पायलट थे, जिनके पास 1700 घंटे से ज्यादा उड़ान का अनुभव था। उनके साथ सह-पायलट सबराजदीप सिंह थे, जो टीम के अहम सदस्य थे। दोनों की पेशेवर क्षमता पर कभी कोई सवाल नहीं उठा। एयर एम्बुलेंस उड़ाना सामान्य उड़ानों से ज्यादा चुनौतीपूर्ण होता है क्योंकि मरीज की हालत को ध्यान में रखते हुए तेजी और सावधानी दोनों जरूरी होती हैं। इस टीम में डॉक्टर और पैरामेडिक्स भी थे, जो मरीज की देखभाल कर रहे थे। लेकिन इस बार परिस्थितियां ऐसी बनीं कि अनुभवी टीम भी इस हादसे को नहीं रोक सकी। यह हादसा दिखाता है कि कभी-कभी अनुभव और तैयारी के बावजूद, अचानक आई परिस्थितियां सब कुछ बदल देती हैं।

बेहतर इलाज के लिए कर्ज लेकर दिल्ली जा रहे थे तीन सदस्य, पर लौटे नहीं-यह एयर एम्बुलेंस 41 वर्षीय संजय कुमार को बेहतर इलाज के लिए दिल्ली ले जा रही थी। संजय चंदवा में एक छोटा होटल चलाते थे और होटल में लगी आग में गंभीर रूप से झुलस गए थे। उनका इलाज रांची के अस्पताल में चल रहा था, लेकिन हालत बिगड़ने पर उन्हें दिल्ली रेफर किया गया। परिवार ने बेहतर इलाज की उम्मीद में रिश्तेदारों से उधार लेकर करीब 8 लाख रुपये खर्च किए थे। इस उड़ान में उनके साथ उनकी पत्नी अर्चना देवी और 17 वर्षीय भांजा ध्रुव कुमार भी थे। परिवार को उम्मीद थी कि दिल्ली पहुंचकर इलाज से उनकी जान बच जाएगी, लेकिन किस्मत ने कुछ और ही लिखा था। इस हादसे में तीनों की मौत हो गई और एक ही परिवार के तीन सदस्य हमेशा के लिए चले गए। यह हादसा सिर्फ मौत नहीं, बल्कि एक परिवार की पूरी उम्मीद और भविष्य को खत्म कर देने वाली त्रासदी बन गया।

मरीज की जान बचाने निकले डॉक्टर और पैरामेडिक्स भी नहीं बच सके-इस एयर एम्बुलेंस में मरीज की देखभाल के लिए डॉक्टर विकास कुमार गुप्ता और पैरामेडिक सचिन कुमार मिश्रा भी मौजूद थे। डॉक्टर विकास एक समर्पित और जिम्मेदार डॉक्टर थे, जिनका मकसद मरीज की जान बचाना था। उनके पिता ने बताया कि बेटे को डॉक्टर बनाने के लिए उन्होंने अपनी जमीन तक बेच दी थी। उनके पीछे सात साल का एक छोटा बच्चा है, जो अब अपने पिता का इंतजार कर रहा है। पैरामेडिक सचिन मिश्रा भी मरीज की निगरानी में लगे हुए थे। मेडिकल टीम का काम बहुत चुनौतीपूर्ण होता है, क्योंकि उन्हें हर परिस्थिति में मरीज की जान बचाने के लिए तैयार रहना पड़ता है। लेकिन इस हादसे में मरीज की जान बचाने निकले डॉक्टर और मेडिकल स्टाफ खुद अपनी जान नहीं बचा सके। यह हादसा उन लोगों के बलिदान की कहानी है, जो दूसरों की जान बचाने के लिए अपनी जान जोखिम में डालते हैं।

हादसे का सच: उड़ान के कुछ मिनट बाद टूट गया संपर्क-यह विमान, रेडबर्ड एयरवेज का Beechcraft King Air C90, शाम 7:11 बजे रांची से उड़ान भरी थी। उड़ान के कुछ ही मिनट बाद 7:34 बजे कोलकाता एयर ट्रैफिक कंट्रोल से संपर्क हुआ, लेकिन इसके बाद अचानक संपर्क टूट गया। रडार से विमान गायब हो गया और अधिकारियों को शक हुआ कि कुछ गंभीर हुआ है। शुरुआती जानकारी के अनुसार, खराब मौसम, तेज हवाएं और कम दृश्यता हादसे का कारण हो सकते हैं। विमान सड़क से करीब चार किलोमीटर अंदर घने और दुर्गम जंगल में गिरा, जिससे बचाव कार्य में काफी मुश्किलें आईं। स्थानीय ग्रामीणों ने तेज आवाज और रोशनी देखी, जिसके बाद पुलिस और सुरक्षा बलों को सूचना दी गई। पूरी रात बचाव अभियान चला और शवों को बाहर निकाला गया। यह हादसा दिखाता है कि उड़ान के दौरान मौसम और तकनीकी परिस्थितियां कितनी खतरनाक हो सकती हैं।

जांच शुरू, लेकिन विमान सुरक्षा और सिस्टम पर उठ रहे गंभीर सवाल-इस हादसे के बाद भारत में विमान सुरक्षा को लेकर गंभीर सवाल उठने लगे हैं। नागरिक उड्डयन महानिदेशालय ने मामले की जांच शुरू कर दी है और विशेष ऑडिट की घोषणा की है। विशेषज्ञों का मानना है कि चार्टर्ड और नॉन-शेड्यूल विमानों की सुरक्षा व्यवस्था पर और कड़ी निगरानी होनी चाहिए। लोगों का कहना है कि तकनीकी खामियों और सुरक्षा नियमों की अनदेखी करने वाली कंपनियों पर सख्त कार्रवाई होनी चाहिए। यह हादसा सिर्फ एक दुर्घटना नहीं, बल्कि सिस्टम की कमजोरियों को भी उजागर करता है। सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या भविष्य में ऐसे हादसों को रोका जा सकता है। इस हादसे ने सात जिंदगियां छीन लीं, लेकिन इसके पीछे छोड़ा गया दर्द और सवाल लंबे समय तक लोगों के दिल और दिमाग में रहेंगे। सह-पायलट सबराजदीप का अपनी मां से किया गया आखिरी वादा अब हमेशा के लिए अधूरा रह गया है।

यह दर्दनाक हादसा हमें याद दिलाता है कि जीवन कितना नाजुक होता है और सुरक्षा के लिए हमें हर संभव कदम उठाने की जरूरत है। परिवारों के टूटे सपनों और खोई हुई जिंदगियों को देखकर हमें विमान सुरक्षा और आपातकालीन सेवाओं में सुधार की दिशा में गंभीरता से काम करना होगा ताकि भविष्य में ऐसी त्रासदियों से बचा जा सके।

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