Google Analytics Meta Pixel
International

ईरान-अमेरिका वार्ता बेनतीजा खत्म: ‘ज्यादा मांगों’ ने बिगाड़ा मामला, फिर भी बातचीत जारी रखने के संकेत

ईरान-अमेरिका बातचीत: क्यों टूटी उम्मीदें और क्या है आगे का रास्ता?
बातचीत क्यों टूटी? बड़ी वजह क्या रही?-पाकिस्तान में हुई ईरान और अमेरिका के बीच बातचीत बिना किसी समझौते के खत्म हो गई। ईरान के वरिष्ठ अधिकारी के अनुसार, अमेरिकी पक्ष की ज्यादा मांगें इस बातचीत के टूटने की मुख्य वजह थीं। शुरुआत में दोनों देशों ने उम्मीदें जताई थीं, लेकिन अंत तक कोई ठोस नतीजा नहीं निकला। इससे साफ होता है कि दोनों के बीच अभी भी कई मुद्दों पर गहरी दूरियां हैं।

ईरान का रुख: राष्ट्रीय हितों की रक्षा सर्वोपरि-ईरान के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता एस्माइल बकाएई ने कहा कि देश अपने राष्ट्रीय हितों की रक्षा के लिए हर संभव तरीका अपनाने को तैयार है, जिसमें कूटनीति भी शामिल है। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि ईरान अपने हितों से कोई समझौता नहीं करेगा। हालांकि, बातचीत के दरवाजे पूरी तरह बंद नहीं हुए हैं, और संवाद जारी रखने की संभावना बनी हुई है।

अमेरिका की बात: परमाणु कार्यक्रम पर अड़चन-अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस ने बताया कि बातचीत इसलिए सफल नहीं हो सकी क्योंकि ईरान अपने परमाणु कार्यक्रम को छोड़ने के लिए तैयार नहीं था। अमेरिका ने अपनी तरफ से अंतिम और सबसे बेहतर प्रस्ताव दिया था, जिसे ईरान ने स्वीकार नहीं किया। यही मुद्दा दोनों के बीच सबसे बड़ा मतभेद बना।

सहमति और मतभेद: बातचीत का संतुलन-ईरान के प्रवक्ता ने बताया कि बातचीत के दौरान कुछ मुद्दों पर सहमति बनी थी, लेकिन 2-3 अहम विषयों पर दोनों देशों के विचार पूरी तरह अलग थे। यही वजह रही कि कोई अंतिम समझौता नहीं हो पाया। इसका मतलब यह है कि बातचीत पूरी तरह बेकार नहीं थी, लेकिन महत्वपूर्ण फैसलों पर अभी सहमति बनना बाकी है।

किन मुद्दों पर हुई चर्चा?-करीब 24 घंटे चली इस बातचीत में होरमुज जलडमरूमध्य, परमाणु कार्यक्रम, युद्ध के नुकसान की भरपाई, प्रतिबंध हटाने और क्षेत्रीय संघर्ष को खत्म करने जैसे बड़े मुद्दों पर चर्चा हुई। ये सभी विषय न सिर्फ दोनों देशों बल्कि पूरी दुनिया के लिए महत्वपूर्ण हैं।

ईरान की शर्तें: ईमानदारी और गंभीरता जरूरी-ईरान ने कहा कि बातचीत की सफलता इस बात पर निर्भर करती है कि सामने वाला पक्ष कितनी ईमानदारी और गंभीरता से बात करता है। साथ ही, अमेरिका को गैरकानूनी मांगों से बचना चाहिए और ईरान के वैध अधिकारों को स्वीकार करना होगा। बिना इन शर्तों के समझौता मुश्किल है।

एक बैठक में बड़ा समझौता संभव नहीं था-ईरान ने माना कि शुरुआत से ही यह उम्मीद नहीं थी कि सिर्फ एक बैठक में कोई बड़ा समझौता हो जाएगा। इस तरह की जटिल बातचीत में समय लगता है। साथ ही, अमेरिका के पुराने वादाखिलाफी के अनुभवों ने भरोसे की कमी को भी बढ़ाया है।

पाकिस्तान की भूमिका और भविष्य की उम्मीदें-पाकिस्तान के उपप्रधानमंत्री और विदेश मंत्री इशाक डार ने कहा कि उनके देश ने बातचीत के कई दौरों में मदद की और उम्मीद जताई कि दोनों देश सकारात्मक सोच के साथ आगे बढ़ेंगे। पाकिस्तान आने वाले दिनों में भी इस संवाद को आगे बढ़ाने में अपनी भूमिका निभाएगा।

ऐतिहासिक मुलाकात, लेकिन नतीजा अधूरा-1979 की इस्लामिक क्रांति के बाद पहली बार ईरान और अमेरिका के बीच इस स्तर की सीधी बातचीत हुई थी। ईरानी प्रतिनिधिमंडल का नेतृत्व मोहम्मद बाकर ग़ालिबाफ कर रहे थे, जबकि अमेरिकी टीम का नेतृत्व जेडी वेंस ने किया। इतनी बड़ी पहल के बावजूद समझौता न हो पाना इस मुद्दे की जटिलता को दर्शाता है।

बातचीत जारी, शांति की उम्मीद बनी-हालांकि इस बार कोई समझौता नहीं हुआ, लेकिन बातचीत से यह साफ हुआ कि दोनों देश अब भी संवाद के जरिए समाधान खोजने के इच्छुक हैं। अगर दोनों पक्ष अपनी जिद छोड़कर बीच का रास्ता निकालते हैं, तो भविष्य में शांति की उम्मीद मजबूत हो सकती है। बातचीत का सिलसिला जारी रहेगा और क्षेत्रीय स्थिरता के लिए प्रयास जारी रहेंगे।

Show More

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Back to top button