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लखनऊ कोचिंग सेंटर आग हादसे में बड़ा खुलासा

 

लखनऊ आग हादसा: जिस इमारत को गिराने का आदेश हुआ था, वहीं 15 लोगों की मौत, सामने आए चौंकाने वाले सवाल-लखनऊ के अलीगंज इलाके में सोमवार को एक कोचिंग सेंटर में लगी भीषण आग ने पूरे शहर को हिला कर रख दिया। इस हादसे में 15 लोगों की मौत हो गई और कई घायल हुए। जांच में पता चला कि जिस इमारत में यह हादसा हुआ, उसे 2016 में अवैध निर्माण के कारण गिराने का आदेश दिया गया था, लेकिन दो महीने बाद वह आदेश वापस ले लिया गया। आठ साल बाद वही इमारत आग की चपेट में आई और कई परिवारों की जिंदगी तबाह हो गई। प्रशासन की लापरवाही पर सवाल उठने लगे हैं।

आठ साल पुराना ध्वस्तीकरण आदेश और आज की दर्दनाक हकीकत-2016 में अलीगंज की उषा मेहता मार्ग पर स्थित तीन मंजिला इमारत को अवैध निर्माण के आरोप में गिराने का आदेश दिया गया था। लेकिन दो महीने बाद ही यह आदेश वापस ले लिया गया। अब सवाल उठता है कि अगर इमारत अवैध थी तो आदेश क्यों रद्द किया गया? क्या प्रशासन ने कोई दबाव में आकर फैसला बदला? आज जब उसी इमारत में आग लगी और 15 लोगों की जान गई, तो पुराने फैसलों की समीक्षा और जवाबदेही की मांग जोर पकड़ रही है।

कोचिंग सेंटर में चल रही थी क्लास, अचानक मचा हड़कंप-आग लगने के वक्त इमारत में एनीमेशन ट्रेनिंग सेंटर चल रहा था, जहां छात्र पढ़ रहे थे। दोपहर करीब तीन बजे अचानक आग लगी और धुआं फैल गया। दूसरी मंजिल पर कई लोग फंस गए और कुछ ने जान बचाने के लिए छलांग लगाई। कुछ मिनटों में पूरा परिसर धुएं से भर गया था, जिससे बाहर निकलना मुश्किल हो गया। यह घटना फिर से व्यावसायिक इमारतों में सुरक्षा मानकों की अनदेखी पर सवाल खड़ा करती है।

रिहायशी मंजूरी के बावजूद व्यावसायिक इस्तेमाल-सरकारी रिकॉर्ड के मुताबिक यह इमारत 1980 में आवंटित हुई थी और 2014 में लखनऊ विकास प्राधिकरण ने इसे रिहायशी उपयोग के लिए मंजूरी दी थी। लेकिन यहां व्यावसायिक तौर पर एनीमेशन सेंटर चल रहा था, जहां बड़ी संख्या में छात्र आते थे। विशेषज्ञों का कहना है कि रिहायशी और व्यावसायिक उपयोग में फर्क सुरक्षा के लिहाज से बहुत मायने रखता है। इस मामले में भी जांच एजेंसियां इस पहलू को गंभीरता से देख रही हैं।

अवैध निर्माण मिला, फिर भी ध्वस्तीकरण आदेश क्यों रद्द?-लखनऊ विकास प्राधिकरण ने अवैध निर्माण पाए जाने पर 2016 में ध्वस्तीकरण का आदेश दिया था, लेकिन दो महीने बाद इसे वापस ले लिया गया। यह फैसला अब सबसे बड़ा सवाल बन गया है। क्या प्रशासन ने दबाव में आकर फैसला बदला? किस अधिकारी ने इसे मंजूरी दी? सरकार ने इस मामले की गहन जांच का आदेश दिया है ताकि इस फैसले के पीछे की सच्चाई सामने आ सके।

बचाव अभियान में जुटीं 14 दमकल गाड़ियां-आग लगने की सूचना पर दमकल विभाग की 14 गाड़ियां मौके पर पहुंचीं, जिनमें हाइड्रोलिक प्लेटफॉर्म वाहन भी थे। दमकलकर्मियों ने घंटों राहत और बचाव कार्य किया, लेकिन आग की तीव्रता इतनी ज्यादा थी कि कई लोगों को समय रहते बाहर नहीं निकाला जा सका। जब तक आग पर काबू पाया गया, तब तक 15 लोगों की मौत हो चुकी थी। विशेषज्ञ आग लगने के कारणों की जांच कर रहे हैं, जिसमें विद्युत उपकरणों की भूमिका भी देखी जा रही है।

पुलिस कार्रवाई तेज, कई अधिकारियों पर गाज गिरा-पुलिस ने छह नामजद आरोपियों समेत अन्य जिम्मेदारों के खिलाफ मामला दर्ज किया है। एक आरोपी की गिरफ्तारी भी हो चुकी है। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के निर्देश पर चार अधिकारियों को निलंबित कर दिया गया है। लखनऊ विकास प्राधिकरण ने पांच सदस्यीय जांच समिति बनाई है जो भवन की मंजूरी, निर्माण और सुरक्षा व्यवस्था की जांच करेगी। सरकार ने साफ किया है कि दोषियों को बख्शा नहीं जाएगा और जांच रिपोर्ट के आधार पर कड़ी कार्रवाई होगी।

मुख्यमंत्री और प्रधानमंत्री ने किया मुआवजे का ऐलान-मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने घटनास्थल का दौरा कर राहत और बचाव कार्यों की समीक्षा की। उन्होंने मृतकों के परिजनों को 5 लाख रुपये और घायलों को 50 हजार रुपये की आर्थिक सहायता देने की घोषणा की। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी पीएम राष्ट्रीय राहत कोष से मृतकों के लिए 2 लाख रुपये और घायलों के लिए 50 हजार रुपये देने का ऐलान किया। हालांकि आर्थिक मदद से परिवारों का दर्द कम नहीं होगा, लेकिन सरकार ने न्याय दिलाने का भरोसा दिया है।

 

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