किसानों की मुश्किलें बढ़ीं: सोपा ने सरकार से खाद्य तेलों पर इम्पोर्ट ड्यूटी 10% बढ़ाने की मांग की

सस्ते विदेशी तेलों ने किसानों का भरोसा तोड़ा: क्या भारत बनेगा आत्मनिर्भर?
खेती का घटता रकबा, किसानों को नहीं मिल रहे भाव-देश में तिलहन की खेती, जो कभी किसानों की आय का एक बड़ा जरिया हुआ करती थी, आज बड़े संकट में है। वजह है विदेशों से आने वाला सस्ता खाने का तेल और घरेलू बाजार में लगातार गिरती कीमतें। भारतीय सोयाबीन प्रोसेसर्स एसोसिएशन (SOPA) का कहना है कि इन सस्ते आयात की वजह से हमारे किसानों को अपनी फसल का सही दाम नहीं मिल पा रहा है। इसी कारण, कई किसान अब सोयाबीन जैसी तिलहन फसलों की खेती से मुंह मोड़ने लगे हैं। SOPA ने तो यहाँ तक कहा है कि अगर सरकार ने आयात शुल्क में कम से कम 10% की बढ़ोतरी नहीं की, तो किसानों का भरोसा फिर से जगाना मुश्किल होगा। उनका मानना है कि अगर यह कदम उठाया गया, तो भारत जल्द ही खाने के तेल के मामले में आत्मनिर्भर बन सकता है, जो हमारे देश के लिए एक बड़ी उपलब्धि होगी।
क्यों घट रहा है सोयाबीन का रकबा?-इस साल सोयाबीन की खेती का रकबा पिछले साल के मुकाबले 5% से भी ज्यादा कम हो गया है। इसका सीधा और सरल कारण यह है कि किसानों को उनकी मेहनत का सही दाम नहीं मिल रहा है। पूरे साल सोयाबीन की कीमतें न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) से भी नीचे ही रहीं। हालात ऐसे हो गए कि सरकार को आगे आकर किसानों से सोयाबीन खरीदना पड़ा, ताकि उन्हें कुछ राहत मिल सके। लेकिन SOPA का कहना है कि सरकारी खरीद के बाद भी, सरकार को यह स्टॉक घाटे में बेचना पड़ा, जिससे नुकसान और भी बढ़ गया। पिछले साल मई 2024 में, सरकार ने महंगाई को कंट्रोल करने के लिए कच्चे खाद्य तेलों पर लगने वाले आयात शुल्क को 20% से घटाकर 10% कर दिया था। हालांकि, रिफाइंड तेल पर यह शुल्क 35.75% ही रहा। SOPA के अनुसार, यह नीति सिर्फ आम ग्राहकों को थोड़ी राहत देने के लिए थी, लेकिन इसका सीधा और बुरा असर किसानों की कमाई और उनकी खेती पर पड़ा है।
चाहिए ऐसी नीति जो सबको दे राहत-SOPA ने सरकार को आगाह किया है कि अगर यही हालात बने रहे, तो तिलहन की खेती और भी कमजोर हो जाएगी और सरकार पर किसानों को समर्थन देने का बोझ बढ़ता जाएगा। SOPA का अनुमान है कि जिस तरह की फसल की स्थिति है, उसे देखते हुए सरकार को इस बार भी सोयाबीन की खरीद पर 5,000 करोड़ रुपये से ज्यादा खर्च करने पड़ सकते हैं। SOPA का यह भी तर्क है कि आजकल खाने के तेल की कीमतें बढ़ी हुई नहीं हैं, तो ऐसे में उपभोक्ताओं को थोड़ा ज्यादा दाम देकर किसानों का साथ देना चाहिए। इससे लंबे समय में देश की दूसरे देशों से तेल आयात करने की निर्भरता कम होगी और किसान फिर से तिलहन की खेती की ओर आकर्षित होंगे। संगठन का कहना है कि काफी समय से आयात पर कम या शून्य शुल्क की जो नीति चल रही है, उसने देश की तिलहन अर्थव्यवस्था को बहुत नुकसान पहुंचाया है। इसलिए, अब यह बहुत जरूरी है कि उपभोक्ताओं और किसानों के हितों के बीच एक संतुलन बनाया जाए, और इसके लिए खाने के तेलों पर कस्टम ड्यूटी को बढ़ाना एक बहुत ही महत्वपूर्ण कदम साबित होगा।



