अमेरिका–ईरान टकराव की आहट: क्या एक हमला दुनिया को परमाणु दौड़ की ओर धकेल देगा?

ईरान पर हमले की आशंका और ट्रंप की कड़ी चेतावनी: क्या बढ़ेगा तनाव?-अमेरिका और ईरान के बीच तनाव फिर से बढ़ता दिख रहा है। 28 जनवरी 2026 को राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान को साफ चेतावनी दी कि अगर तेहरान उनकी शर्तें नहीं मानेगा तो तेज और हिंसक कार्रवाई हो सकती है। इसके बाद पेंटागन ने USS अब्राहम लिंकन एयरक्राफ्ट कैरियर समेत कई लड़ाकू जहाज और जेट्स ईरान के पास तैनात कर दिए हैं।
अमेरिका की प्रमुख मांगें क्या हैं?-अमेरिका चाहता है कि ईरान हमेशा के लिए यूरेनियम संवर्धन बंद करे। इसके अलावा बैलिस्टिक मिसाइलों के विकास पर रोक लगाई जाए और मध्य पूर्व में हमास, हिज़्बुल्लाह और हूती जैसे समूहों को समर्थन देना बंद किया जाए। ट्रंप प्रशासन को उम्मीद है कि कमजोर अर्थव्यवस्था और हाल की प्रदर्शनों के कारण ईरान दबाव में आ सकता है।
ईरान कमजोर नहीं, बल्कि मजबूत सुरक्षा व्यवस्था वाला देश-विशेषज्ञ मानते हैं कि ईरान कोई कमजोर देश नहीं है जो एक झटके में गिर जाए। करीब 9.3 करोड़ की आबादी और मजबूत सुरक्षा तंत्र के साथ ईरान ने खुद को कई संकटों के लिए तैयार किया है। रिवोल्यूशनरी गार्ड जैसे संस्थान लाखों की संख्या में संगठित हैं और किसी भी स्थिति में व्यवस्था संभाल सकते हैं।
सत्ता परिवर्तन से समाधान नहीं होगा-अगर अमेरिकी कार्रवाई से ईरानी सरकार गिर भी जाती है, तो भी स्थिति साफ नहीं होगी। अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो भी मान चुके हैं कि इसके बाद सत्ता कौन संभालेगा, कोई नहीं जानता। विदेशों में बैठे ईरानी विपक्षी बिखरे हुए हैं और देश की जमीन से कटे हुए हैं, जिससे अस्थिरता बढ़ने का खतरा है।
थ्रेशहोल्ड स्टेट का खतरा क्या है?-ईरान परमाणु हथियार बनाने की तकनीक रखता है, लेकिन अंतिम कदम नहीं उठाया है। ऐसे देशों को थ्रेशहोल्ड स्टेट कहा जाता है। अगर ये देश अस्थिर हो जाएं, तो परमाणु सामग्री और वैज्ञानिकों पर नियंत्रण कमजोर पड़ सकता है, जिससे तकनीक फैल सकती है और हथियार बनाने की होड़ तेज हो सकती है।
इतिहास से मिली चेतावनी-सोवियत संघ के टूटने के बाद परमाणु सामग्री के गायब होने की घटनाएं हुईं। पाकिस्तान के ए.क्यू. खान नेटवर्क ने दिखाया कि परमाणु ज्ञान एक देश से दूसरे देश तक आसानी से पहुंच सकता है। यही खतरा ईरान के मामले में भी है, अगर हालात नियंत्रण से बाहर हो जाएं।
सैन्य हमलों का संदेश क्या है?-2025 में ईरान के परमाणु ठिकानों पर हमलों और ट्रंप की धमकियों ने बताया कि केवल संयम से सुरक्षा नहीं मिलती। लीबिया ने परमाणु कार्यक्रम छोड़ा, फिर भी उसके नेता को सत्ता गंवानी पड़ी। यूक्रेन ने हथियार छोड़े, लेकिन फिर भी हमला हुआ। ऐसे उदाहरण गलत सबक देते हैं।
ईरान का सबक बाकी दुनिया के लिए-ईरान के वरिष्ठ सलाहकार मेहदी मोहम्मदी ने कहा कि अमेरिका की मांगें असल में ईरान को निहत्था बनाकर हमला करने का रास्ता खोलती हैं। अगर सरकार बची रही, तो ईरान परमाणु हथियार बनाने की दिशा में तेजी से बढ़ सकता है, ताकि खुद को सुरक्षित रख सके।
IAEA की विश्वसनीयता पर असर-परमाणु निगरानी संस्था IAEA अब तक ईरान में अपना काम ठीक से कर रही थी। लेकिन सैन्य हमले या धमकियों से निरीक्षक हट जाते हैं और निगरानी टूट जाती है। जब नियम मानने पर भी सुरक्षा नहीं मिलती, तो देशों का भरोसा अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं से कम हो जाता है।
डोमिनो इफेक्ट का खतरा-ईरान पर हमला सिर्फ मध्य पूर्व तक सीमित नहीं रहेगा। सऊदी अरब ने कहा है कि अगर ईरान परमाणु हथियार बनाता है, तो वह भी पीछे नहीं रहेगा। तुर्की ने भी स्वतंत्र परमाणु क्षमता पर विचार करने के संकेत दिए हैं। जापान और दक्षिण कोरिया भी अमेरिकी सुरक्षा भरोसे पर सवाल उठा सकते हैं।
क्या अमेरिका की पकड़ कमजोर होगी?-खाड़ी देशों ने अमेरिका को सैन्य कार्रवाई से बचने की सलाह दी है। अगर अमेरिका ने हमला किया, तो सहयोगी देश अपनी सुरक्षा के लिए दूसरे विकल्प खोज सकते हैं। इससे अमेरिकी प्रभाव कम हो सकता है और क्षेत्र कई गुटों में बंट सकता है।
आगे की राह कितनी खतरनाक है?-सबसे बड़ी चिंता यह है कि यह टकराव दुनिया को यह संदेश न दे कि सुरक्षा सिर्फ परमाणु हथियारों से मिलती है। अगर ऐसा हुआ, तो वैश्विक परमाणु अप्रसार व्यवस्था कमजोर होगी और दुनिया एक नई और ज्यादा खतरनाक परमाणु दौड़ में फंस सकती है।



