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भारत-ईरान तेल कारोबार: फिर से जुड़ते रिश्ते और नई उम्मीदें

भारत और ईरान के बीच तेल का व्यापार अब फिर से चर्चा में है। कई सालों की दूरी के बाद दोनों देशों के रिश्ते नई दिशा में बढ़ रहे हैं। सस्ते तेल की जरूरत, डॉलर पर निर्भरता कम करने की कोशिश और वैश्विक तनाव के बीच यह डील खास महत्व रखती है। आइए विस्तार से समझते हैं इस रिश्ते की कहानी और आने वाले समय की संभावनाएं।

 2000 के दशक में भारत-ईरान का मजबूत व्यापार-2000 के शुरुआती सालों में भारत और ईरान के बीच व्यापार काफी अच्छा था। भारत ईरान से बड़ी मात्रा में कच्चा तेल खरीदता था और बदले में बासमती चावल एक्सपोर्ट करता था। यह मॉडल दोनों देशों के लिए फायदेमंद था और व्यापार बिना किसी बड़ी रुकावट के चलता था।

2010 के बाद अमेरिका के प्रतिबंधों ने बदली तस्वीर-2010 के बाद अमेरिका ने ईरान पर कड़े प्रतिबंध लगाए, जिससे भारत को भी अपनी रणनीति बदलनी पड़ी। 2012-13 में भारत ईरान का दूसरा सबसे बड़ा तेल खरीदार था, लेकिन 2018 में प्रतिबंधों के कारण तेल आयात लगभग बंद हो गया और पुराना व्यापार मॉडल खत्म हो गया।

 2019-2023: रिश्ते बने, लेकिन दूरी भी बनी रही-इन वर्षों में भारत ने पूरी तरह से ईरान से दूरी नहीं बनाई, बल्कि संतुलन बनाए रखा। कुछ भुगतान रुपये में किए गए और चाबहार पोर्ट पर काम चलता रहा। हालांकि तेल आयात बंद था, लेकिन दोस्ती कायम थी, पर परिस्थितियों ने दूरी भी बनाए रखी।

 2026 में फिर शुरू हुआ तेल आयात, बढ़ी नई उम्मीदें-7 साल बाद भारत ने ईरान से फिर से तेल और LNG आयात शुरू कर दिया है। इससे व्यापार में नई जान आई है। पुराने Oil-for-Rice मॉडल की वापसी की भी चर्चा हो रही है। वैश्विक तेल बाजार की अस्थिरता के बीच यह कदम भारत के लिए राहत माना जा रहा है।

रुपये में ट्रेड से डॉलर पर निर्भरता कम करने की तैयारी-अब व्यापारी चाहते हैं कि यह डील डॉलर की बजाय रुपये में हो। इसके लिए UCO Bank के जरिए पेमेंट मॉडल सुझाया गया है। भारत चावल एक्सपोर्ट करेगा और बदले में तेल इम्पोर्ट करेगा। इससे विदेशी मुद्रा की बचत होगी और भारत की आर्थिक मजबूती बढ़ेगी।

 होर्मुज जलडमरूमध्य बना दुनिया का तनाव केंद्र-होर्मुज जलडमरूमध्य दुनिया के लिए बेहद अहम है, जहां से करीब 20% तेल सप्लाई होती है। यहां तनाव बढ़ने का मतलब है कि दुनिया भर में तेल और गैस की कीमतें बढ़ेंगी। इससे शिपिंग, इंश्योरेंस और एक्सपोर्ट पर भी असर पड़ेगा, जो हर देश के लिए चिंता का विषय है।

अमेरिका के प्रतिबंधों से बढ़ सकती हैं मुश्किलें-सबसे बड़ा खतरा यह है कि अगर अमेरिका ने फिर से प्रतिबंध सख्त कर दिए, तो भारत को महंगा तेल खरीदना पड़ेगा। बैंक भी लेन-देन से पीछे हट सकते हैं और पूरा सिस्टम प्रभावित हो सकता है। इससे भारत की योजना पर बड़ा असर पड़ेगा।

चाबहार पोर्ट: भारत की रणनीतिक ताकत-चाबहार पोर्ट सिर्फ एक बंदरगाह नहीं है, बल्कि भारत के लिए अफगानिस्तान और सेंट्रल एशिया तक पहुंचने का अहम रास्ता है। इससे पाकिस्तान को बायपास किया जा सकता है। इसलिए इस प्रोजेक्ट पर कोई रुकावट भारत के लिए रणनीतिक नुकसान हो सकती है।

अमेरिका और ईरान के बीच संतुलन बनाना बड़ी चुनौती-भारत के सामने सबसे बड़ी चुनौती है कि वह अमेरिका और ईरान दोनों के साथ संतुलन बनाए रखे। एक तरफ सस्ता तेल जरूरी है, तो दूसरी तरफ अमेरिका के साथ अच्छे रिश्ते भी अहम हैं। इसलिए भारत को बहुत सोच-समझकर कदम उठाने होंगे।

आम आदमी पर क्या होगा असर?-अगर ईरान से तेल आयात जारी रहता है, तो भारत में पेट्रोल-डीजल के दाम नियंत्रण में रह सकते हैं। लेकिन अगर फिर से प्रतिबंध लगते हैं, तो कीमतों में बढ़ोतरी तय है। इससे आम लोगों की जेब पर असर पड़ेगा और महंगाई बढ़ सकती है।

भारत और ईरान के बीच तेल कारोबार फिर से शुरू होना दोनों देशों के लिए नई उम्मीद लेकर आया है। डॉलर पर निर्भरता कम करने और आर्थिक मजबूती बढ़ाने की कोशिशें भी सकारात्मक संकेत हैं। हालांकि वैश्विक तनाव और अमेरिका के प्रतिबंधों को लेकर सतर्क रहना जरूरी है। इस संतुलन को बनाए रखना भारत के लिए बड़ी चुनौती है, लेकिन अगर सही रणनीति अपनाई गई तो यह कदम देश के लिए फायदेमंद साबित होगा।

 

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