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ईरान में उबाल: महंगाई से भड़के विरोध, सड़कों पर हिंसा और सरकार की अग्निपरीक्षा

ईरान में एक हफ्ते में हिंसक हुआ आंदोलन: क्या नई क्रांति की शुरुआत है?-ईरान में पिछले एक हफ्ते से जारी विरोध प्रदर्शन अब हिंसक रूप ले चुके हैं। राजधानी तेहरान से शुरू हुआ यह आंदोलन अब देश के कई हिस्सों में फैल चुका है। सुरक्षा बलों और प्रदर्शनकारियों के बीच झड़पों में कम से कम सात लोगों की मौत हो चुकी है। सरकारी और निजी इमारतों को भी काफी नुकसान पहुंचा है, जिससे माहौल बेहद तनावपूर्ण हो गया है।

विरोध प्रदर्शन का हिंसक रूप लेना क्यों चिंता का विषय है?-तेहरान से शुरू हुआ यह विरोध अब सिर्फ स्थानीय मुद्दा नहीं रह गया है, बल्कि पूरे देश में फैल चुका है। कुछ विशेषज्ञ इसे ईरान में बड़े बदलाव की शुरुआत मान रहे हैं। इन प्रदर्शनों की तुलना 1989 के चीन के ‘तियानमेन स्क्वायर’ आंदोलन से की जा रही है। लोग खुलकर सड़कों पर उतर रहे हैं, जिससे सरकार की चिंता बढ़ती जा रही है।

आखिर लोग सड़कों पर क्यों उतरे हैं?-इन विरोध प्रदर्शनों की सबसे बड़ी वजह ईरान की बिगड़ती आर्थिक स्थिति है। दिसंबर में महंगाई दर 42.5 फीसदी तक पहुंच गई है, जिससे आम आदमी की जिंदगी मुश्किल हो गई है। रियाल की कीमत तेजी से गिर रही है और रोजमर्रा की जरूरतें लोगों की पहुंच से बाहर होती जा रही हैं। इस आर्थिक तंगी ने लोगों को सड़कों पर आने के लिए मजबूर कर दिया है।

दुकानदारों से लेकर छात्रों तक फैला गुस्सा-28 दिसंबर 2025 को सबसे पहले दुकानदार और व्यापारी सड़कों पर उतरे और बाजार बंद कर दिया। उन्होंने सरकार पर मुद्रा संकट को संभालने में नाकामी का आरोप लगाया। इसके बाद कम से कम 10 विश्वविद्यालयों के छात्र भी प्रदर्शन में शामिल हो गए। धीरे-धीरे यह आंदोलन आम जनता की आवाज बन गया और व्यापक रूप ले लिया।

बाजार बंद और जनजीवन ठप, तनाव बढ़ा-कई शहरों में प्रमुख बाजार और व्यावसायिक इलाके पूरी तरह बंद रहे। बढ़ते तनाव के बीच सरकार ने ठंड का हवाला देकर सार्वजनिक अवकाश घोषित कर दिया, जिससे आम जनजीवन ठप हो गया। प्रदर्शनकारियों ने पत्थरबाजी की और कई इमारतें बुरी तरह क्षतिग्रस्त हुईं। पुलिस ने कई लोगों को हिरासत में भी लिया है।

प्रतिबंधों और संघर्ष से जूझती अर्थव्यवस्था-ईरान की अर्थव्यवस्था पहले से ही अमेरिका और पश्चिमी देशों के प्रतिबंधों के दबाव में है। जून में इज़रायल के साथ 12 दिनों तक चले संघर्ष ने सरकारी खजाने पर अतिरिक्त बोझ डाला। लोरेस्तान प्रांत के उप-गवर्नर सईद पूरअली ने कहा कि ये विरोध आर्थिक दबाव और महंगाई का नतीजा हैं, जो सरकार के लिए बड़ी चुनौती बन गए हैं।

2022 की यादें और राजनीतिक नारे-हालांकि प्रदर्शन आर्थिक मुद्दों से शुरू हुए थे, लेकिन अब कई जगहों पर धार्मिक शासन के खिलाफ नारे भी सुनाई देने लगे हैं। सोशल मीडिया पर वायरल एक वीडियो में एक व्यक्ति सुरक्षा बलों के सामने शांतिपूर्वक बैठा दिखता है। लोगों को 2022 के महसा अमीनी आंदोलन की याद आ रही है, जिसने पूरे देश को हिला दिया था।

सरकार का रुख और भविष्य की चुनौतियां-ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेज़ेशकियन ने प्रदर्शनकारियों से बातचीत की इच्छा जताई है। उन्होंने कहा कि अगर सरकार लोगों की आजीविका की समस्या हल नहीं कर पाई, तो उसे जवाबदेह ठहराया जाएगा। हालांकि उन्होंने माना कि रियाल की हालत बहुत खराब है और सरकार के विकल्प सीमित हैं। प्रॉसिक्यूटर जनरल ने कहा है कि शांतिपूर्ण विरोध जायज हैं, लेकिन अस्थिरता फैलाने वालों पर कड़ी कार्रवाई होगी।

आगे का रास्ता: तनाव बढ़ेगा या संभलेगा?-फिलहाल ईरान में हालात नाजुक बने हुए हैं। महंगाई, बेरोजगारी और आर्थिक अस्थिरता सरकार के लिए बड़ी चुनौती हैं। आने वाले दिन तय करेंगे कि यह आंदोलन शांतिपूर्ण समाधान की ओर बढ़ेगा या फिर हालात और बिगड़ेंगे। देश की जनता और सरकार दोनों के लिए यह समय बेहद महत्वपूर्ण है।

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