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उस सुबह जिसने संसद को बचा लिया: कांस्टेबल कमलेश कुमारी की अदृश्य बहादुरी

संसद हमले से पहले की सुबह: एक सामान्य दिन जिसने इतिहास बदल दिया- 13 दिसंबर 2001 की सुबह दिल्ली के संसद भवन में सब कुछ सामान्य लग रहा था। नेता अपनी बैठकों में व्यस्त थे, सुरक्षा कर्मी अपनी ड्यूटी पर थे और दिन की शुरुआत हो रही थी। गेट नंबर 1 पर सीआरपीएफ की कांस्टेबल कमलेश कुमारी यादव अपनी जिम्मेदारी निभा रही थीं, जो उस दिन देश की सुरक्षा के लिए एक मिसाल बन गईं। उन्होंने अपनी बेटी को स्वेटर पहनने की याद दिलाई और पति से आखिरी बार बात की। लगभग 11:40 बजे, जब संसद परिसर में हलचल बढ़ रही थी, तब कमलेश ने एक तेज रफ्तार सफेद एम्बेसडर कार को रोकने की कोशिश की, जो आगे बढ़ रही थी। यह वही पल था जिसने इतिहास की दिशा बदल दी।

खतरे को पहचानने वाली पहली आवाज: कमलेश की हिम्मत- सफेद एम्बेसडर कार पर संसद का नकली स्टीकर लगा था और लाल बत्ती भी थी, जिससे यह लग रहा था कि कार सुरक्षा में है। लेकिन कमलेश ने तुरंत समझ लिया कि कुछ गड़बड़ है। उन्होंने बिना देर किए कार को रोकने का आदेश दिया और पहचान पत्र मांगा। आतंकियों ने जब महसूस किया कि उनकी योजना फेल हो सकती है, तो उन्होंने फायरिंग शुरू कर दी। गोलियों की बारिश के बीच भी कमलेश डटी रहीं, पीछे नहीं हटीं और कार को आगे बढ़ने से रोकने की पूरी कोशिश की। उनकी हिम्मत ने उस दिन देश के लोकतंत्र को बचाने की पहली कड़ी मजबूत की।

11 गोलियां झेलते हुए भी कमलेश की चीख ने बचाई संसद- आतंकियों की गोलीबारी में कमलेश सीधे निशाने पर थीं। उन्हें 11 गोलियां लगीं, लेकिन उन्होंने ड्यूटी नहीं छोड़ी। गिरने से पहले उनकी तेज चीख ने आसपास के सुरक्षाकर्मियों को अलर्ट कर दिया। उनकी आवाज़ ने सुरक्षा दल को तुरंत सक्रिय किया और संसद के सभी द्वार बंद कर दिए गए। अंदर मौजूद सांसदों और अधिकारियों को सुरक्षित जगहों पर पहुंचाया गया। आतंकियों की योजना थी संसद में घुसकर भारी तबाही मचाने की, लेकिन कमलेश की बहादुरी ने उन्हें गेट पर ही रोक दिया। उनकी शहादत ने भारत के लोकतंत्र को एक बड़े संकट से बचा लिया।

शहादत के बाद मिला सम्मान और अमर विरासत- जांच में पता चला कि अगर आतंकियों की कार एक मिनट भी आगे बढ़ जाती, तो स्थिति भयावह हो सकती थी। कमलेश की बहादुरी को देश ने गहराई से महसूस किया और 26 जनवरी 2002 को उन्हें मरणोपरांत ‘अशोक चक्र’ से सम्मानित किया गया। वह सीआरपीएफ की पहली महिला आरक्षक थीं जिन्हें यह सम्मान मिला। आज उनके नाम पर सीआरपीएफ मुख्यालय में एक ब्लॉक भी है। उनके परिवार को गर्व है कि उन्होंने सिर्फ ड्यूटी नहीं निभाई, बल्कि देश की सुरक्षा का एक मिसाल कायम किया। कमलेश की कहानी साहस और समर्पण की प्रेरणा है।

बिहार की बेटी जिसने कर्तव्य को जीवन से ऊपर रखा- कमलेश कुमारी का जीवन साधारण था। वह बिहार के समस्तीपुर जिले के एक छोटे से गांव की रहने वाली थीं। संघर्षों से भरे माहौल में पली-बढ़ीं, उन्होंने 1994 में सीआरपीएफ में भर्ती होकर अपने परिवार की जिम्मेदारी उठाई। दिल्ली में तैनाती के दौरान वे अक्सर अपने बच्चों से दूर रहती थीं, लेकिन उन्हें अपनी वर्दी और कर्तव्य पर गर्व था। उनका सपना था कि उनके बच्चे उन्हें एक ऐसी मां के रूप में याद रखें जो अपने फर्ज के लिए कभी पीछे नहीं हटी। उनका समर्पण उन्हें उस दिन संसद के गेट नंबर 1 पर खड़ा कर गया, जहां उन्होंने अपने प्राणों की आहुति देकर देश को बचाया।

आतंकियों का अंत और साजिश का खुलासा- संसद पर हमला करने आए पांच आतंकियों को सुरक्षा बलों ने मौके पर ही मार गिराया। ये सभी पाकिस्तान स्थित आतंकी संगठनों से जुड़े थे और उनका मकसद भारत की राजनीतिक व्यवस्था को तहस-नहस करना था। हमले की साजिश रचने वाले मोहम्मद अफजल गुरु को लंबी कानूनी प्रक्रिया के बाद दोषी ठहराया गया और 9 फरवरी 2013 को तिहाड़ जेल में फांसी दी गई। यह घटना भारत की सुरक्षा व्यवस्था की मजबूती का प्रमाण है और यह दिखाती है कि हर एक सुरक्षाकर्मी की जिम्मेदारी कितनी अहम होती है, जो बड़े से बड़ा खतरा भी टाल सकती है।

 

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