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नेपाल में बवाल: क्यों सड़कों पर उतरे युवा और क्या कहती है राजनीति की कहानी?

 नेपाल में बवाल: क्यों भड़की जनता की आग? युवाओं ने कैसे जगाई क्रांति की ज्वाला?

जब शांति बनी आंधी: विरोध का अचानक उग्र रूप-सोचिए, एक पल में सब कुछ शांत था, और अगले ही पल पूरा नेपाल जैसे उबल पड़ा! जी हाँ, नेपाल में जो हुआ, उसने सबको चौंका दिया। जो प्रदर्शन पहले शांति से चल रहा था, वो देखते ही देखते आगजनी, तोड़फोड़ और सरकारी संपत्तियों को नुकसान पहुंचाने तक पहुँच गया। सबसे हैरान करने वाली बात ये थी कि इसमें बच्चे, युवा और स्कूल जाने वाले छात्र बड़ी संख्या में शामिल थे। ऐसा लग रहा था मानो लोगों का गुस्सा सिर्फ मौजूदा सरकार पर नहीं, बल्कि सालों से चले आ रहे नेताओं और पूरे सिस्टम के खिलाफ था। प्रदर्शनकारियों ने किसी को नहीं बख्शा, चाहे वो पूर्व प्रधानमंत्री प्रचंड हों या शेर बहादुर देउबा। नेताओं के घरों पर हमले हुए, यहाँ तक कि सुप्रीम कोर्ट और संसद भवन को भी निशाना बनाया गया। इससे साफ ज़ाहिर होता है कि जनता अब भ्रष्टाचार, भाई-भतीजावाद और नेताओं की मनमानी से बुरी तरह तंग आ चुकी है। यह सिर्फ एक विरोध नहीं, बल्कि सिस्टम के खिलाफ एक खुली बगावत थी।

सत्ता के गलियारों में हड़कंप: नेताओं पर सीधा वार-इन विरोधों ने ये दिखा दिया कि जनता का गुस्सा कितना गहरा है। देश के बड़े-बड़े नेता, जैसे शेर बहादुर देउबा और उनकी पत्नी, भी हमले से नहीं बच पाए। पूर्व प्रधानमंत्री झलनाथ खनाल की पत्नी भी भीड़ के बीच फँस गईं। हालात इतने बिगड़ गए कि वित्त मंत्री को सड़क पर दौड़ाकर पीटा गया। यहाँ तक कि तत्कालीन प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली को भी इस्तीफा देना पड़ा, और खबरें थीं कि उनके परिवार को सुरक्षा के बीच दुबई भेज दिया गया। यह सिर्फ एक राजनीतिक उथल-पुथल नहीं थी, बल्कि इसने पूरे सिस्टम की नींव हिला दी थी। कार्यपालिका, न्यायपालिका और विधायिका – यानी सरकार के तीनों मुख्य स्तंभों पर जनता का यह हमला इस बात का पक्का सबूत था कि लोगों का भरोसा अब पूरी तरह से उठ चुका था।

भ्रष्टाचार और परिवारवाद: वो चिंगारी जिसने भड़का दी आग-नेपाल में लंबे समय से जो परिवारवाद और भ्रष्टाचार का बोलबाला रहा है, वही जनता के गुस्से का सबसे बड़ा कारण बना। बड़े-बड़े नेताओं पर आए दिन घोटालों के आरोप लगते रहे हैं। चाहे वो भूटानी शरणार्थियों का मामला हो, नेपाल एयरलाइंस के विमान खरीदने का घोटाला हो, या फिर चाय बागान की ज़मीन से जुड़ा मामला। जनता को ये बात भी बहुत चुभ रही थी कि नेताओं की पत्नियों और परिवार वालों को ऊँचे-ऊँचे पदों पर बिठाया जा रहा है। सोशल मीडिया पर जब नेताओं के बच्चों की महंगी और शानदार ज़िंदगी की तस्वीरें वायरल हुईं, तो जैसे लोगों के सब्र का बाँध टूट गया। इसी ने पूरे देश में आग लगा दी। जब सरकार ने 26 सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर पाबंदी लगा दी, तो युवाओं का गुस्सा और भी भड़क उठा।

नौकरी नहीं, भविष्य अंधकारमय: आर्थिक तंगी का दर्द-नेपाल की आर्थिक हालत भी इन विरोध प्रदर्शनों की एक बड़ी वजह है। वर्ल्ड बैंक के आँकड़ों के मुताबिक, 2024 में देश में बेरोज़गारी की दर 10.7% थी, जो दक्षिण एशिया और पूरी दुनिया के औसत से काफी ज़्यादा है। पिछले तीस सालों से हालात कुछ ऐसे ही बने हुए हैं। लाखों नौजवानों को देश में नौकरी नहीं मिल रही, जिसके चलते वे मजबूरी में विदेश जा रहे हैं। हर साल करीब 8 लाख लोग नेपाल छोड़ रहे हैं, जो 3 करोड़ की आबादी वाले देश के लिए बहुत बड़ा आँकड़ा है। देश की अर्थव्यवस्था काफी हद तक विदेशों से भेजे जाने वाले पैसों पर ही टिकी है। ऐसे में, जब जनता देखती है कि सरकार और नेता अपने परिवारों और भ्रष्टाचार में ही लगे हुए हैं, तो युवाओं का गुस्सा भड़कना लाज़मी है।

Gen Z का मोर्चा: नई पीढ़ी ने संभाला आंदोलन का नेतृत्व-इस बार के विरोध प्रदर्शनों की सबसे खास बात यह है कि इसे किसी पार्टी या नेता ने नहीं, बल्कि युवा पीढ़ी, यानी Gen Z ने आगे बढ़ाया है। आंदोलन का तरीका भी बिल्कुल नया था। युवाओं ने TikTok और Viber जैसे सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स का इस्तेमाल करके सबको जोड़ा और आंदोलन को संगठित किया। इसीलिए इसे “Gen Z मॉडल ऑफ प्रोटेस्ट” का नाम दिया जा रहा है। सबसे दिलचस्प बात यह है कि ये प्रदर्शनकारी किसी एक नेता का समर्थन नहीं कर रहे, बल्कि सभी पार्टियों और नेताओं को एक साथ जिम्मेदार ठहरा रहे हैं। इसी वजह से जानकार इसे एक “सच्चा जनआंदोलन” मान रहे हैं।

नई उम्मीद की किरण: काठमांडू के मेयर बलन शाह-युवाओं के लिए इस वक्त सबसे बड़ी उम्मीद काठमांडू के मेयर बलन शाह बने हुए हैं। कभी एक रैपर रहे बलन शाह ने 2022 में मेयर का चुनाव जीतकर यह साबित कर दिया था कि नई पीढ़ी बदलाव चाहती है। उनकी छवि हमेशा से एक ईमानदार और भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ने वाले नेता की रही है। यही वजह है कि आज के आंदोलनकारी उन्हें अपना प्रतिनिधि मानते हैं। उन्होंने सोशल मीडिया पर लगे बैन के खिलाफ भी आवाज़ उठाई थी। ऐसा माना जा रहा है कि यही युवा पीढ़ी आने वाले समय में नेपाल की राजनीति का भविष्य तय करेगी।

क्या होंगे जल्दी चुनाव? भविष्य की राह-इस पूरी राजनीतिक उथल-पुथल के बीच सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या नेपाल में समय से पहले चुनाव होंगे? विपक्षी पार्टियां और प्रदर्शनकारी जल्द चुनाव कराने की मांग कर रहे हैं। लेकिन, दशैं और दिवाली जैसे बड़े त्योहार आने वाले हैं, और उसके बाद कड़ाके की ठंड भी पड़ेगी। ऐसे में, यह उम्मीद जताई जा रही है कि चुनाव शायद जल्दी न होकर 2026 की शुरुआत में ही हों। हालांकि, जो कुछ भी हुआ है, उससे यह साफ है कि जनता अब बदलाव चाहती है और नेताओं को अपनी पुरानी राजनीति छोड़कर एक नई दिशा दिखानी ही होगी।

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