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“अब डर नहीं, जवाब चाहिए”: ईरान के हमले के बाद इज़राइल की सड़कों से उठी एकजुट आवाज़

 मिसाइल हमले के बाद इज़राइल का हौसला: बदला या बचाव?-यह लेख इज़राइल में हाल ही में हुए ईरानी मिसाइल हमले के बाद वहां के लोगों की प्रतिक्रियाओं और सरकार के कदमों पर केंद्रित है।

 घर उजड़ गए, लेकिन हौसला नहीं-पेटाह टिकवा में हुए मिसाइल हमले में मिरयम बाल-बाल बचीं, लेकिन उनके घर का बहुत नुकसान हुआ। इस घटना ने उन्हें झकझोर कर रख दिया, लेकिन उन्होंने डरने की जगह ईरान को मुंहतोड़ जवाब देने की ठान ली। उनका कहना है कि चुप बैठना अब विकल्प नहीं है।

 नेतन्याहू सरकार को मिला जनसमर्थन-प्रधानमंत्री नेतन्याहू ने हमेशा से ईरान को सबसे बड़ा खतरा बताया है। ईरान पर की गई एयरस्ट्राइक के बाद, ज़्यादातर इज़राइली नागरिक सरकार के साथ खड़े नज़र आए, यहां तक कि विपक्षी दल भी। इस समर्थन का मतलब है कि सरकार के पास आगे कठोर कदम उठाने का साहस है।

बच्चों की आँखों में डर, दिल में साहस-हमले से प्रभावित इलाकों में बच्चों का डर साफ झलक रहा है। लेकिन 14 साल के ईतान जैसे बच्चे भी पीछे हटने को तैयार नहीं हैं। उनका मानना है कि अगर जवाब नहीं दिया गया, तो और लोग मारे जाएँगे। यह भावना पूरे देश में फैली हुई है।

 तबाही का मंजर, लेकिन जवाब की तैयारी-एक ही मिसाइल ने चार इमारतें तबाह कर दीं और सैकड़ों परिवार बेघर हो गए। राष्ट्रपति ने इस घटना को ‘शुद्ध बर्बरता’ बताया है। लेकिन इस तबाही के बावजूद, देश का मनोबल कम नहीं हुआ है।

 1991 की यादें और वर्तमान खतरा-1991 के गल्फ वॉर की यादें ताज़ा हो गई हैं, जब इराक ने स्कड मिसाइलें दागी थीं। लेकिन अब डिफेंस सिस्टम मज़बूत है। हालांकि, खतरा भी पहले से कहीं ज़्यादा बड़ा है; खासकर अगर ईरान परमाणु शक्ति बन गया।

नुकसान बहुत, लेकिन हार नहीं मानेंगे-एयरस्ट्राइक में भारी नुकसान हुआ है, इज़राइल के कई नागरिक मारे गए हैं और सैकड़ों घायल हैं। लेकिन लोगों का मानना है कि पीछे हटने का मतलब खतरे को और बढ़ाना होगा।

 समर्थन बनाए रखने के लिए नतीजे ज़रूरी-अगर इज़राइल अपने ऑपरेशन में सफल नहीं हुआ, तो जनता का समर्थन कमज़ोर हो सकता है। फिलहाल तो जनता सरकार के साथ है, लेकिन अब नतीजे दिखाने की ज़रूरत है।

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