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‘पंचायत 4’ रिव्यू: इस बार फुलेरा की राजनीति में उलझी कहानी, लेकिन दम नहीं दिखा पहले जैसा

 पंचायत 4: क्या कमाल की एक्टिंग बचा पाएगी कहानी की कमी को?-फुलेरा गांव की चर्बीली हंसी और सियासी उठापटक फिर लौटी है, लेकिन क्या ‘पंचायत 4’ ने पहले जैसा जादू बिखेरा है? चलिए, एक नज़र डालते हैं इस सीज़न की ताकत और कमज़ोरियों पर।

फुलेरा की फिर से वापसी, लेकिन पुराना जादू कहाँ?-‘पंचायत 4’ का इंतज़ार था, लेकिन इस बार वो पुराना मज़ा कम ही नज़र आया। रिश्ते, राजनीति, और सचिव जी का रोमांस सब कुछ वही है, पर कहानी में वो तीखापन और मज़ाक गायब है जो पहले इसे ख़ास बनाता था। गाँव की रौनक तो है, पर हँसी कम है। लगता है जैसे इस बार फुलेरा की रूह थोड़ी सुस्त हो गई है।

 पुलिस केस और चुनावों की उलझन-कहानी की शुरुआत एक पुलिस केस से होती है जिसमें सचिव जी और बनराकस फँस जाते हैं। इसके साथ ही चुनावों की सरगर्मी भी शुरू हो जाती है। प्रधान जी और बनराकस के बीच की टक्कर और गांव की राजनीति कहानी की मुख्य धुरी है। लेकिन, यह राजनीतिक खेल कुछ ज़्यादा ही उलझा हुआ लगता है, और कहानी में वह दिलचस्पी नहीं है जो दर्शकों को स्क्रीन से बांधे रखे।

 एक्टिंग में कोई कमी नहीं, पर संवादों में कमी खटकती है-सारे कलाकारों ने शानदार काम किया है। जीतेंद्र कुमार (सचिव जी) और भी आत्मविश्वासी लग रहे हैं। रघुवीर यादव, नीना गुप्ता, फैज़ल मलिक और अशोक पाठक ने भी अपने किरदारों में जान डाल दी है। लेकिन, इस बार संवादों में वो दम नहीं है जो पहले दर्शकों को हँसाता या सोचने पर मजबूर करता था। अच्छी एक्टिंग के बावजूद, संवादों की कमी कहानी की ताकत को कमज़ोर कर देती है।

 धीमी शुरुआत और अधूरी कहानी-कहानी की शुरुआत बहुत धीमी है। पहले दो एपिसोड में कुछ खास होने का एहसास ही नहीं होता। कहानी में नयापन नहीं है, और वो मज़ाक भी नहीं है जिसके लिए ‘पंचायत’ जानी जाती है। दर्शकों को वो मज़ेदार ट्विस्ट नहीं मिलते जिनका उन्हें इंतज़ार था। कुल मिलाकर, कहानी अधूरी सी लगती है, जैसे कुछ ज़रूरी हिस्से गायब हैं।

 क्या देखनी चाहिए ‘पंचायत 4’?-अगर आप ‘पंचायत’ के पुराने फैन हैं, तो एक बार देख सकते हैं, लेकिन उम्मीदें ज़्यादा ना रखें। एक्टिंग अच्छी है, लेकिन कहानी की कमज़ोरी निराश कर सकती है। यह सीज़न पहले तीन सीज़न के मुकाबले कम प्रभावशाली है। शायद अगले सीज़न में कहानी को पूरा किया जाएगा।

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