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बांग्लादेश की राजनीति की एक मजबूत आवाज़ खामोश: खालिदा ज़िया का 80 साल की उम्र में निधन

एक युग का अंत: खालिदा ज़िया नहीं रहीं, बांग्लादेश की राजनीति में एक बड़ी छाप-बांग्लादेश की पूर्व प्रधानमंत्री और BNP की प्रमुख खालिदा ज़िया का मंगलवार को निधन हो गया। 80 साल की उम्र में उनका जाना न सिर्फ उनके परिवार के लिए बल्कि पूरे देश के लिए एक बड़ी क्षति है। वह बांग्लादेश की पहली महिला प्रधानमंत्री थीं और दशकों तक देश की राजनीति में एक मजबूत और विवादित चेहरा बनी रहीं। उनकी राजनीतिक यात्रा ने पूरे एक युग की दिशा तय की।

महिला नेतृत्व की मिसाल: खालिदा ज़िया का राजनीतिक सफर-खालिदा ज़िया ने उस दौर में सत्ता संभाली जब बांग्लादेश की राजनीति पूरी तरह पुरुषों के कब्जे में थी। उन्होंने न केवल पहली महिला प्रधानमंत्री बनकर इतिहास रचा, बल्कि कई बार सत्ता में वापसी कर यह साबित किया कि जनता के बीच उनकी पकड़ मजबूत थी। उनके राजनीतिक सफर में कई उतार-चढ़ाव आए, लेकिन उन्होंने हर चुनौती का डटकर सामना किया और महिला नेतृत्व की एक नई मिसाल कायम की।

भ्रष्टाचार के आरोप और सुप्रीम कोर्ट की राहत-राजनीति में रहते हुए खालिदा ज़िया पर कई भ्रष्टाचार के मामले लगे। उनका कहना था कि ये आरोप राजनीतिक बदले की भावना से लगाए गए थे। जनवरी 2025 में सुप्रीम कोर्ट ने उन्हें आखिरी भ्रष्टाचार मामले से बरी कर दिया। इससे उन्हें फरवरी 2025 के आम चुनाव में हिस्सा लेने का मौका मिला, लेकिन उनकी खराब सेहत ने उन्हें इस मौके से वंचित कर दिया।

इलाज के लिए विदेश जाने की लंबी जद्दोजहद-2020 में बीमारी के कारण जेल से रिहा होने के बाद खालिदा ज़िया का इलाज लगातार चलता रहा। उनके परिवार ने कई बार तत्कालीन सरकार से विदेश में इलाज की अनुमति मांगी, लेकिन हर बार इनकार किया गया। BNP ने इसे अमानवीय रवैया और राजनीतिक प्रतिशोध बताया। 2024 में सत्ता परिवर्तन के बाद उन्हें विदेश जाने की अनुमति मिली, जहां उन्होंने इलाज कराया।

सैन्य तानाशाही के खिलाफ संघर्ष की पहचान-बांग्लादेश की आज़ादी के बाद का दौर राजनीतिक उथल-पुथल से भरा रहा। खालिदा ज़िया के पति जियाउर रहमान ने 1977 में सत्ता संभाली और बाद में BNP की स्थापना की। उनकी हत्या के बाद खालिदा ज़िया ने सैन्य शासन के खिलाफ मोर्चा संभाला। उनके नेतृत्व में चलाए गए आंदोलन ने 1990 में तानाशाह एच.एम. इरशाद के पतन में अहम भूमिका निभाई।

शेख हसीना से दशकों पुरानी राजनीतिक दुश्मनी-खालिदा ज़िया और शेख हसीना की राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता बांग्लादेश की राजनीति का सबसे बड़ा अध्याय रही। 1991 में पहली बार खालिदा ज़िया ने हसीना को चुनाव में हराया। इसके बाद दोनों के बीच आरोप-प्रत्यारोप, चुनाव बहिष्कार और सियासी तनाव चलता रहा, जिसने देश की राजनीति को गहराई से प्रभावित किया।

विवादों से भरे कार्यकाल और सत्ता में वापसी-1996 के चुनाव में BNP की जीत विवादों में घिरी क्योंकि विपक्ष ने चुनाव का बहिष्कार किया था। सरकार केवल 12 दिन चली। 2001 में खालिदा ज़िया फिर सत्ता में आईं और जमात-ए-इस्लामी के साथ गठबंधन किया। इस दौरान उनके बेटे पर समानांतर सरकार चलाने और भ्रष्टाचार के आरोप लगे, जिसने राजनीतिक माहौल को और जटिल बना दिया।

ग्रेनेड हमला और राजनीति का नया मोड़-2004 में ढाका में हुए ग्रेनेड हमले ने राजनीतिक माहौल को और कड़ा कर दिया। शेख हसीना ने इस हमले के लिए खालिदा ज़िया की सरकार और उनके बेटे को जिम्मेदार ठहराया। इस हमले में 24 लोग मारे गए थे। इसके बाद हसीना ने 2008 का चुनाव जीता और धीरे-धीरे सत्ता पर अपनी पकड़ मजबूत की।

जेल, बीमारी और राजनीति से दूरी-खालिदा ज़िया को भ्रष्टाचार के मामलों में 17 साल की सजा हुई। 2020 में जेल से रिहा कर उन्हें एक किराए के घर में रखा गया, जहां से वह इलाज के लिए अस्पताल जाती रहीं। राजनीति से लगभग दूर होने के बावजूद वह BNP की अध्यक्ष बनी रहीं, जबकि पार्टी की जिम्मेदारी उनके बेटे तारिक रहमान ने संभाली।

आखिरी सार्वजनिक झलक और राजनीतिक विरासत-21 नवंबर को ढाका कैंटोनमेंट में एक सैन्य कार्यक्रम में खालिदा ज़िया आखिरी बार सार्वजनिक रूप से नजर आईं। वह व्हीलचेयर पर थीं और बहुत कमजोर दिख रही थीं। उनके निधन के साथ बांग्लादेश की राजनीति का एक बड़ा अध्याय खत्म हो गया। अब उनके बड़े बेटे तारिक रहमान इस राजनीतिक विरासत के मुख्य उत्तराधिकारी हैं।

 

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