RTE नियमों में बड़ा बदलाव: निजी स्कूलों में अब पहली कक्षा से ही मिलेगा प्रवेश, फैसले पर उठे गंभीर सवाल

छत्तीसगढ़ शिक्षा विभाग के फैसले ने मचाई हलचल: RTE में बदलाव से बढ़ी चिंता-रायपुर में छत्तीसगढ़ सरकार के स्कूल शिक्षा विभाग ने 16 दिसंबर 2025 को एक ऐसा फैसला लिया, जिसने शिक्षा जगत में तहलका मचा दिया। अब शिक्षा का अधिकार अधिनियम (RTE) के तहत निजी स्कूलों में कमजोर वर्ग के बच्चों को सिर्फ कक्षा पहली से ही प्रवेश मिलेगा। इससे पहले यह सुविधा नर्सरी, प्री-प्राइमरी और कक्षा 1 तक थी, लेकिन अब इसे सीमित कर दिया गया है।
RTE कानून के उल्लंघन का आरोप और पैरेंट्स एसोसिएशन की आपत्ति-छत्तीसगढ़ पैरेंट्स एसोसिएशन के प्रदेश अध्यक्ष किष्टोफर पॉल ने इस फैसले को RTE अधिनियम की धारा 12(1)(ग) का उल्लंघन बताया है। उनका कहना है कि कानून में साफ लिखा है कि यदि कोई निजी स्कूल पूर्व-प्राथमिक शिक्षा देता है, तो वहां भी 25 प्रतिशत आरक्षण लागू होना चाहिए। सरकार का यह फैसला कानून की भावना के खिलाफ है और बच्चों के अधिकारों का हनन है।
हाईकोर्ट के फैसले का हवाला और पूर्व-प्राथमिक शिक्षा का महत्व-किष्टोफर पॉल ने कर्नाटक हाईकोर्ट के 2017 के फैसले का जिक्र करते हुए बताया कि RTE के तहत प्रवेश के दो स्तर होते हैं—कक्षा 1 और पूर्व-प्राथमिक स्तर। हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया है कि प्री-स्कूल को RTE से बाहर करना गलत है। प्रारंभिक शिक्षा बच्चों के मानसिक और बौद्धिक विकास के लिए बेहद जरूरी होती है।
सरकार से फैसले पर पुनर्विचार की मांग-पैरेंट्स एसोसिएशन ने सरकार से इस फैसले को तुरंत वापस लेने की अपील की है। उनका मानना है कि गरीब और कमजोर वर्ग के बच्चों को निजी स्कूलों में पूर्व-प्राथमिक स्तर से ही प्रवेश का अधिकार मिलना चाहिए। अगर ऐसा नहीं हुआ, तो सबसे ज्यादा नुकसान उन्हीं बच्चों को होगा, जिनके लिए यह कानून बनाया गया था।
शिक्षा में बढ़ती असमानता और ड्रॉपआउट की आशंका-विशेषज्ञों का कहना है कि सीधे कक्षा 1 में प्रवेश पाने वाले बच्चे उन बच्चों से पीछे रह जाएंगे जो नर्सरी और प्री-प्राइमरी से पढ़ाई कर रहे हैं। इससे अमीर और गरीब के बीच की खाई और गहरी होगी। साथ ही शुरुआती शिक्षा न मिलने से बच्चों का आत्मविश्वास कमजोर होगा, जिससे ड्रॉपआउट दर बढ़ने का खतरा है।
वित्तीय बचत के लिए बच्चों के अधिकारों से समझौता?-आलोचकों का आरोप है कि सरकार पूर्व-प्राथमिक स्तर पर निजी स्कूलों को मिलने वाले रीइंबर्समेंट के खर्च से बचना चाहती है। लेकिन इस फैसले का सीधा असर गरीब बच्चों के भविष्य पर पड़ेगा। विशेषज्ञ मानते हैं कि बजट बचाने के लिए बच्चों के अधिकारों और भविष्य से समझौता करना सही नहीं है।
शिक्षा विभाग का तर्क और आगे की संभावनाएं-शिक्षा विभाग का कहना है कि इस फैसले से प्रवेश प्रक्रिया सरल होगी और गड़बड़ियों पर रोक लगेगी। हालांकि पैरेंट्स एसोसिएशन और शिक्षा विशेषज्ञ इसे गरीब विरोधी फैसला मान रहे हैं। अब देखना होगा कि सरकार इस विरोध को गंभीरता से लेती है या मामला अदालत तक पहुंचता है। छत्तीसगढ़ सरकार का यह फैसला शिक्षा के अधिकार और समावेशी शिक्षा के सिद्धांतों के खिलाफ माना जा रहा है। प्रारंभिक शिक्षा से वंचित रहना कमजोर वर्ग के बच्चों के लिए बड़ा नुकसान होगा। इस मामले में पारदर्शिता और संवेदनशीलता की जरूरत है ताकि हर बच्चे को बराबर का मौका मिल सके।



