‘स्वामी’ शब्द पर सियासी विवाद: रामकृष्ण परमहंस के संबोधन को लेकर ममता बनर्जी और बीजेपी आमने-सामने

रामकृष्ण परमहंस के संबोधन पर विवाद: परंपरा, सम्मान और राजनीति का संगम-भारत की आध्यात्मिक विरासत से जुड़ा एक साधारण सा संदेश अचानक राजनीतिक बहस का रूप ले लिया है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा श्री रामकृष्ण परमहंस की जयंती पर दी गई श्रद्धांजलि में इस्तेमाल किए गए एक शब्द ने पश्चिम बंगाल की राजनीति में नई बहस छेड़ दी है। यह मामला सिर्फ एक शब्द तक सीमित नहीं रहा, बल्कि परंपरा, संस्कृति और धार्मिक संबोधन की सही पद्धति को लेकर बड़ा विवाद बन गया है।
प्रधानमंत्री का संदेश और विवाद की शुरुआत-प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने श्री रामकृष्ण परमहंस की जयंती पर उन्हें श्रद्धांजलि देते हुए उनके भारत की आध्यात्मिक सोच को दिशा देने वाले योगदान को याद किया। अपने संदेश में उन्होंने उन्हें “स्वामी रामकृष्ण परमहंस जी” कहकर संबोधित किया। उनका मकसद सम्मान जताना था, लेकिन इस संबोधन में इस्तेमाल हुआ “स्वामी” शब्द पश्चिम बंगाल की राजनीति में नई बहस का कारण बन गया।
ममता बनर्जी का विरोध: परंपरा का सम्मान जरूरी-पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने इस संबोधन पर आपत्ति जताई। उनका कहना था कि रामकृष्ण परमहंस को पारंपरिक रूप से “ठाकुर” कहा जाता है, खासकर बंगाल में। यह संबोधन वर्षों से चली आ रही परंपरा का हिस्सा है और इसे बदलना उचित नहीं। ममता बनर्जी ने कहा कि रामकृष्ण मठ और मिशन की स्थापना के बाद “स्वामी” शब्द उन संन्यासियों के लिए इस्तेमाल होता है, जिन्होंने औपचारिक रूप से संन्यास लिया हो। इसलिए रामकृष्ण परमहंस के लिए “स्वामी” शब्द का उपयोग परंपरा के अनुरूप नहीं है।
रामकृष्ण परंपरा में संबोधन का महत्व-रामकृष्ण परंपरा में संबोधन की एक तय व्यवस्था है। रामकृष्ण परमहंस को “ठाकुर,” उनकी पत्नी शारदा देवी को “मां,” और स्वामी विवेकानंद को “स्वामीजी” कहा जाता है। यह परंपरा सदियों से चली आ रही है और इसे बनाए रखना जरूरी माना जाता है। ममता बनर्जी का मानना है कि इस तरह के संबोधन से परंपरा की असली भावना को समझने में कमी आती है।
बीजेपी का जवाब: सम्मान के तौर पर “स्वामी” शब्द का इस्तेमाल-बीजेपी नेता अमित मालवीय ने प्रधानमंत्री के संदेश का बचाव करते हुए कहा कि “स्वामी” शब्द का इस्तेमाल पूरी तरह सम्मान के भाव से किया गया था। उनका कहना था कि यह कोई औपचारिक पद नहीं, बल्कि एक आध्यात्मिक गुरु के प्रति सम्मान जताने का तरीका था। उन्होंने बताया कि संस्कृत में “स्वामी” का मतलब आध्यात्मिक गुरु या मार्गदर्शक होता है, और इसका उपयोग केवल रामकृष्ण मठ या मिशन के संन्यासियों तक सीमित नहीं है।
आध्यात्मिक संबोधन से राजनीतिक मुद्दा बनने तक-यह विवाद अब केवल धार्मिक परंपरा तक सीमित नहीं रहा, बल्कि पश्चिम बंगाल की राजनीति में भी इसका असर दिख रहा है। तृणमूल कांग्रेस परंपरा और ऐतिहासिक संबोधन का हवाला दे रही है, जबकि बीजेपी इसे सम्मान और श्रद्धा का प्रतीक बता रही है। विवाद इस बात पर केंद्रित है कि “स्वामी” शब्द को औपचारिक संन्यासी पद माना जाए या सामान्य सम्मानसूचक संबोधन।
परंपरा, सम्मान और राजनीति का संतुलन-रामकृष्ण परमहंस का नाम और संबोधन न केवल बंगाल बल्कि पूरे भारत के आध्यात्मिक इतिहास में महत्वपूर्ण है। इस बहस ने परंपरा, सम्मान और राजनीति के बीच संतुलन की जरूरत को उजागर किया है। यह विवाद आगे भी जारी रह सकता है क्योंकि यह सिर्फ शब्दों का नहीं, बल्कि हमारी सांस्कृतिक और धार्मिक पहचान का मामला है।
इस पूरे मामले से यह साफ होता है कि भारत में धार्मिक और सांस्कृतिक परंपराएं कितनी संवेदनशील होती हैं और उनका राजनीतिक विमर्श में गहरा प्रभाव पड़ता है। ऐसे विवादों में संतुलित दृष्टिकोण और परंपराओं का सम्मान ही सही समाधान हो सकता है।



