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असम चुनाव 2026: BJP का बड़ा दांव, संकल्प पत्र में UCC से 2 लाख नौकरियों तक वादों की भरमार

असम चुनाव 2026: बढ़ता सियासी तापमान और नई रणनीतियां-असम विधानसभा चुनाव 2026 के नजदीक आते ही राजनीति का माहौल पूरी तरह गरम हो चुका है। 31 मार्च को गुवाहाटी में भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) ने अपना संकल्प पत्र जारी किया, जिसमें कई बड़े वादे और योजनाएं शामिल हैं। इस मौके पर केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण, मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा और सर्बानंद सोनोवाल भी मौजूद थे। इस चुनाव में विकास के साथ-साथ सामाजिक और पहचान के मुद्दे भी अहम भूमिका निभा रहे हैं।

बीजेपी का संकल्प पत्र: विकास के साथ सुरक्षा का वादा-बीजेपी ने अपने संकल्प पत्र में साफ कर दिया है कि उनका मकसद सिर्फ चुनाव जीतना नहीं, बल्कि असम को देश का सबसे सुरक्षित और विकसित राज्य बनाना है। पार्टी ने समान नागरिक संहिता (UCC) लागू करने का वादा किया है, लेकिन जनजातीय इलाकों को इससे बाहर रखा जाएगा। इसके अलावा ‘लव जिहाद’ के खिलाफ सख्त कानून लाने और युवाओं के लिए 2 लाख सरकारी नौकरियों का वादा भी किया गया है। बाढ़ से निपटने के लिए 18 हजार करोड़ रुपये खर्च करने की योजना भी शामिल है।

शिक्षा और स्वास्थ्य में सुधार का विजन-संकल्प पत्र में शिक्षा और स्वास्थ्य के क्षेत्र में भी बड़े बदलावों का जिक्र है। ‘एक जिला, एक मेडिकल कॉलेज’ और ‘एक यूनिवर्सिटी’ की योजना से राज्य में बुनियादी सुविधाओं को मजबूत करने का लक्ष्य रखा गया है। इससे न केवल शिक्षा का स्तर सुधरेगा, बल्कि स्वास्थ्य सेवाएं भी बेहतर होंगी, जो आम जनता के लिए राहत की बात होगी।

चुनावी रणनीति: विकास के साथ पहचान की राजनीति-बीजेपी की इस बार की रणनीति दोहरी है। एक तरफ वे विकास और ‘डबल इंजन सरकार’ के मॉडल को जोर दे रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ पहचान से जुड़े मुद्दों जैसे UCC और ‘लव जिहाद’ को भी प्रमुखता दे रहे हैं। इसका मकसद असमिया हिंदू वोटरों को एकजुट करना है। साथ ही, चाय बागान मजदूरों और जनजातीय समुदायों में भी पार्टी की पकड़ मजबूत हो रही है, जो चुनाव में निर्णायक साबित हो सकती है।

कांग्रेस की रणनीति: असंतोष को मुद्दा बनाना-कांग्रेस इस बार जनता के असंतोष को चुनावी मुद्दा बना रही है। बेरोजगारी, महंगाई और ग्रामीण समस्याओं को लेकर पार्टी अपनी पकड़ मजबूत करने की कोशिश कर रही है। कांग्रेस का फोकस अपने पारंपरिक वोट बैंक, खासकर अल्पसंख्यक और ग्रामीण वोटरों को फिर से जोड़ने पर है। पार्टी को उम्मीद है कि अगर ये वोट एकजुट रहे, तो बीजेपी को कड़ी टक्कर दी जा सकती है।

जातीय और सामाजिक समीकरण का महत्व-असम की राजनीति में जातीय और सामाजिक समीकरण हमेशा से निर्णायक रहे हैं। राज्य में मुस्लिम आबादी लगभग 30-35 प्रतिशत है, जो चुनाव में बड़ा प्रभाव डाल सकती है। अगर यह वोट एकजुट होकर किसी एक पार्टी के साथ जाता है, तो चुनाव का नतीजा बदल सकता है। वहीं, असमिया हिंदू वोट बीजेपी का मजबूत आधार हैं। इसके अलावा चाय बागान मजदूर और जनजातीय समुदाय भी करीब 35-40 सीटों पर असर डालते हैं।

असम की सत्ता की चाबी किसके हाथ?-इस चुनाव में वादों से ज्यादा जमीन पर समीकरण और वोटों का बंटवारा मायने रखेगा। सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या कांग्रेस अपना वोट बैंक एकजुट रख पाएगी या वोटों का बिखराव बीजेपी के लिए रास्ता आसान बना देगा। अब सबकी नजर वोटिंग और नतीजों पर टिकी है, जो तय करेंगे कि असम की सत्ता किसके हाथ में जाएगी और राज्य की राजनीति किस दिशा में आगे बढ़ेगी।

असम चुनाव 2026 में विकास, पहचान और सामाजिक समीकरण का मेल ही इस बार की राजनीति की असली कहानी है। आने वाले महीनों में इन सबका असर साफ नजर आएगा और जनता का फैसला राज्य की दिशा तय करेगा।

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