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‘आखिरी सवाल’ रिव्यू: राजनीति, बहस और सच के बीच फंसी एक दमदार कहानी

‘आखिरी सवाल’ रिव्यू: संजय दत्त ने फिर जीता दिल-कुछ फिल्में बिना ज्यादा शोर-शराबे के आती हैं, लेकिन अपनी कहानी और मुद्दों से दर्शकों का ध्यान खींच लेती हैं। ‘आखिरी सवाल’ भी ऐसी ही फिल्म है। निर्देशक अभिजीत मोहन वारंग ने इस राजनीतिक ड्रामा में समाज, राजनीति और विचारधाराओं के टकराव को गंभीरता से पेश किया है। संजय दत्त और नमाशी चक्रवर्ती की जोड़ी कहानी को मजबूती देती है। फिल्म में समीरा रेड्डी, अमित साध, नीतू चंद्रा और मृणाल कुलकर्णी भी अहम भूमिका में हैं। करीब 2 घंटे की यह फिल्म कई सवाल छोड़ जाती है, जिन पर दर्शक सोचते रह जाते हैं।

कॉलेज की बहस से शुरू होती है कहानी-फिल्म की शुरुआत एक कॉलेज कैंपस से होती है, जहां प्रोफेसर गोपाल नाडकर्णी और छात्र विक्की के बीच विचारधाराओं को लेकर तीखी बहस होती है। संजय दत्त प्रोफेसर के रोल में हैं, जबकि नमाशी चक्रवर्ती ने छात्र विक्की का किरदार निभाया है। दोनों के बीच आरएसएस, राजनीति और देश के बदलते माहौल को लेकर कई सवाल-जवाब होते हैं। फिल्म किसी एक सोच को सही या गलत साबित नहीं करती, बल्कि अलग-अलग नजरिए सामने लाती है, जिससे बहसें और भी प्रभावशाली लगती हैं।

टीवी डिबेट और सोशल मीडिया की सच्चाई-‘आखिरी सवाल’ सिर्फ कॉलेज राजनीति तक सीमित नहीं है। यह दिखाती है कि कैसे छोटी घटनाएं मीडिया और सोशल मीडिया के जरिए राष्ट्रीय मुद्दा बन जाती हैं। आज के टीवी डिबेट, सोशल मीडिया ट्रेंड और राजनीतिक माहौल को फिल्म ने बहुत ही वास्तविक तरीके से पेश किया है। कई सीन ऐसे हैं जैसे आप किसी न्यूज चैनल की लाइव बहस देख रहे हों। फिल्म सवाल उठाती है कि क्या आज की राजनीति में संवाद बचा है या सिर्फ आरोप-प्रत्यारोप और शोर ही रह गया है।

संजय दत्त का शांत लेकिन असरदार अभिनय-संजय दत्त लंबे समय बाद एक गंभीर और संयमित किरदार में नजर आए हैं। उन्होंने प्रोफेसर के रोल को बहुत ही सादगी और गहराई से निभाया है। उनके संवाद कम हैं, लेकिन असरदार हैं। उनकी मौजूदगी फिल्म को अलग वजन देती है। यह साबित करता है कि वे सिर्फ एक्शन या बड़े डायलॉग वाली फिल्मों तक सीमित नहीं हैं, बल्कि गंभीर किरदारों में भी उतने ही मजबूत हैं।

नमाशी चक्रवर्ती बने फिल्म का सरप्राइज-नमाशी चक्रवर्ती फिल्म का सबसे बड़ा सरप्राइज साबित हुए हैं। उन्होंने एक ऐसे युवा का किरदार निभाया है जो अपने सवालों को दबाना नहीं चाहता। उनके अंदर गुस्सा, बेचैनी और अपनी बात कहने का आत्मविश्वास साफ दिखता है। उनकी एक्टिंग नेचुरल लगती है और दर्शक उनके किरदार से जुड़ाव महसूस करते हैं। खासकर बहस वाले सीन में उनका अभिनय काफी प्रभावशाली है।

बाकी कलाकारों ने भी निभाई मजबूत भूमिका-अमित साध भले ही कम समय के लिए स्क्रीन पर आए, लेकिन उनका किरदार असर छोड़ता है। समीरा रेड्डी और नीतू चंद्रा ने भी अपने रोल को पूरी ईमानदारी से निभाया है। सपोर्टिंग कास्ट ने कहानी को मजबूती दी है। निर्देशक अभिजीत मोहन वारंग ने फिल्म को ज्यादा ड्रामा या मसालेदार बनाने की बजाय गंभीर और वास्तविक बनाए रखने की कोशिश की है, जो इसकी सबसे बड़ी ताकत है।

देखनी चाहिए या नहीं?-अगर आपको ऐसी फिल्में पसंद हैं जो सिर्फ मनोरंजन नहीं बल्कि सोचने पर मजबूर करें, तो ‘आखिरी सवाल’ आपके लिए सही विकल्प है। यह फिल्म राजनीति, मीडिया और समाज के कई पहलुओं पर सवाल उठाती है। यह पूरी तरह कमर्शियल फिल्म नहीं है, लेकिन इसकी कहानी और अभिनय इसे खास बनाते हैं।

फिल्म डिटेल्स:

फिल्म: आखिरी सवाल
निर्देशक: अभिजीत मोहन वारंग
कलाकार: संजय दत्त, नमाशी चक्रवर्ती, समीरा रेड्डी, अमित साध, नीतू चंद्रा
अवधि: 1 घंटा 57 मिनट
रेटिंग: 3.5/5

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