TMC में सियासी संग्राम तेज, अभिषेक बनर्जी ने बागी सांसदों की कोशिशों पर कसा शिकंजा

अभिषेक बनर्जी ने लोकसभा अध्यक्ष को लिखा पत्र, बागी सांसदों को मान्यता देने से किया इंकार-पश्चिम बंगाल की तृणमूल कांग्रेस (TMC) में चल रहे राजनीतिक संकट ने नया मोड़ ले लिया है। पार्टी के बागी सांसदों की लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला से प्रस्तावित मुलाकात से पहले पार्टी के लोकसभा नेता और महासचिव अभिषेक बनर्जी ने लोकसभा अध्यक्ष को पत्र लिखकर साफ कहा है कि पार्टी के किसी भी अलग गुट को संसदीय मान्यता या कोई सुविधा नहीं दी जानी चाहिए। उन्होंने जोर देकर कहा कि संसद में TMC का प्रतिनिधित्व केवल पार्टी द्वारा अधिकृत नेता और व्हिप के जरिए ही मान्य होगा। इस पत्र को पार्टी सांसद सागरिका घोष और कीर्ति आजाद ने लोकसभा अध्यक्ष को सौंपा है, जो बागी सांसदों की बढ़ती सक्रियता को देखते हुए बड़ा कदम माना जा रहा है।
बागी गुट का दावा 22 सांसदों के समर्थन का, सोमवार को होगी अहम बैठक-TMC के असंतुष्ट नेताओं का गुट लगातार अपनी ताकत दिखा रहा है। वे दावा करते हैं कि उनके साथ कुल 22 सांसद हैं और वे लोकसभा अध्यक्ष से अलग संसदीय समूह के रूप में मान्यता की मांग करेंगे। सांसद काकोली घोष दस्तिदार ने भी कहा है कि दो और सांसद जल्द उनके साथ जुड़ सकते हैं, जिससे उनका दावा और मजबूत होगा। यह बैठक केवल औपचारिक नहीं, बल्कि पार्टी के भविष्य के लिए अहम मानी जा रही है। राजनीतिक जानकारों का मानना है कि अगर बागी सांसदों को मान्यता मिली तो इसका असर पश्चिम बंगाल की राजनीति पर भी गहरा होगा।
अभिषेक बनर्जी ने कानून का हवाला देते हुए रखा पार्टी का पक्ष-अभिषेक बनर्जी ने अपने पत्र में राजनीतिक तर्क के साथ कानूनी पहलुओं का भी जिक्र किया है। उन्होंने बताया कि किसी राजनीतिक दल के विलय या अलग समूह को मान्यता देने के लिए कानून में स्पष्ट प्रावधान हैं। केवल सांसदों की संख्या से अलग पहचान नहीं मिल सकती। उन्होंने कहा कि दो शर्तें पूरी होनी जरूरी हैं: राजनीतिक दल का विलय और दो-तिहाई विधायकों या सांसदों का समर्थन। अभिषेक ने साफ किया कि पार्टी नेतृत्व दल-बदल विरोधी कानून के तहत कार्रवाई करने का अधिकार सुरक्षित रखता है। यह संकेत है कि पार्टी अब राजनीतिक और कानूनी दोनों स्तरों पर लड़ाई के लिए तैयार है।
विधानसभा में भी जारी है बगावत, 64 विधायकों को मिली मान्यता-TMC के भीतर संघर्ष लोकसभा तक सीमित नहीं है। विधानसभा में भी पार्टी को बड़ा झटका लगा है। 80 विधायकों में से 64 ने अलग राह अपनाई है और उन्हें विधानसभा अध्यक्ष ने मान्यता दी है। इस समूह के नेता ऋतब्रत बनर्जी को विपक्ष का नेता बनाया गया है। ममता बनर्जी गुट ने इस फैसले को हाईकोर्ट में चुनौती दी है, लेकिन अदालत ने फिलहाल रोक नहीं लगाई है। यह कानूनी लड़ाई पार्टी की राजनीतिक स्थिति पर असर डाल सकती है और भविष्य में इसके परिणाम महत्वपूर्ण होंगे।
ममता बनर्जी ने पहले ही भंग की पुरानी कमेटियां, नए चेहरे दिए मौका-ममता बनर्जी ने बगावत के संकेत पहले ही भांप लिए थे। 5 जून को उन्होंने पार्टी की पुरानी कमेटियां भंग कर नई समन्वय समिति बनाई थी, जिसमें सायोनी घोष और माला रॉय को जिम्मेदारी दी गई थी। लेकिन अब हालात बदलने पर दोनों नेताओं को पद से हटा दिया गया है। वहीं ममता ने अपने भतीजे अभिषेक बनर्जी को संगठन में बरकरार रखा है, जो पार्टी में उनकी पकड़ को मजबूत करता है।
वफादार सांसदों को संभालने की जिम्मेदारी सौगत राय को मिली-बढ़ते संकट के बीच ममता बनर्जी ने वफादार नेताओं को मजबूत करने की रणनीति अपनाई है। इसी तहत वरिष्ठ सांसद सौगत राय को लोकसभा में पार्टी का मुख्य सलाहकार बनाया गया है। उनकी जिम्मेदारी पार्टी के प्रति वफादार सांसदों को एकजुट रखना और संसद में संगठन से जुड़े मुद्दों पर नजर रखना है। फिलहाल लोकसभा में कुछ ही सांसद पूरी तरह ममता के साथ हैं, इसलिए सौगत राय की भूमिका अहम मानी जा रही है।



