अली खामेनेई के बाद ईरान में उठ रहे बड़े सवाल: सत्ता संघर्ष, जनता का गुस्सा और सेना की भूमिका

अंतिम संस्कार में दिखी एकजुटता, लेकिन अंदरूनी मतभेदों की चर्चा तेज-ईरान के पूर्व सुप्रीम लीडर अली खामेनेई के अंतिम संस्कार में देश के शीर्ष नेता एक साथ नजर आए। राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियान, संसद अध्यक्ष मोहम्मद बाघेर गालिबाफ, न्यायपालिका प्रमुख और IRGC के वरिष्ठ अधिकारी एक मंच पर थे। इस एकजुटता को देश की मजबूती माना गया, लेकिन इसके बाद कई रिपोर्टों में कहा गया कि सत्ता के अंदर मतभेद बढ़ रहे हैं। ये दावे आधिकारिक तौर पर साबित नहीं हुए, लेकिन ईरान की राजनीति में इस बात को लेकर चर्चा तेज हो गई है कि क्या ये एकजुटता सिर्फ दिखावा है।
देश के भविष्य को लेकर उठ रहे हैं कई बड़े सवाल-खामेनेई के निधन के बाद ईरान की सत्ता व्यवस्था और नेतृत्व को लेकर कई सवाल उठे हैं। राजनीतिक विशेषज्ञों का मानना है कि अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि इस्लामिक रिपब्लिक की दिशा क्या होगी और अगला नेतृत्व कौन होगा। यह भी चर्चा में है कि क्या सुप्रीम लीडर का फैसला ही अंतिम रहेगा या अन्य संवैधानिक संस्थाओं की भूमिका बढ़ेगी। संसद, राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद और अन्य संस्थानों के अधिकारों को लेकर भी बहस चल रही है, जिससे ईरान की राजनीतिक व्यवस्था पर नई बहस शुरू हो गई है।
लाइव प्रसारण रुकने के बाद बढ़ीं अंदरूनी मतभेदों की अटकलें-हाल ही में एक घटना ने राजनीतिक हलकों का ध्यान खींचा। जब अमेरिका के साथ हुए समझौते पर संसद अध्यक्ष और वार्ता टीम के नेता लाइव बात कर रहे थे, तभी सरकारी प्रसारण अचानक बंद कर दिया गया। इससे कई तरह की अटकलें लगने लगीं। कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि ईरान में ऐसे समूह हैं जो अमेरिका के साथ बातचीत का विरोध करते हैं। हालांकि सरकार ने इस घटना का कोई स्पष्ट कारण नहीं बताया, जिससे चर्चाएं और बढ़ गईं।
आर्थिक संकट और जनता की नाराजगी बनी बड़ी चुनौती-ईरान लंबे समय से आर्थिक दबाव, अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंध और महंगाई जैसी समस्याओं से जूझ रहा है। साथ ही सरकार विरोधी प्रदर्शनों और उन पर हुई कार्रवाई को लेकर भी विवाद बना हुआ है। मानवाधिकार संगठनों ने प्रदर्शनकारियों पर सख्ती की आलोचना की है, जबकि सरकार का अपना पक्ष अलग है। आर्थिक परेशानियों के कारण आम जनता में असंतोष बढ़ा है। युवा पारंपरिक नियमों से हटकर नई जीवनशैली अपना रहे हैं, जिससे सरकार और समाज के बीच दूरी बढ़ रही है।
नई सत्ता में बदल रहे राजनीतिक समीकरण-राजनीतिक गलियारों में कहा जा रहा है कि नए नेतृत्व के दौर में सत्ता के अंदर कई नए समीकरण बन रहे हैं। कुछ रिपोर्टों में दावा किया गया है कि प्रगतिशील और कूटनीतिक समाधान के पक्षधर नेताओं का प्रभाव बढ़ा है। अमेरिका के साथ समझौते को आगे बढ़ाने में आर्थिक हालात ने भी भूमिका निभाई है। हालांकि इन दावों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है। विशेषज्ञ मानते हैं कि आर्थिक संकट और जनता की मुश्किलों ने सरकार को कई अहम फैसलों पर गंभीरता से सोचने पर मजबूर किया है।
IRGC की भूमिका पर सबकी नजरें टिकी हैं-ईरान की सबसे ताकतवर सैन्य संस्था IRGC की भूमिका को लेकर भी लगातार चर्चा हो रही है। कई विश्लेषकों का मानना है कि देश के भविष्य में IRGC का प्रभाव बहुत अहम होगा। कुछ रिपोर्टों में कहा गया है कि IRGC के भीतर कुछ धड़े अमेरिका के साथ बातचीत के खिलाफ हैं और सख्त रुख अपनाने के पक्ष में हैं। हालांकि इस बात की कोई आधिकारिक पुष्टि नहीं है। आने वाले वक्त में यह देखना जरूरी होगा कि राजनीतिक नेतृत्व, सेना और जनता के बीच संतुलन कैसा बनता है और ईरान किस दिशा में आगे बढ़ता है।



