बस्तर में नक्सलियों का बड़ा आत्मसमर्पण: “पूना मारगेम” अभियान से उम्मीद की नई किरण

छत्तीसगढ़ के नक्सल प्रभावित बस्तर इलाके से एक बड़ी और सकारात्मक खबर आई है। दंतेवाड़ा जिले में चलाए जा रहे “पूना मारगेम (पुनर्वास से पुनर्जीवन)” अभियान के तहत कुल 64 माओवादी कैडरों ने एक साथ हथियार डालकर आत्मसमर्पण किया है। इनमें 36 ऐसे कैडर हैं जिन पर कुल 1 करोड़ 19 लाख 50 हजार रुपये का इनाम था। यह केवल संख्या नहीं, बल्कि बस्तर में धीरे-धीरे हिंसा की जगह विकास और भरोसे की सोच मजबूत होने का संकेत है। आत्मसमर्पण करने वाले माओवादी दरभा डिवीजन, दक्षिण-पश्चिम बस्तर, माड़ क्षेत्र और ओडिशा में सक्रिय थे। इनमें 18 महिलाएं और 45 पुरुष शामिल हैं, जो अलग-अलग स्तर पर संगठन से जुड़े थे। सभी ने दंतेवाड़ा के डीआरजी कार्यालय में वरिष्ठ पुलिस और सीआरपीएफ अधिकारियों की मौजूदगी में हथियार छोड़कर समाज की मुख्यधारा में लौटने का फैसला किया। यह कदम उन परिवारों के लिए भी राहत लेकर आया है, जो वर्षों से अपनों के लौटने का इंतजार कर रहे थे।
वरिष्ठ अधिकारियों की मौजूदगी में हुआ आत्मसमर्पण, सरकार की बड़ी सफलता-इस ऐतिहासिक आत्मसमर्पण के मौके पर पुलिस उप महानिरीक्षक राकेश चौधरी, पुलिस अधीक्षक गौरव राय, सीआरपीएफ के कमांडेंट और अन्य वरिष्ठ अधिकारी मौजूद थे। उन्होंने आत्मसमर्पण करने वालों से बातचीत कर भरोसा दिलाया कि सरकार की पुनर्वास नीति के तहत उन्हें सम्मानजनक जीवन जीने का पूरा मौका मिलेगा। अधिकारियों ने कहा कि यह सिर्फ आत्मसमर्पण नहीं, बल्कि एक नई शुरुआत है। सुरक्षा बलों और प्रशासन का फोकस अब केवल कार्रवाई तक सीमित नहीं है, बल्कि उन लोगों को मुख्यधारा में लाना भी है जो कभी गलत रास्ते पर चले गए थे। कई माओवादी लंबे समय से जंगलों में रहकर हिंसक गतिविधियों में शामिल थे, लेकिन अब वे बच्चों की पढ़ाई, परिवार की जिम्मेदारी और सामान्य जीवन की चाह लेकर आगे बढ़ रहे हैं। यह दिखाता है कि बस्तर में चल रही नीतियां जमीन पर असर दिखा रही हैं और लोगों का भरोसा धीरे-धीरे मजबूत हो रहा है।
‘पूना मारगेम’ अभियान: बस्तर में शांति और विकास की नई मिसाल-बस्तर रेंज के पुलिस महानिरीक्षक सुंदरराज पट्टिलिंगम ने कहा कि “पूना मारगेम” अब बस्तर में स्थायी शांति, गरिमा और समग्र विकास की दिशा में मजबूत आधार बन चुका है। यह अभियान केवल हथियार छोड़वाने तक सीमित नहीं है, बल्कि लोगों को नया जीवन देने की कोशिश है। भारत सरकार, छत्तीसगढ़ शासन, दंतेवाड़ा पुलिस, सीआरपीएफ और स्थानीय प्रशासन मिलकर क्षेत्र में शांति, पुनर्वास और समावेशी विकास के लिए लगातार काम कर रहे हैं। इस अभियान के तहत आत्मसमर्पण करने वालों को सुरक्षा, आर्थिक सहायता, कौशल प्रशिक्षण और रोजगार से जोड़ने की व्यवस्था की जा रही है ताकि वे फिर से हिंसा की ओर न जाएं। अधिकारियों का मानना है कि जब किसी को सम्मान और अवसर मिलता है, तो वह खुद हिंसा से दूरी बना लेता है। बस्तर में अब डर की जगह संवाद और विकास की बात हो रही है।
कुख्यात माओवादी भी शामिल, गंभीर वारदातों में रहे सक्रिय-आत्मसमर्पण करने वालों में कई ऐसे माओवादी शामिल हैं जो पुलिस मुठभेड़ों, आईईडी ब्लास्ट, एम्बुश, आगजनी, हत्या और फायरिंग जैसी गंभीर घटनाओं में सक्रिय थे। इनमें डीवीसीएम, एसीएम, पीपीसीएम, प्लाटून सदस्य, मिलिशिया कमांडर और गार्ड स्तर के कैडर शामिल हैं। इन लोगों पर अलग-अलग जिलों में कई गंभीर मामले दर्ज हैं। बावजूद इसके सरकार की नीति यही है कि जो भी हिंसा का रास्ता छोड़कर समाज में लौटना चाहता है, उसके लिए दरवाजे खुले हैं। अधिकारियों के मुताबिक, इन लोगों से पूछताछ और काउंसलिंग के जरिए न केवल नेटवर्क की जानकारी मिलती है, बल्कि यह भी समझ आता है कि किन हालातों में युवा इस रास्ते पर चले जाते हैं। यह जानकारी आगे की रणनीति तय करने में मदद करती है ताकि आने वाली पीढ़ी को इस दलदल में जाने से रोका जा सके।
आत्मसमर्पण की संख्या में लगातार बढ़ोतरी, नीतियों पर बढ़ता भरोसा-आंकड़ों पर नजर डालें तो आत्मसमर्पण की संख्या लगातार बढ़ रही है। पिछले 22 महीनों में दंतेवाड़ा जिले में 201 इनामी माओवादियों समेत 572 से ज्यादा माओवादी मुख्यधारा में लौट चुके हैं। वहीं ‘लोन वर्राटू अभियान’ के तहत अब तक 369 इनामी सहित कुल 1224 माओवादी आत्मसमर्पण कर चुके हैं। ये आंकड़े दिखाते हैं कि सरकार और सुरक्षा बलों की रणनीति अब केवल दबाव की नहीं, बल्कि भरोसे की भी है। गांव-गांव तक संवाद पहुंचाया जा रहा है, परिवारों को जोड़ा जा रहा है और यह समझाया जा रहा है कि हिंसा से कुछ हासिल नहीं होता। आत्मसमर्पण करने वालों की पुनर्वास की कहानियां अब दूसरों को भी प्रेरित कर रही हैं। जब कोई देखता है कि उसका पुराना साथी सुरक्षित और सम्मान के साथ जीवन जी रहा है, तो वह भी लौटने के बारे में सोचने लगता है।
पुलिस की अपील: हिंसा छोड़िए, परिवार और भविष्य को चुनिए-दंतेवाड़ा पुलिस ने माओवादियों से भावुक अपील की है कि “पूना मारगेम” और “लोन वर्राटू” यह साबित करते हैं कि हर किसी को समाज में लौटने का मौका मिलता है। पुलिस का कहना है कि संवाद, संवेदना और अवसर के जरिए माओवादियों को सम्मानजनक जीवन की ओर लाया जा रहा है। अधिकारियों ने कहा कि अपने परिवार, बच्चों और बस्तर के उज्ज्वल भविष्य के लिए हिंसा का रास्ता छोड़ना जरूरी है। जंगल में डर और असुरक्षा की जिंदगी से बेहतर है कि समाज में लौटकर खुली हवा में सम्मान के साथ जिया जाए। पुलिस ने भरोसा दिलाया कि जो भी आगे आएगा, उसे सरकार की पुनर्वास योजनाओं का पूरा लाभ मिलेगा। यह अपील केवल शब्द नहीं, बल्कि उन सैकड़ों लोगों की बदली हुई जिंदगी का उदाहरण है, जो पहले ही मुख्यधारा में लौट चुके हैं।



