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कैंसर दवाओं की कमी से बढ़ी चिंता, इलाज पर संकट

कैंसर की दवाओं की कमी से बढ़ी चिंता: हजारों मरीजों के इलाज पर संकट
सिस्प्लैटिन और कार्बोप्लैटिन की अहमियत-सिस्प्लैटिन और कार्बोप्लैटिन कैंसर के इलाज में सबसे ज्यादा इस्तेमाल होने वाली कीमोथेरेपी दवाएं हैं। फेफड़े, सिर, गर्दन, अंडाशय और मूत्राशय के कैंसर में ये दवाएं पहली पसंद होती हैं। ये दवाएं कैंसर कोशिकाओं की बढ़त को रोकती हैं। इन दवाओं की कमी से मरीजों की इलाज योजना प्रभावित हो सकती है और इलाज में देरी हो सकती है।

बाजार में दो हफ्तों से दवाओं की कमी-पिछले दो हफ्तों से इन दवाओं की आपूर्ति में भारी कमी आई है। कई शहरों में कम डोज वाली दवाएं खत्म हो चुकी हैं। कुछ जगह ज्यादा डोज वाली दवाएं सीमित मात्रा में उपलब्ध हैं, लेकिन अधिकांश अस्पतालों की जरूरत पूरी नहीं हो पा रही। मेडिकल स्टोर पर नया स्टॉक समय पर नहीं आ रहा है।

प्लैटिनम की बढ़ती कीमत बनी बड़ी वजह-सिस्प्लैटिन और कार्बोप्लैटिन प्लैटिनम आधारित दवाएं हैं। 2023 में प्लैटिनम की कीमत 2,700 रुपये प्रति ग्राम थी, जो अब बढ़कर 7,800 रुपये से ऊपर पहुंच गई है। कच्चे माल की बढ़ती कीमतों ने दवा कंपनियों पर दबाव बढ़ा दिया है, जिससे दवाओं की उपलब्धता प्रभावित हो रही है।

पश्चिम एशिया का तनाव भी समस्या बढ़ा रहा है-पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव और हॉर्मुज जलडमरूमध्य की अनिश्चितता ने सप्लाई चेन को प्रभावित किया है। यह क्षेत्र समुद्री व्यापार का अहम मार्ग है। यहां की अस्थिरता से प्लैटिनम समेत कई कच्चे माल की आपूर्ति और कीमतें प्रभावित हो रही हैं, जिसका असर दवा उद्योग पर पड़ रहा है।

वैश्विक मांग में बढ़ोतरी का असर-दक्षिण अफ्रीका में उत्पादन में दिक्कतें और ऑटोमोबाइल सेक्टर में प्रदूषण नियंत्रण तकनीक के लिए प्लैटिनम की बढ़ती मांग ने कीमतों को बढ़ाया है। ग्रीन हाइड्रोजन जैसी नई ऊर्जा तकनीकों में भी प्लैटिनम का इस्तेमाल बढ़ रहा है। मांग और आपूर्ति के इस अंतर ने वैश्विक बाजार में कीमतें ऊंची कर दी हैं।

भारत के लिए UAE का महत्व-भारत का आधा प्लैटिनम आयात UAE से होता है। पश्चिम एशिया में किसी भी तरह का तनाव भारतीय बाजार को प्रभावित करता है। सप्लाई में बाधा आने से दवा कंपनियों को कच्चे माल की उपलब्धता और लागत दोनों में मुश्किलें आती हैं।

दवाओं के दाम क्यों नहीं बढ़ा पा रही कंपनियां?-सिस्प्लैटिन और कार्बोप्लैटिन दवाएं ड्रग प्राइस कंट्रोल ऑर्डर (DPCO) के तहत आती हैं। सरकार इनके दाम नियंत्रित करती है। कंपनियां लागत बढ़ने के बावजूद दाम ज्यादा नहीं बढ़ा पातीं, जिससे दवाओं की उपलब्धता पर असर पड़ता है।

मरीजों और अस्पतालों की बढ़ती चिंता-दवाओं की कमी से कैंसर मरीजों का इलाज प्रभावित हो रहा है। अस्पतालों को इलाज योजना बदलनी पड़ सकती है या महंगी वैकल्पिक दवाओं का सहारा लेना पड़ सकता है। इससे मरीजों पर आर्थिक बोझ बढ़ेगा। डॉक्टर और अस्पताल जल्द समाधान की मांग कर रहे हैं।

संकट और बढ़ सकता है गंभीर-अगर प्लैटिनम की कीमतें बढ़ती रहीं और सप्लाई चेन पर दबाव बना रहा, तो स्थिति और खराब हो सकती है। स्वास्थ्य क्षेत्र की नजरें सरकार, दवा कंपनियों और सप्लाई नेटवर्क पर टिकी हैं। उम्मीद है कि जल्द ही दवाओं की उपलब्धता सामान्य होगी ताकि इलाज बिना रुकावट चलता रहे।

 

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