क्या आपने देखे हैं छत्तीसगढ़ के ये प्राचीन शिव मंदिर, जहां हर इच्छा होती है पूरी?

भिलाई के चारों ओर महादेव की छटा-भिलाई में भगवान शिव के मंदिरों की भरमार है, लेकिन ख़ास बात यह है कि जिले के चारों ओर उनके अद्भुत स्वरूप विराजमान हैं। आइए, एक नज़र डालते हैं इन पवित्र स्थलों पर:
पूर्व दिशा: देवबलौदा का बिना शिखर वाला मंदिर-12वीं-13वीं शताब्दी में कलचुरी राजवंश के दौरान बना यह मंदिर बलुआ पत्थर से बना है और इसमें एक ख़ास बात है – इसका शिखर नहीं है! इसकी नक्काशी आपको खजुराहो की याद दिलाएगी। मान्यता है कि यहां का शिवलिंग धरती से खुद प्रकट हुआ था। महिलाएं संतान प्राप्ति और कन्याएं मनचाहा जीवनसाथी पाने की कामना लेकर यहां आती हैं। भगवान भोलेनाथ यहां भक्तों की हर मनोकामना पूरी करते हैं।
पश्चिम दिशा: नगपुरा का प्राचीन शिव मंदिर-12वीं सदी में कलचुरी वंश के शासनकाल में बना यह मंदिर पंचरथ योजना में बना है। इसके गर्भगृह में आज भी प्राचीन शिवलिंग विराजमान हैं। महाशिवरात्रि और सावन के सोमवार को यहां भक्तों की भारी भीड़ उमड़ती है। यहां पूजा करने से मनोकामनाएं पूरी होने का मानना है, लोग विवाह और संतान सुख के लिए यहां आते हैं।
उत्तर दिशा: शिवकोकड़ी का भुईफोड़ महादेव-आमनेर नदी के किनारे स्थित यह लगभग 500 साल पुराना मंदिर अपनी अनोखी बनावट के लिए जाना जाता है। यहां का शिवलिंग जमीन से 10 फीट और गर्भगृह में 4 फीट ऊँचा है। इसे ‘मात माले बाबा’ के नाम से भी जाना जाता है। स्थानीय परंपरा के अनुसार, शादी का पहला निमंत्रण भगवान शिव को दिया जाता है। यहां की पूजा से पारिवारिक सुख-समृद्धि की प्राप्ति होती है।
दक्षिण दिशा: कोही का अनंत स्वयंभू शिवलिंग-खारून नदी के तट पर स्थित कोही गांव का यह मंदिर अपने स्वयंभू शिवलिंग के लिए प्रसिद्ध है। कहा जाता है कि यह शिवलिंग लगातार बढ़ रहा है और 25 फीट तक खुदाई करने पर भी इसका अंत नहीं मिला। यहां दर्शन मात्र से ही मनोकामनाएं पूरी होने का मानना है। कन्याएं विवाह और दंपति संतान की कामना लेकर यहां आते हैं।
अतिरिक्त पवित्र स्थल-इसके अलावा, धमधा का बूढ़ेश्वर और चतुर्भुजी मंदिर भी प्रसिद्ध हैं। सहसपुर का शिव मंदिर 13वीं-14वीं शताब्दी का है, जिसे फणी नागवंशी राजाओं ने बनवाया था। यह मंदिर अपनी नागर शैली की वास्तुकला और 16 खंभों वाले मंडप के लिए जाना जाता है।



