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बंगाल की सियासत के बीच पीएम मोदी की नदिया यात्रा, SIR विवाद और चुनावी संदेश पर टिकी नजरें

नदिया दौरे से बंगाल में बढ़ी राजनीतिक हलचल: पीएम मोदी का सियासी और विकास का संदेश-प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का पश्चिम बंगाल के नदिया जिले का दौरा राजनीतिक और विकास दोनों ही दृष्टिकोण से बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है। यह दौरा ऐसे समय में हो रहा है जब राज्य में SIR (स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन) को लेकर राजनीतिक माहौल गरमाया हुआ है। आइए इस दौरे के विभिन्न पहलुओं को विस्तार से समझते हैं।

नदिया दौरे का राजनीतिक महत्व-प्रधानमंत्री मोदी का यह दौरा बंगाल में SIR की ड्राफ्ट सूची जारी होने के बाद पहला दौरा है। पिछले पांच महीनों में यह उनका तीसरा दौरा है, जिससे यह साफ होता है कि यह सिर्फ एक सरकारी कार्यक्रम नहीं बल्कि एक सियासी संदेश भी है। नदिया जिले में मोदी राष्ट्रीय राजमार्ग से जुड़ी बड़ी परियोजनाओं का उद्घाटन करेंगे और एक बड़ी जनसभा को संबोधित करेंगे। इस दौरे को आगामी विधानसभा चुनावों के संदर्भ में भी देखा जा रहा है, जहां राजनीतिक दल अपनी पकड़ मजबूत करने की कोशिश में लगे हैं।

मतुआ समुदाय पर केंद्रित पीएम मोदी का भाषण-प्रधानमंत्री की जनसभा रणघाट के तहेरपुर इलाके में होगी, जो मतुआ समुदाय के प्रभाव वाले क्षेत्र के करीब है। मतुआ समुदाय, जो बांग्लादेश से आए दलित हिंदू हैं, पहचान और दस्तावेजों को लेकर लंबे समय से संवेदनशील मुद्दों का सामना कर रहा है। ड्राफ्ट मतदाता सूची के बाद इस समुदाय में चिंता बढ़ी है, जिसे पीएम मोदी अपने भाषण में सीधे संबोधित कर सकते हैं। यह कदम बीजेपी के लिए रणनीतिक रूप से बहुत महत्वपूर्ण है, खासकर विधानसभा चुनावों को ध्यान में रखते हुए।

SIR प्रक्रिया पर टीएमसी और केंद्र के बीच विवाद-SIR प्रक्रिया को लेकर मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस लगातार विरोध कर रही है। उनका आरोप है कि यह प्रक्रिया जल्दबाजी में की जा रही है, जिससे कई असली मतदाता, खासकर शरणार्थी हिंदू, मताधिकार से वंचित हो सकते हैं। ड्राफ्ट सूची में 58 लाख से अधिक नाम हटाए गए हैं और 1.36 करोड़ नामों में विसंगतियां पाई गई हैं। इसके अलावा लगभग 30 लाख मतदाताओं को अनमैप्ड बताया गया है, जिन्हें आगे जांच का सामना करना पड़ सकता है। इस विवाद ने राजनीतिक तनाव को और बढ़ा दिया है।

मतुआ समुदाय की चिंता और उसका राजनीतिक असर-SIR प्रक्रिया ने मतुआ समुदाय के अंदर पुरानी आशंकाओं को फिर से जगा दिया है। यह समुदाय राज्य की लगभग 80 विधानसभा सीटों पर प्रभाव रखता है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि ड्राफ्ट सूची से बड़ी संख्या में मतुआ मतदाताओं के नाम हटाए गए हैं, और अंतिम सूची में यह संख्या और बढ़ सकती है। दस्तावेजों की कमी भी इस समस्या को और जटिल बना रही है। पिछले चुनावों में बीजेपी ने इस समुदाय में नागरिकता के वादे के जरिए मजबूत पकड़ बनाई थी, और अब यह मुद्दा फिर से चुनावी राजनीति का केंद्र बनता दिख रहा है।

बीजेपी का दावा: पीएम मोदी का संदेश डर को खत्म करेगा-बीजेपी सांसद जगन्नाथ सरकार का कहना है कि SIR को लेकर मतुआ समुदाय में जानबूझकर डर फैलाया जा रहा है। वे उम्मीद जताते हैं कि प्रधानमंत्री मोदी का संदेश इन आशंकाओं को दूर करेगा। वहीं, ममता बनर्जी पहले ही नदिया और उत्तर 24 परगना में SIR के खिलाफ रैलियां कर चुकी हैं। इस तरह पीएम मोदी का यह दौरा सीधे-सीधे राजनीतिक जवाब माना जा रहा है, जहां दोनों दल आमने-सामने हैं।

हाईवे परियोजनाओं से विकास का संदेश-प्रधानमंत्री मोदी अपने दौरे में विकास का एजेंडा भी जोरदार तरीके से पेश करेंगे। वे करीब 3,200 करोड़ रुपये की दो राष्ट्रीय राजमार्ग परियोजनाओं का उद्घाटन और शिलान्यास करेंगे। नदिया जिले में NH-34 के बाराजागुली-कृष्णनगर खंड का चार लेन विस्तार होगा, जबकि उत्तर 24 परगना में बारासात-बाराजागुली खंड का विस्तार शुरू होगा। इन परियोजनाओं से कोलकाता और सिलीगुड़ी के बीच कनेक्टिविटी बेहतर होगी, जिससे व्यापार, पर्यटन और आर्थिक गतिविधियों को बढ़ावा मिलेगा।

चुनावी बिगुल की आहट: क्या है आगे का रास्ता?- प्रधानमंत्री मोदी ने सोशल मीडिया पर कहा है कि बंगाल के लोग केंद्र की योजनाओं का लाभ उठा रहे हैं, लेकिन टीएमसी के कुशासन से परेशान भी हैं। यह बयान आगामी विधानसभा चुनावों का संकेत माना जा रहा है। राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार, यह दौरा बीजेपी के चुनावी रोडमैप की शुरुआत हो सकता है। विकास, पहचान और भरोसे के मुद्दों को जोड़कर पीएम मोदी बंगाल में एक बड़ा सियासी संदेश देने की तैयारी में हैं।

इस तरह, नदिया दौरा न केवल एक विकास परियोजना का उद्घाटन है, बल्कि बंगाल की राजनीति में एक नया अध्याय खोलने वाला कदम भी माना जा रहा है। आगामी चुनावों के मद्देनजर यह दौरा दोनों प्रमुख दलों के बीच टकराव और रणनीति का केंद्र बनेगा।

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