मोदी और शी जिनपिंग की मुलाकात से रिश्तों में आएगी नई गर्माहट? SCO सम्मेलन से जुड़ी बड़ी बातें

SCO समिट में मोदी-शी की मुलाकात: क्या बदलेगा भारत-चीन का रिश्ता?
सबकी निगाहें टिकीं, 10 महीने बाद आमने-सामने होंगे दोनों दिग्गज-लगभग दस महीनों के लंबे इंतजार के बाद, हमारे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग एक बार फिर आमने-सामने बैठकर बातचीत करने वाले हैं। यह मुलाकात इसलिए भी बहुत मायने रखती है क्योंकि हाल के दिनों में भारत और अमेरिका के बीच रिश्तों में थोड़ी खटास आई है, जिसका असर भारत और चीन के आपसी संबंधों पर भी पड़ सकता है। यह खास मौका है SCO यानी शंघाई सहयोग संगठन के दो दिवसीय सम्मेलन का, जहाँ दोनों नेता रविवार को मिलेंगे। सूत्रों की मानें तो चर्चा के लिए इतने सारे अहम मुद्दे हैं कि हो सकता है कि दोनों नेताओं की एक से ज़्यादा बार भी मुलाकात हो। पिछली बार ये दोनों नेता अक्टूबर में रूस के कजान शहर में BRICS सम्मेलन के मौके पर मिले थे। अब देखना यह है कि क्या यह मुलाकात दोनों देशों के बीच रिश्तों को एक नई दिशा दे पाती है।
SCO सम्मेलन: कूटनीति की बड़ी हलचल का गवाह बनेगा चीन-रविवार से चीन में SCO सम्मेलन का आगाज हो रहा है, और इस बार चीन ही इस पूरे आयोजन की मेज़बानी कर रहा है। सम्मेलन की शुरुआत राष्ट्रपति शी जिनपिंग की ओर से आयोजित एक शानदार भोज के साथ होगी, जिसमें 20 से ज़्यादा देशों के राष्ट्राध्यक्ष शिरकत कर रहे हैं। इनमें रूस, पाकिस्तान, ईरान, कजाकिस्तान, किर्गिस्तान, ताजिकिस्तान, उज्बेकिस्तान और बेलारूस जैसे देशों के प्रमुख नेता शामिल होंगे। पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ, नेपाल के प्रधानमंत्री के.पी. शर्मा ओली और मालदीव के राष्ट्रपति मोहम्मद मुइज्जू की मौजूदगी भी इस सम्मेलन को और खास बना रही है। सोमवार को होने वाली लीडर्स समिट को इस साल का सबसे बड़ा अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन माना जा रहा है। कूटनीतिक लिहाज़ से यह चीन के लिए एक बड़ा मौका है, जहाँ वह अपनी ताकत और नेतृत्व क्षमता का प्रदर्शन कर सकता है।
मोदी की एक और अहम मुलाकात: पुतिन से भी होगी बात-SCO सम्मेलन के दौरान ही, भारत लौटने से पहले, प्रधानमंत्री मोदी की एक और महत्वपूर्ण मुलाकात तय है। वे रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन से भी मिलेंगे। इस मुलाकात में भारत और रूस के बीच रक्षा, ऊर्जा और आर्थिक सहयोग जैसे कई अहम मुद्दों पर चर्चा होने की उम्मीद है। मौजूदा वैश्विक हालात और यूक्रेन में चल रहे युद्ध को देखते हुए यह बैठक और भी ज्यादा अहम हो जाती है। राष्ट्रपति पुतिन भी SCO सम्मेलन में शामिल होने के लिए चीन पहुंचे हैं, और उनकी मौजूदगी से इस सम्मेलन का महत्व और भी बढ़ गया है। भारत हमेशा से एक बहु-ध्रुवीय दुनिया का समर्थक रहा है और संतुलित कूटनीति में विश्वास रखता है। ऐसे में, मोदी की यह रूस यात्रा भारत की विदेश नीति को संतुलित करने की दिशा में एक और मजबूत कदम साबित हो सकती है।
चीन के लिए यह साल का सबसे बड़ा कूटनीतिक दांव-चीन की सरकार के मुताबिक, यह SCO सम्मेलन इस साल उनके लिए सबसे बड़ा और सबसे महत्वपूर्ण कूटनीतिक आयोजन है। चीन के उप विदेश मंत्री लियू बिन ने कहा था कि इस सम्मेलन का असर सिर्फ क्षेत्रीय ही नहीं, बल्कि वैश्विक स्तर पर भी महसूस किया जाएगा। चीन इस मंच का इस्तेमाल अपनी ‘शंघाई स्पिरिट’ को आगे बढ़ाने और संगठन के भविष्य के लिए अपनी नई सोच और प्रस्ताव पेश करने के लिए कर रहा है। राष्ट्रपति शी अपने संबोधन में बताएंगे कि SCO को कैसे और मजबूत बनाया जा सकता है और यह संगठन भविष्य में लोगों की उम्मीदों पर खरा कैसे उतरेगा। साफ़ है कि चीन इस मौके का फायदा उठाकर अपनी वैश्विक नेतृत्व की भूमिका को और मज़बूत करना चाहता है।
सैन्य शक्ति का प्रदर्शन: चीन का शक्ति प्रदर्शन-SCO सम्मेलन समाप्त होने के बाद, ज़्यादातर नेता चीन में ही रुकेंगे ताकि 3 सितंबर को बीजिंग में होने वाली विशाल सैन्य परेड को देख सकें। यह परेड चीन-जापान युद्ध में मिली जीत और द्वितीय विश्व युद्ध यानी एंटी-फासिस्ट वॉर की 80वीं वर्षगांठ के उपलक्ष्य में आयोजित की जा रही है। इस परेड के ज़रिए चीन अपनी सैन्य ताक़त और तकनीकी क्षमता का ज़बरदस्त प्रदर्शन करेगा। चीन दुनिया को यह संदेश देना चाहता है कि वह सिर्फ एशिया ही नहीं, बल्कि पूरी दुनिया में एक बड़ी शक्ति के रूप में उभरा है। इस परेड को चीन की ताकत और आत्मनिर्भरता के प्रतीक के तौर पर भी देखा जा रहा है। कुल मिलाकर, यह सम्मेलन और उसके बाद की परेड, चीन की कूटनीति और सैन्य शक्ति को बढ़ावा देने में अहम भूमिका निभाएंगे।



