ईरान पर ट्रंप का बड़ा हमला: अमेरिका ने तीन न्यूक्लियर ठिकानों पर गिराए बम, बढ़ा तनाव

अमेरिका का ईरान पर बड़ा हमला: क्या है पूरा मामला?-यह खबर इन दिनों हर तरफ़ छा गई है: अमेरिका ने ईरान के परमाणु केंद्रों पर हमला कर दिया है! डोनाल्ड ट्रंप ने खुद इस बात की घोषणा की है। लेकिन आखिर ऐसा क्यों हुआ? चलिए, इस घटना के पीछे की पूरी कहानी समझते हैं।
अमेरिका ने क्यों किया हमला?-अमेरिका का कहना है कि ये हमले ईरान के परमाणु कार्यक्रम को हमेशा के लिए कमज़ोर करने के लिए किए गए हैं। उन्होंने बताया कि B-2 स्टील्थ बॉम्बर्स ने ईरान के अंदर बेहद सुरक्षित ठिकानों पर हमला किया। लेकिन सच तो यह है कि इस्रायल पिछले कुछ समय से ईरान पर लगातार हमले कर रहा था, और अब अमेरिका भी इस लड़ाई में खुलकर कूद पड़ा है। अमेरिका के पास ऐसे अत्याधुनिक हथियार हैं जो इस्रायल के पास नहीं हैं, इसलिए यह ज़िम्मेदारी अमेरिका ने उठाई।
ट्रंप का दावा: ईरान को परमाणु शक्ति नहीं बनने देंगे-ट्रंप पहले से ही कह रहे थे कि वे ईरान को परमाणु शक्ति नहीं बनने देंगे। पहले तो उन्होंने धमकियों से काम चलाया, लेकिन अब उन्होंने सीधी सैन्य कार्रवाई कर दी। हालांकि, ट्रंप ने जमीनी सेना भेजने से अभी परहेज़ किया है, उनका कहना है कि वे पूरी तरह से युद्ध में नहीं पड़ना चाहते, लेकिन जवाब देना ज़रूरी था।
ईरान की चेतावनी: अमेरिका को भुगतना होगा नुकसान-ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्ला खामेनेई ने अमेरिका को चेतावनी दी थी कि अगर वह हमलों में शामिल हुआ, तो उसे इसका नुकसान भुगतना पड़ेगा। ईरानी विदेश मंत्रालय ने भी कहा था कि अमेरिकी दखल से क्षेत्र में युद्ध छिड़ सकता है। अब जब अमेरिका ने हमला कर दिया है, तो जवाबी कार्रवाई का खतरा बढ़ गया है।
इस्रायल ने मांगी थी मदद, ट्रंप ने मानी-बताया जा रहा है कि इस्रायल ने ट्रंप से मदद मांगी थी। उन्हें अमेरिका के GBU-57 बम की ज़रूरत थी, जो ज़मीन के बहुत अंदर तक जाकर फट सकता है। ट्रंप ने इस्रायल के दबाव और अपने सहयोगियों की सलाह पर यह फैसला लिया।
युद्ध का बढ़ता खतरा: हूती विद्रोहियों की भी धमकी-इस हमले के बाद यमन के हूती विद्रोही भी सक्रिय हो गए हैं। उन्होंने धमकी दी है कि अगर अमेरिका इस संघर्ष में शामिल रहा, तो वे लाल सागर में अमेरिकी जहाजों पर हमला करेंगे। इससे युद्ध का दायरा और बढ़ सकता है।
क्या बदल गई ट्रंप की रणनीति?-ट्रंप पहले खुद को युद्ध-विरोधी नेता बताते थे, लेकिन अब वे खुद सैन्य कार्रवाई कर रहे हैं। उन्होंने दो बार इस्रायल से हमला टालने को कहा था, लेकिन आखिरकार उन्होंने सैन्य रास्ता चुना। सोशल मीडिया पर उन्होंने कहा कि उन्हें खामेनेई का ठिकाना पता है, लेकिन अभी उन्हें मारने की कोई योजना नहीं है।
2015 का परमाणु समझौता और ट्रंप का विरोध-यह पूरा घटनाक्रम 2015 के परमाणु समझौते से जुड़ा है, जिसे ओबामा प्रशासन ने ईरान के साथ किया था। लेकिन ट्रंप ने 2018 में इस समझौते को रद्द कर दिया था, और अब वे सैन्य ताकत से ईरान को रोकने की कोशिश कर रहे हैं।



