जब छोटे बजट की फिल्मों ने भारत को दिलाई दुनिया में पहचान – नवाज़ुद्दीन सिद्दीकी का खुला बयान

भारत के अनदेखे हीरो: वो फिल्म निर्माता जो दुनिया में भारत का नाम रोशन कर रहे हैं-क्या आप जानते हैं कि कुछ ऐसे फिल्म निर्माता हैं जो भारत की कहानियों को दुनिया भर में ले जा रहे हैं, लेकिन घर पर उन्हें उतना पहचान नहीं मिल पा रही है? नवाज़ुद्दीन सिद्दीकी ने इस मुद्दे पर अपनी राय रखी है और यह जानकर हैरानी होगी कि कैसे हम अपनी ही प्रतिभा को अनदेखा कर रहे हैं।
फेस्टिवल फिल्मों का असली महत्व-हम अक्सर छोटी फिल्मों को ‘फेस्टिवल फिल्म’ कहकर उनकी अहमियत कम आंक देते हैं। लेकिन यही फिल्में हैं जो भारत की असली तस्वीर दुनिया को दिखाती हैं। इन फिल्मों को सिनेमाघरों में उचित जगह नहीं मिलती और न ही उन्हें वह समर्थन मिलता है जिसके वे हकदार हैं। अगर इन फिल्मों को सही समर्थन मिले, तो भारतीय सिनेमा की दुनिया में एक क्रांति आ सकती है। यह सिर्फ फिल्मों तक ही सीमित नहीं है, बल्कि यह हमारे देश की गौरव गाथा भी है।
ग्लोबल पहचान: लोकल कहानियों की ताकत-बॉलीवुड की बड़ी फिल्में जहाँ पश्चिमी दर्शकों को आकर्षित करने में कमयाब नहीं हो पाती हैं, वहीं छोटे फिल्म निर्माताओं की फिल्में दुनिया भर में धूम मचा रही हैं। यह इसलिए है क्योंकि ये फिल्में हमारी ज़िंदगी, हमारी गलियों, हमारे लोगों की कहानियाँ दिखाती हैं। जितनी ज़्यादा हमारी फिल्में हमारे आसपास की ज़िंदगी को दर्शाएंगी, उतनी ही ज़्यादा वो दुनिया भर में अपनी पहचान बनाएंगी। यह हमारी असली पहचान है, हमारी सिनेमाई पहचान।
बॉलीवुड और इंडी सिनेमा: एक तुलना-मुख्यधारा की फिल्में अक्सर हमारे असली किरदारों को दिखाने में नाकाम रहती हैं। भारत की असली तस्वीर दिखाने वाली फिल्में ही दुनिया में अपनी पहचान बना पाती हैं। कई कमर्शियल रूप से सफल फिल्में भी अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपनी जगह नहीं बना पाती हैं, जबकि छोटे फिल्म निर्माता पहले ही यह मुकाम हासिल कर चुके हैं। यह एक बड़ा अंतर है, और इस पर ध्यान देने की ज़रूरत है।
‘द लंचबॉक्स’ और अन्य उदाहरण-‘द लंचबॉक्स’ जैसी फिल्मों ने भारत को दुनिया भर में पहचान दिलाई है। इन फिल्मों का बजट कम होता है, लेकिन इनका विजन बहुत बड़ा होता है। अनुराग कश्यप, पायल कपाड़िया और ऋतेश बत्रा जैसे निर्देशक छोटे फिल्म समारोहों में भी अपनी पहचान रखते हैं, जबकि बड़े बॉलीवुड निर्देशकों का नाम वहां तक नहीं पहुँचता। यह एक सोचने लायक बात है।
नवाज़ुद्दीन सिद्दीकी का अनुभव-नवाज़ुद्दीन सिद्दीकी ने ‘सेक्रेड गेम्स’ जैसी फिल्मों में काम किया है और Cannes Film Festival में भी अपनी उपस्थिति दर्ज कराई है। उनका मानना है कि छोटी फिल्मों में काम करने से उन्हें एक कलाकार के रूप में संतुष्टि मिलती है। वह बड़े प्रोजेक्ट्स भी करते हैं, लेकिन संतुलन बनाए रखना उनके लिए ज़रूरी है।
सवाल अभी भी बाकी हैं-Cannes Film Festival खत्म हो गया, लेकिन सवाल अभी भी बाकी है: क्या हम अपने ही असली टैलेंट को पहचानते हैं? जब दुनिया उन्हें सलाम कर रही है, क्या हम उनके लिए उतना ही सम्मान देते हैं जितना वे पाने के हकदार हैं? यह वक्त है कि हम अपने इंडी फिल्म निर्माताओं को सिर आँखों पर बिठाएँ, क्योंकि असली पहचान वहीं से बनती है।



