इंदौर में CAA सर्टिफिकेट से वोटर बनने की राह में रोड़ा, प्रशासन ने नहीं मानी वैधता

इंदौर (सिटिजनशिप अमेंडमेंट एक्ट) – नागरिकता संशोधन कानून (CAA) के तहत मिले नागरिकता प्रमाण-पत्रों को इंदौर के प्रशासनिक संकुल में मान्यता नहीं दी गई है। पाकिस्तान से आए विस्थापित हिंदू परिवारों ने इन प्रमाण-पत्रों के सहारे मतदाता पहचान पत्र के लिए आवेदन किया था। करीब 40 ऐसे आवेदन इंदौर कलेक्टर कार्यालय के निर्वाचन विभाग तक पहुंचे थे। नागरिकता नियम 2009 के तहत जारी इन सर्टिफिकेट्स की जांच को लेकर कई दिनों तक चर्चा चलती रही। आखिरकार दो दिन पहले ये सभी आवेदन खारिज कर दिए गए। निर्वाचन विभाग में लगाए थे आवेदन हाल ही में पाकिस्तान के सिंध क्षेत्र से विस्थापित होकर आए हिंदू परिवारों ने वोटर ID बनवाने के लिए निर्वाचन विभाग में आवेदन दिए थे। उन्होंने अपने नागरिकता सर्टिफिकेट के तौर पर 2009 के नागरिकता नियमों के नियम 15(1ए) के तहत जारी प्रमाण-पत्र संलग्न किए थे। CAA लागू होने के बाद नियमों में बदलाव हुआ है और अब ये सर्टिफिकेट ऑनलाइन जारी किए जा रहे हैं। ‘सर्टिफिकेट ऑफ नेचुरलाइजेशन’ के नाम से जारी इन प्रमाण-पत्रों को देख कर स्थानीय चुनाव अमला असमंजस में पड़ गया। बताया जा रहा है कि इसी वजह से इन आवेदनों को पहले रोक दिया गया। तय समयसीमा करीब आने पर दो दिन पहले ये सभी आवेदन खारिज कर दिए गए। सबसे ज़्यादा आवेदन विधानसभा क्षेत्र क्रमांक 4 से जुड़े थे।
सत्यापन न होने से बढ़ी चिंता जो सर्टिफिकेट्स लगाए गए थे, उन पर ऊपर गृह मंत्रालय का नाम था, लेकिन नीचे जारीकर्ता अधिकारी के रूप में भोपाल के जनगणना संचालन निदेशालय का नाम लिखा था। ये प्रमाण-पत्र पूरी तरह डिजिटल थे – इनमें न कोई हस्ताक्षर था, न ही कोई सरकारी मुहर। जिला प्रशासन के सूत्रों के अनुसार, चुनाव विभाग पहले ही असमंजस में था कि नागरिकता देना गृह मंत्रालय का काम होता है, तो फिर सर्टिफिकेट पर जनगणना निदेशालय का नाम क्यों है। इसके बाद प्रमाण-पत्रों पर छपे QR कोड को मोबाइल से स्कैन करके ऑनलाइन सत्यापन की कोशिश की गई, लेकिन कोई रिकॉर्ड नहीं मिला। इसके बाद वरिष्ठ अधिकारियों से बात की गई और मौखिक निर्देशों के आधार पर आवेदन रद्द कर दिए गए। पहले होता था सब रिकॉर्ड में जब ‘नईदुनिया’ ने निर्वाचन विभाग के कुछ कर्मचारियों से बात की, तो उन्होंने स्वीकार किया कि CAA के तहत जारी सर्टिफिकेट्स के आधार पर वोटर ID जारी नहीं किए गए। कुछ कर्मचारियों ने बताया कि पहले नागरिकता सर्टिफिकेट जिला कलेक्टर द्वारा जारी होते थे, जिन पर उनके हस्ताक्षर होते थे और जिले में उसका रिकॉर्ड भी रखा जाता था। ऐसे में उन सर्टिफिकेट्स की पुष्टि कर पहचान पत्र आसानी से जारी कर दिए जाते थे। अब न तो कोई रिकॉर्ड मिला और न ही सर्टिफिकेट्स की पुष्टि हो सकी। अगर गलती से कोई फर्जी कार्ड जारी हो जाता तो जिम्मेदार अफसरों की नौकरी पर बन आती, इसलिए आवेदन रद्द करना ही सही समझा गया। ये फैसला वरिष्ठ अधिकारियों की मंजूरी से लिया गया।



