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मोहम्मद यूनुस नहीं देंगे इस्तीफा, बोले- जिम्मेदारी छोड़ना आसान नहीं

कैबिनेट मीटिंग के बाद आया बड़ा बयान – यूनुस कहीं नहीं जा रहे- दो दिन पहले तक ये अटकलें थीं कि अंतरिम सरकार के प्रमुख मोहम्मद यूनुस इस्तीफा देने का मन बना चुके हैं। लेकिन अब उनके एक करीबी सलाहकार वहीदुद्दीन महमूद ने साफ कर दिया है कि यूनुस अपना पद नहीं छोड़ रहे हैं। उन्होंने कहा कि “हमारे सामने कई चुनौतियाँ जरूर हैं, लेकिन हम उनका सामना कर रहे हैं।” उन्होंने ये भी बताया कि न तो यूनुस इस्तीफा देंगे और न ही कैबिनेट के बाकी सलाहकार अपनी ज़िम्मेदारी छोड़ेंगे।

छात्र नेताओं से बातचीत में यूनुस ने जताई थी चिंता- यूनुस के इस्तीफे की अटकलों की शुरुआत तब हुई जब उन्होंने छात्र नेताओं से कहा कि मौजूदा राजनीतिक हालात में काम करना बेहद मुश्किल हो गया है। उन्होंने इस बात पर अफसोस जताया कि राजनीतिक दलों में सुधार को लेकर कोई एकराय नहीं बन पा रही है। इस बयान के बाद से ही ये चर्चा तेज हो गई थी कि क्या वे जल्द ही इस्तीफा दे देंगे। हालांकि, कैबिनेट मीटिंग में उन्हें साथियों ने समझा-बुझाकर रोक लिया।

ECNEC मीटिंग के बाद अचानक बुलाई गई अहम बैठक-यूनुस ने शेर-ए-बांग्ला नगर में नेशनल इकनॉमिक काउंसिल की तय बैठक के बाद अचानक सभी सलाहकारों को बुला लिया। इस बंद कमरे वाली मीटिंग में कुल 19 सलाहकार मौजूद थे। इस दौरान चुनावों, सुधारों और जुलाई घोषणा-पत्र पर बात हुई, जो पिछले साल की छात्र आंदोलन की नींव बनी थी। सलाहकार सैयदा रिजवाना हसन ने बताया कि ये बैठक मौजूदा हालात को देखते हुए बेहद जरूरी थी।

NCP का समर्थन और विपक्ष के नेताओं से मुलाकात की तैयारी-छात्र आंदोलन से बनी नेशनल सिटिज़न पार्टी (NCP) ने यूनुस से मुलाकात कर उन्हें मजबूती से काम करने की सलाह दी। पार्टी संयोजक नाहिद इस्लाम ने कहा कि “देश की सुरक्षा और भविष्य के लिए यूनुस का मजबूत बने रहना ज़रूरी है।” यूनुस अब जल्द ही BNP और जमात-ए-इस्लामी के नेताओं से बातचीत करेंगे। BNP के नेताओं ने भी उम्मीद जताई है कि यूनुस समय से चुनाव कराकर सम्मानजनक तरीके से पद छोड़ेंगे।

चुनावों और सुधारों को लेकर फूट साफ नजर आने लगी है-जमात-ए-इस्लामी के नेता अब्दुल्ला एम ताहेर ने कहा कि चुनाव ही एकमात्र तरीका है जिससे जनता का भरोसा दोबारा जीता जा सकता है। उन्होंने ये भी मांग की कि सिर्फ चुनाव नहीं, बल्कि पॉलिटिकल स्ट्रक्चर में सुधार के लिए भी एक रोडमैप जारी होना चाहिए। वहीं, सलाहकार रिजवाना हसन ने कहा कि अंतरिम सरकार सिर्फ चुनाव कराने के लिए नहीं बनी है, बल्कि न्याय और बदलाव लाने के मकसद से काम कर रही है।

सेना और सरकार के बीच गहराया मतभेद, चुनाव की मांग तेज-यूनुस के इस्तीफे की खबरों के बीच एक और बड़ा मसला सामने आया – सेना और सरकार के बीच मतभेद। सेना प्रमुख वाकर-उज़-ज़मां ने तीन दिन पहले यूनुस से मुलाकात की और चुनाव दिसंबर तक कराने की मांग दोहराई। सेना को इस बात पर भी आपत्ति है कि म्यांमार के राखाइन राज्य के लिए प्रस्तावित मानवीय सहायता कॉरिडोर की जानकारी उन्हें नहीं दी गई। अगले ही दिन सेना प्रमुख ने अफसरों की बैठक बुलाई और नाराज़गी जताई।

सड़क पर उतरे सैनिक, जनता में डर और सतर्कता बढ़ी-सेना ने अपने जवानों को कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए सड़कों पर उतार दिया है। कई जगह उन्हें मजिस्ट्रेटी अधिकार भी दिए गए हैं। हाल ही में बढ़ती ‘मॉब जस्टिस’ की घटनाओं को देखते हुए सेना अब सख्ती के मूड में है। राजधानी ढाका में उनकी गश्त और सुरक्षा व्यवस्था और सख्त हो गई है। जानकारों के मुताबिक यह बैठक सेना की ताकत को और संगठित करने की कोशिश थी।

यूनुस की सरकार ने किया पुराने नेताओं का सफाया-अंतरिम सरकार ने सत्ता में आते ही पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना की पार्टी अवामी लीग को खत्म कर दिया। पार्टी के कई बड़े नेताओं को मानवता के खिलाफ अपराधों के मामलों में जेल भेज दिया गया है। अब BNP और जमात जैसी पार्टियां यूनुस से जल्द से जल्द चुनाव की तारीख घोषित करने की मांग कर रही हैं। हाल ही में BNP ने एक बड़ी रैली करके इस मांग को और तेज कर दिया।

छात्र नेताओं और सलाहकारों के बीच भी छिड़ा टकराव- इस सप्ताह BNP ने कैबिनेट से बचे हुए छात्र प्रतिनिधियों को हटाने की मांग रखी। जवाब में NCP ने दो ऐसे सलाहकारों को हटाने की मांग कर दी जो उनके मुताबिक BNP के एजेंडे पर काम कर रहे हैं। ऐसे में सरकार के अंदर भी दरारें खुलकर सामने आने लगी हैं। इस टकराव ने राजनीतिक संकट को और भी गहरा बना दिया है और देश की 170 करोड़ आबादी एक बार फिर असमंजस में आ गई।

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