MGNREGA के 20 साल: कांग्रेस का आरोप, मोदी सरकार की नई योजना ने खत्म की ग्रामीण रोजगार की गारंटी

मनरेगा की 20वीं सालगिरह: एक ऐतिहासिक योजना से नई चुनौतियां-20 साल पहले आज ही के दिन आंध्र प्रदेश के अनंतपुर जिले के बदनापल्ली गांव से शुरू हुई मनरेगा ने ग्रामीण भारत की तस्वीर बदल दी। कांग्रेस अब कहती है कि मोदी सरकार की नई योजना ने इस ऐतिहासिक योजना की मूल भावना को कमजोर कर दिया है। आइए जानते हैं मनरेगा की खासियत और नई योजना के विवाद।
मनरेगा ने ग्रामीण परिवारों को दिया रोजगार और सम्मान-मनरेगा ने अब तक ग्रामीण परिवारों को करीब 180 करोड़ कार्यदिवस का रोजगार दिया है, जिसमें बड़ी संख्या में महिलाएं शामिल हैं। इस योजना से गांवों में सामुदायिक संपत्तियां बनीं, पलायन कम हुआ और गरीब मजदूरों की सौदेबाजी की ताकत बढ़ी। ग्राम पंचायतें भी मजबूत हुईं, जिससे ग्रामीण विकास को मजबूती मिली।
डायरेक्ट बेनिफिट ट्रांसफर से बढ़ी पारदर्शिता-मनरेगा के तहत मजदूरी सीधे बैंक और पोस्ट ऑफिस खातों में भेजी जाती है, जिससे पारदर्शिता बढ़ी है। छोटे और सीमांत किसानों को अपने खेतों में सिंचाई और कुएं विकसित करने का मौका मिला, जिससे उनकी खेती पर निर्भरता कम हुई और आत्मनिर्भरता बढ़ी।
मनरेगा था अधिकार आधारित कानून-मनरेगा कोई सरकारी वादा नहीं, बल्कि संविधान के अनुच्छेद 41 से निकला एक कानूनी अधिकार था। काम की मांग करने पर रोजगार देना सरकार की जिम्मेदारी थी। ग्राम पंचायतें काम तय करती थीं और राज्य सरकार को केवल 10 प्रतिशत खर्च उठाना पड़ता था, जिससे काम देने में कोई हिचक नहीं होती थी।
सामाजिक ऑडिट से बनी योजना में पारदर्शिता-ग्राम सभा के जरिए सामाजिक ऑडिट और कैग जैसी संस्थाओं की जांच से मनरेगा में गड़बड़ियों पर लगाम लगी। इससे आम लोगों को निगरानी का अधिकार मिला और योजना ग्रामीणों के भरोसे पर खरी उतरी। यही वजह थी कि मनरेगा लंबे समय तक सफल रही।
नई योजना में बढ़ा केंद्रीकरण का आरोप-कांग्रेस का आरोप है कि नई योजना में फैसले अब दिल्ली से होंगे। काम की जरूरत लोगों की मांग पर नहीं, बल्कि सरकार के बजट के हिसाब से मिलेगी। कुछ जिलों में ही काम अधिसूचित होगा, जिससे ग्रामीणों की सौदेबाजी की ताकत कमजोर होगी और पंचायतों की भूमिका सीमित हो जाएगी।
कृषि सीजन में काम बंद होने की चिंता-नई योजना में कृषि के पीक सीजन में दो महीने काम बंद रखने का प्रावधान है। इससे मजदूरों की स्थिति कमजोर होगी क्योंकि वे खेतों में बेहतर मजदूरी के लिए मोलभाव नहीं कर पाएंगे। यह बदलाव ग्रामीण रोजगार पर नकारात्मक असर डाल सकता है।
राज्यों पर बढ़ा वित्तीय बोझ-अब राज्यों को कुल खर्च का 40 प्रतिशत वहन करना होगा। पहले से आर्थिक दबाव झेल रहे राज्य इतने संसाधन जुटा नहीं पाएंगे और काम देना बंद कर सकते हैं। इससे रोजगार की कानूनी गारंटी सिर्फ कागजों तक सीमित रह जाएगी, जो ग्रामीणों के लिए चिंता का विषय है।
कांग्रेस का निष्कर्ष और राजनीतिक संदेश-कांग्रेस का कहना है कि मनरेगा एक परिवर्तनकारी कानून था, जबकि नई योजना उसकी मूल भावना को कमजोर करती है। 20 साल पहले दलित महिला चीमला पेदक्का पहली जॉब कार्ड धारक बनी थीं। विपक्ष का आरोप है कि नई व्यवस्था रोजगार के अधिकार को कमजोर कर रही है।
नई योजना से बदली व्यवस्था-दिसंबर 2025 में पारित ‘विकसित भारत गारंटी फॉर रोजगार एंड आजीविका मिशन (ग्रामीण) अधिनियम’ के तहत मनरेगा को औपचारिक रूप से बदला गया। रोजगार के दिन 100 से बढ़ाकर 125 किए गए हैं, लेकिन फंडिंग और योजना प्रक्रिया में बदलाव को लेकर विपक्ष लगातार सवाल उठा रहा है।



