ईरान संकट से हिला वैश्विक तेल बाजार: क्या अब दुनिया तेजी से तेल पर निर्भरता कम करेगी?

ईरान संकट के बाद तेल बाजार में बेचैनी: होरमुज जलडमरूमध्य और वैश्विक ऊर्जा की नई चुनौतियां-इजराइल और अमेरिका द्वारा ईरान पर हमले के बाद दुनिया के तेल बाजारों में बेचैनी साफ नजर आ रही है। अभी तक सप्लाई में बड़ा व्यवधान नहीं आया है, लेकिन सिर्फ आशंका के कारण ही तेल की कीमतों में तेजी देखी जा रही है। खासतौर पर होरमुज जलडमरूमध्य को लेकर चिंता बढ़ गई है, क्योंकि यह वह मार्ग है जहां से दुनिया का बड़ा हिस्सा तेल गुजरता है।
होरमुज जलडमरूमध्य पर खतरा और तेल की कीमतों में उछाल-होरमुज जलडमरूमध्य ईरान, ओमान और यूएई के बीच स्थित एक बेहद अहम समुद्री मार्ग है। दुनिया में जो तेल खरीदा-बेचा जाता है, उसका लगभग 20 प्रतिशत इसी रास्ते से गुजरता है। हाल ही में यहां एक तेल टैंकर पर हमला हुआ, जिससे समुद्री आवाजाही लगभग ठप हो गई। तेल बाजार आगे की आशंकाओं को देखते हुए काम करता है, इसलिए खतरे की खबरें ही कीमतों को ऊपर ले जाती हैं।
तेल: सिर्फ ईंधन नहीं, बल्कि वैश्विक ताकत का आधार-तेल कोई आम वस्तु नहीं है। जिस देश के पास तेल का नियंत्रण होता है, उसकी वैश्विक राजनीति में बड़ी पकड़ होती है। 1973 में OPEC देशों ने सप्लाई घटाकर कीमतें चार गुना कर दी थीं। आज भी रूस-यूक्रेन युद्ध और ईरान-वेनजुएला पर प्रतिबंधों ने सप्लाई और व्यापार की दिशा बदल दी है। हालिया हमलों के बाद ब्रेंट क्रूड की कीमत करीब 76 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गई है, जो कुछ हफ्ते पहले 68 डॉलर के आसपास थी।
तेल पर निर्भरता कम करने की होड़-दुनिया के कई देश अब तेल पर अपनी निर्भरता कम करने की कोशिश कर रहे हैं। रूस-यूक्रेन युद्ध और ईरान संकट ने ऊर्जा सुरक्षा को प्राथमिकता बना दिया है। उदाहरण के तौर पर, भारत ने 2015 में नेपाल की तेल आपूर्ति रोकने के बाद वहां इलेक्ट्रिक वाहनों को तेजी से बढ़ावा दिया। वहीं, क्यूबा में अमेरिकी दबाव के कारण तेल की कमी हुई तो वहां सोलर पैनलों का आयात कई गुना बढ़ गया।
ऊर्जा का बदलता गणित: नवीकरणीय ऊर्जा की बढ़ती अहमियत-सोलर और विंड ऊर्जा को समुद्री रास्तों से लाने की जरूरत नहीं होती। एक बार सोलर पैनल या विंड टरबाइन लग जाए तो बिजली स्थानीय स्तर पर बनती है। इसी वजह से युद्ध के दौरान यूक्रेन नवीकरणीय ऊर्जा पर ज्यादा ध्यान दे रहा है, क्योंकि विकेंद्रीकृत ऊर्जा ढांचे को पूरी तरह नष्ट करना मुश्किल होता है। इलेक्ट्रिक वाहन भी इसी रणनीति का हिस्सा हैं। चीन जैसे बड़े तेल आयातक देश तेजी से ईवी की ओर बढ़ रहे हैं।
ऑस्ट्रेलिया जैसे देशों पर बढ़ता खतरा-ऑस्ट्रेलिया जैसे देश अपनी जरूरत का अधिकांश ईंधन आयात करते हैं। अगर वैश्विक तनाव के कारण तेल महंगा हो जाता है तो इसका असर पेट्रोल पंप से लेकर रोजमर्रा की जरूरतों तक महसूस किया जाएगा। हालांकि इलेक्ट्रिक वाहनों की संख्या बढ़ रही है, लेकिन अभी भी परिवहन क्षेत्र काफी हद तक विदेशी तेल पर निर्भर है, जो आर्थिक जोखिम को बढ़ाता है।
ऊर्जा नीति ही सुरक्षा नीति बन गई है-नवीकरणीय ऊर्जा पूरी तरह जोखिम खत्म नहीं करती क्योंकि सोलर पैनल, बैटरी और ईवी निर्माण का बड़ा हिस्सा अभी चीन में केंद्रित है। फिर भी एक बड़ा फर्क यह है कि तेल की तरह लगातार आयात की जरूरत नहीं पड़ती। दशकों से तेल वैश्विक राजनीति को आकार देता रहा है, लेकिन अब तेल पर निर्भरता कम करना सिर्फ पर्यावरण का मुद्दा नहीं, बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा और आर्थिक स्थिरता का भी सवाल बन चुका है।
ईरान संकट के बाद तेल की कीमतों में उछाल और सप्लाई को लेकर चिंता बढ़ी है। हालांकि अभी तक सप्लाई में बड़ा व्यवधान नहीं आया, लेकिन दुनिया अब अस्थिर माहौल में तेल पर अत्यधिक निर्भर रहने के खतरे को नए सिरे से समझ रही है। भविष्य में ऊर्जा के लिए नवीकरणीय विकल्पों को अपनाना ही स्थिरता और सुरक्षा का रास्ता होगा।



