भारत ने पड़ोसी देशों के निवेश नियमों में किया बड़ा बदलाव: चीन की प्रतिक्रिया और असर

भारत सरकार ने हाल ही में पड़ोसी देशों के निवेश को लेकर अपने विदेशी निवेश (FDI) नियमों में महत्वपूर्ण बदलाव किए हैं। इस फैसले के बाद चीन ने आधिकारिक तौर पर कोई प्रतिक्रिया नहीं दी है, लेकिन चीनी कारोबारियों और विशेषज्ञों ने इसे आंशिक सुधार बताया है। इस लेख में हम विस्तार से जानेंगे कि ये बदलाव क्या हैं, चीन की प्रतिक्रिया कैसी रही और इसका भारत-चीन संबंधों पर क्या असर पड़ सकता है।
भारत ने FDI नियमों में किए अहम बदलाव-भारत सरकार ने विदेशी निवेश के नियमों में बदलाव करते हुए कहा है कि अब उन विदेशी कंपनियों को, जिनमें भारत से जमीन की सीमा साझा करने वाले देशों के निवेशकों की हिस्सेदारी 10% तक है, भारत में निवेश के लिए सरकारी मंजूरी लेने की जरूरत नहीं होगी। हालांकि, यह छूट पूरी तरह से नहीं है और सेक्टर के हिसाब से निवेश की सीमा और अन्य नियम पहले की तरह लागू रहेंगे। इसका मतलब है कि कई मामलों में पुराने नियम अभी भी मान्य रहेंगे।
पहले नियम थे बहुत सख्त, अब थोड़ी राहत मिली-पहले विदेशी कंपनियों को भारत में निवेश के लिए सरकार की अनुमति लेना जरूरी था, भले ही उनमें भारत से सीमा साझा करने वाले देशों का एक भी शेयरधारक हो। अब इस नियम को थोड़ा आसान बनाया गया है, जिससे सीमित हिस्सेदारी वाली कंपनियों को निवेश में कुछ राहत मिल सकती है। यह बदलाव निवेशकों के लिए एक सकारात्मक संकेत माना जा रहा है।
चीन ने आधिकारिक प्रतिक्रिया देने से किया इनकार-भारत के इस फैसले पर चीन की सरकार ने कोई सीधी प्रतिक्रिया नहीं दी है। जब चीनी विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता से इस बारे में पूछा गया, तो उन्होंने कहा कि संबंधित विभाग ही इस पर बेहतर जानकारी दे सकते हैं। इस तरह चीन ने फिलहाल इस नीति बदलाव पर खुलकर कुछ कहने से बचाव किया है।
चीनी मीडिया ने बताया छह साल बाद बड़ा बदलाव-चीन की सरकारी समाचार एजेंसी Xinhua ने अपनी रिपोर्ट में कहा कि यह भारत की FDI नीति में छह साल बाद सबसे बड़ा बदलाव है। हालांकि, उन्होंने यह भी कहा कि यह बदलाव पूरी तरह से निवेश खोलने जैसा नहीं है, बल्कि सीमित स्तर पर सुधार है। इसे चीन की तरफ से आंशिक सुधार के रूप में देखा जा रहा है।
चीनी कारोबारी बोले—यह आंशिक सुधार है, पूरी उदारीकरण नहीं-भारत में काम कर रहे चीनी कारोबारी संगठनों का मानना है कि यह बदलाव निवेश नीति में आंशिक सुधार है, लेकिन इसे पूरी तरह से उदारीकरण नहीं कहा जा सकता। जिन निवेशों में चीनी कंपनियों का बड़ा नियंत्रण होगा, उन पर अभी भी मंजूरी की प्रक्रिया लागू रहेगी। इसलिए बड़े निवेशों पर पाबंदियां बनी रहेंगी।
फास्ट ट्रैक मंजूरी कुछ खास सेक्टरों तक सीमित-चीनी उद्योग जगत का कहना है कि भारत में 60 दिनों के भीतर मिलने वाली तेज मंजूरी सभी उद्योगों पर लागू नहीं है। यह सुविधा मुख्य रूप से इलेक्ट्रॉनिक कंपोनेंट्स और पॉलीसिलिकॉन जैसे सीमित क्षेत्रों के लिए है। बाकी उद्योगों में निवेश के लिए अभी भी सख्त जांच और मंजूरी की प्रक्रिया से गुजरना होगा।
भारत के बड़े बाजार से चीन को उम्मीदें-चीन इस समय इलेक्ट्रिक वाहन और बैटरी जैसे नए क्षेत्रों में उत्पादन क्षमता बढ़ाने की चुनौती से जूझ रहा है। घरेलू बाजार में मांग सीमित होने के कारण चीनी कंपनियां विदेशी बाजारों की ओर देख रही हैं। भारत जैसे बड़े बाजार को देखते हुए चीन के कारोबारी वर्ग को उम्मीद है कि भविष्य में भारत EV, बैटरी और संबंधित उद्योगों के लिए और दरवाजे खोलेगा।
भारत के उद्योगों को भी चीनी तकनीक की जरूरत-भारत मोबाइल निर्माण, सेमीकंडक्टर, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और नई ऊर्जा वाहनों जैसे क्षेत्रों को तेजी से विकसित करना चाहता है। इन क्षेत्रों में चीनी तकनीकी विशेषज्ञता और कौशल का बड़ा योगदान माना जाता है। हालांकि, भारत की नीति पूरी तरह खुली नहीं है और सरकार जरूरत के हिसाब से ही निवेश की अनुमति देती है।
विशेषज्ञों का मानना—भारत की नीति में संतुलन दिखता है-चीनी विशेषज्ञों के अनुसार भारत की निवेश नीति में संतुलन नजर आता है। एक तरफ भारत चीनी पूंजी के प्रभाव को लेकर सतर्क है और कई क्षेत्रों में प्रतिबंध रखता है, वहीं दूसरी तरफ तकनीक और उत्पादन बढ़ाने के लिए उसे चीनी निवेश और विशेषज्ञता की भी जरूरत है। यह नीति दोनों पक्षों के हितों को ध्यान में रखकर बनाई गई है।
भारत-चीन संबंधों में सुधार के बाद चर्चा तेज-Tsinghua University के रिसर्च निदेशक Qian Feng के मुताबिक, 2024 में रूस केकजान शहर में दोनों देशों के नेताओं की मुलाकात के बाद भारत-चीन संबंधों में कुछ सुधार देखने को मिला है। उनका मानना है कि निवेश नीति में यह बदलाव उसी सकारात्मक माहौल का हिस्सा हो सकता है।
गलवान झड़प के बाद बिगड़े थे संबंध-2020 में गलवान घाटी में हुई सैन्य झड़प के बाद भारत-चीन के रिश्ते काफी तनावपूर्ण हो गए थे। इसके बाद भारत ने कई चीनी मोबाइल ऐप्स पर प्रतिबंध लगा दिया था। इस घटना ने दोनों देशों के बीच विश्वास की कमी पैदा कर दी थी।
व्यापार बढ़ा लेकिन घाटा भी बढ़ा-हालांकि प्रत्यक्ष निवेश कम हुआ, भारत और चीन के बीच व्यापार लगातार बढ़ा है। चीन भारत का दूसरा सबसे बड़ा व्यापारिक साझेदार बन चुका है। 2024-25 में भारत का चीन को निर्यात लगभग 14.25 अरब डॉलर रहा, जबकि चीन से आयात 113 अरब डॉलर से अधिक हो गया। इससे दोनों देशों के बीच व्यापार घाटा भी बढ़ा है।
भारत ने पड़ोसी देशों के निवेश नियमों में बदलाव कर एक संतुलित नीति अपनाई है, जो सीमित राहत देती है लेकिन बड़े निवेश पर पाबंदियां बरकरार रखती है। चीन ने इस बदलाव पर आधिकारिक प्रतिक्रिया नहीं दी, लेकिन कारोबारी और विशेषज्ञ इसे आंशिक सुधार मानते हैं। यह कदम भारत-चीन संबंधों में सुधार की दिशा में एक सकारात्मक संकेत हो सकता है, जबकि दोनों देशों के बीच व्यापारिक गतिशीलता भी जारी है।



