केरल चुनाव से पहले मछुआरों की आवाज: “सरकार कोई भी बने, हमारी जिंदगी वही संघर्ष वाली”

केरल विधानसभा चुनाव से पहले मछुआरों की आवाज़: बदलाव की उम्मीद या फिर वही पुरानी कहानी?-केरल में 9 अप्रैल को होने वाले विधानसभा चुनाव से पहले तटीय इलाकों में रहने वाले मछुआरों की एक ही बात बार-बार सुनने को मिल रही है—चाहे सरकार कोई भी बने, उनकी जिंदगी में ज्यादा फर्क नहीं पड़ता। समुद्र से रोज़ी-रोटी कमाने वाले इन लोगों का कहना है कि उनकी समस्याओं को हमेशा नजरअंदाज किया गया है और आज भी हालात वैसे ही बने हुए हैं। आइए विस्तार से जानते हैं मछुआरा समुदाय की नाराजगी, उनकी उम्मीदें और चुनाव से जुड़ी बड़ी चुनौतियां।
मछुआरा समुदाय की नाराजगी और चुनावी उम्मीदें-केरल के मछुआरों में ज्यादातर लैटिन कैथोलिक समुदाय के लोग हैं, जिनकी संख्या लगभग 20 लाख के करीब है। यह समुदाय एकजुट वोट बैंक नहीं माना जाता, लेकिन चर्च का इनकी वोटिंग पर गहरा असर होता है। मछुआरे कहते हैं कि वे सभी पार्टियों के घोषणापत्र का इंतजार करेंगे और उसी के आधार पर वोट देंगे। उनकी उम्मीद है कि इस बार उनकी समस्याओं को गंभीरता से लिया जाएगा और चुनावी वादे पूरे होंगे।
विकास हुआ, लेकिन फायदा पूरी तरह नहीं मिला-तिरुवनंतपुरम के विजिंजम में बने देश के सबसे बड़े ट्रांसशिपमेंट पोर्ट को लेकर लोगों की राय बंटी हुई है। कुछ इसे विकास का बड़ा कदम मानते हैं, जबकि कई स्थानीय लोग कहते हैं कि इसका पूरा फायदा उन्हें नहीं मिला। युवाओं को पोर्ट में रोजगार मिला है, लेकिन उम्मीद के मुताबिक नहीं। लोग चाहते हैं कि विकास का लाभ आसपास के लोगों तक भी पहुंचे, तभी वे इसे सही मायने में विकास मानेंगे।
विस्थापन और अधूरी योजनाओं का मुद्दा-पोर्ट के निर्माण के कारण कई परिवारों को अपने घर छोड़ने पड़े। सरकार ने करीब 1600 परिवारों को नए घर देने का वादा किया है और इस काम की शुरुआत भी हो चुकी है। लेकिन स्थानीय लोग चाहते हैं कि यह प्रक्रिया तेजी से पूरी हो और सभी वादे समय पर पूरे हों। पहले इस मुद्दे पर चर्च के नेतृत्व में विरोध प्रदर्शन भी हुए थे, लेकिन सरकार के हस्तक्षेप से स्थिति फिलहाल शांत है।
मुथालापोझी और तटीय सुरक्षा बना बड़ा चुनावी मुद्दा-कोवलम क्षेत्र में जहां पोर्ट का मुद्दा है, वहीं पास के चिरायिंकीझू इलाके में समुद्री दीवार और नदी के मुहाने पर जमा रेत हटाने का मामला गरमाया हुआ है। मुथालापोझी में कई हादसे हो चुके हैं, जिससे लोगों में डर बना हुआ है। सरकार ने इस समस्या के समाधान के लिए फंड की घोषणा की है, लेकिन अब तक कोई ठोस काम शुरू नहीं हुआ। इसी वजह से मछुआरे कई बार सड़क पर उतरकर विरोध कर चुके हैं।
समुद्री कटाव और जलवायु बदलाव की मार-केरल के 590 किलोमीटर लंबे तट पर रहने वाले मछुआरे समुद्री कटाव और जलवायु परिवर्तन की मार झेल रहे हैं। एर्नाकुलम के चेल्लानम में सरकार ने समुद्री दीवार बनाकर बड़ी समस्या को कुछ हद तक हल किया है, जिससे वहां के लोगों को राहत मिली है। अब दूसरे इलाकों के लोग भी ऐसी ही योजनाओं की मांग कर रहे हैं ताकि उनके गांव सुरक्षित रह सकें और बार-बार नुकसान से बचा जा सके।
घटती मछलियां और पानी की समस्या भी बड़ी चिंता-मछुआरों की एक और बड़ी परेशानी यह है कि अब समुद्र में मछलियों की संख्या कम हो गई है। जलवायु बदलाव के कारण उन्हें अब दूर तक जाना पड़ता है और साल में केवल 3-4 महीने ही अच्छी मछली मिल पाती है। इसके अलावा विजिंजम जैसे इलाकों में पीने के पानी की भी समस्या है। लोग आज भी पैसे देकर पानी खरीदने को मजबूर हैं। स्थानीय लोगों का कहना है कि यह मुद्दा कई बार उठाया गया, लेकिन अभी तक कोई ठोस समाधान नहीं निकला है।
केरल के मछुआरा समुदाय की जिंदगी में बदलाव की उम्मीदें चुनाव के साथ जुड़ी हैं, लेकिन उनकी नाराजगी भी साफ नजर आती है। विकास के बावजूद उनकी कई समस्याएं जस की तस बनी हुई हैं। इस बार की सरकार से उनकी यही उम्मीद है कि वे उनकी आवाज़ को गंभीरता से सुनें और उनके लिए ठोस कदम उठाएं। तभी जाकर मछुआरों की जिंदगी में असली बदलाव आ सकेगा।



