केरल में बदली सत्ता की तस्वीर: 50 साल बाद भारत में नहीं बचेगी कोई वामपंथी सरकार

केरल में सत्ता का बड़ा बदलाव: 50 साल बाद भारत में खत्म हुई वामपंथी सरकार-केरल विधानसभा चुनाव 2026 के नतीजों ने देश की राजनीति में एक नया अध्याय शुरू कर दिया है। CPI(M) के नेतृत्व वाली LDF सरकार की हार के साथ ही 50 साल बाद पहली बार भारत में कोई भी वामपंथी सरकार नहीं बची है। यह बदलाव राजनीतिक परिदृश्य में एक नई दिशा की ओर इशारा करता है।
केरल का आखिरी वामपंथी किला टूटा-केरल लंबे समय से वामपंथी राजनीति का मजबूत गढ़ रहा है। पिनराई विजयन के नेतृत्व में LDF ने 2016 में सत्ता संभाली थी और यह देश की आखिरी वामपंथी सरकार थी। लेकिन 2026 के चुनाव में जनता ने बदलाव का मन बनाया और LDF को सत्ता से बाहर कर दिया, जिससे वामपंथ का आखिरी किला भी गिर गया।
UDF की जोरदार वापसी, कांग्रेस फिर से आगे-इस चुनाव में UDF ने जबरदस्त प्रदर्शन किया है। शुरुआती रुझानों के मुताबिक UDF 140 में से करीब 100 सीटों पर आगे चल रही है, जबकि LDF केवल 40 सीटों तक सीमित हो गई है। यह साफ संकेत है कि इस बार जनता ने विपक्ष को मौका देने का फैसला किया है।
1977 के बाद पहली बार बड़ा बदलाव-यह नतीजा इसलिए भी खास है क्योंकि 1977 के बाद पहली बार भारत में कोई भी कम्युनिस्ट मुख्यमंत्री नहीं होगा। वामपंथी गठबंधन ने पश्चिम बंगाल में 1977 से 2011 तक लगातार 34 साल शासन किया था, जिसे बाद में ममता बनर्जी की पार्टी ने खत्म किया था। अब केरल में भी यह दौर समाप्त हो गया है।
त्रिपुरा और बंगाल के बाद केरल भी वामपंथ से दूर-वामपंथ का प्रभाव पहले ही कई राज्यों में कम होता दिख रहा था। त्रिपुरा में 1993 से 2018 तक सत्ता में रहने के बाद वामपंथी दलों को हार का सामना करना पड़ा। पश्चिम बंगाल में भी 2011 के बाद उनका प्रभाव खत्म हो गया। अब केरल के भी हाथ से निकलने के बाद वामपंथ की स्थिति और कमजोर हो गई है।
2009 के बाद वामपंथी गिरावट का दौर-राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि 2009 के लोकसभा चुनाव के बाद से वामपंथी दलों का प्रभाव धीरे-धीरे कम होता गया। राष्ट्रीय स्तर पर उनकी पकड़ कमजोर हुई और राज्यों में भी उनका आधार सिकुड़ता गया। यह गिरावट अब निर्णायक रूप ले चुकी है।
देश की राजनीति में नए समीकरण बनेंगे-केरल के इस नतीजे के बाद देश की राजनीति में नए समीकरण बनना तय है। वामपंथ की गैरमौजूदगी से राजनीतिक संतुलन बदलेगा और कांग्रेस समेत अन्य दलों के लिए नई संभावनाएं खुलेंगी। आने वाले समय में इसका असर राष्ट्रीय राजनीति पर भी साफ नजर आएगा।



