नेपाल का बड़ा फैसला: अब मेरिट से बनेंगे राजदूत, सिफारिश और राजनीति को अलविदा

नेपाल में कूटनीति में बड़ा बदलाव: पहली बार खुले तरीके से होगी राजदूतों की भर्ती-नेपाल सरकार ने कूटनीति के क्षेत्र में एकनया और पारदर्शी कदम उठाया है। प्रधानमंत्री बालेन शाह की सोच के तहत अब राजदूतों की नियुक्ति के लिए ओपन भर्ती प्रक्रिया शुरू की जा रही है। इसका मतलब है कि विदेश मंत्रालय विज्ञापन जारी करेगा और इच्छुक उम्मीदवार सीधे आवेदन कर सकेंगे। यह पहली बार है जब नेपाल में इस तरह की खुली प्रक्रिया अपनाई जा रही है, जिससे योग्य और सक्षम लोगों को मौका मिलेगा।
राजनीतिक सिफारिश से हटकर अब मेरिट पर होगा जोर-पहले नेपाल में राजदूत बनने के लिए राजनीतिक पहचान या सिफारिश का बड़ा महत्व था। लेकिन अब सरकार इस परंपरा को बदलना चाहती है। विदेश मंत्री शिशिर खनाल ने स्पष्ट किया है कि जल्द ही इस नई प्रक्रिया के तहत वैकेंसी निकाली जाएंगी और चयन पूरी तरह योग्यता और अनुभव के आधार पर होगा। इसका मकसद देश का प्रतिनिधित्व करने वाले लोगों की गुणवत्ता बढ़ाना है।
योग्यता और अनुभव को मिलेगा प्राथमिकता-नई भर्ती प्रक्रिया में उम्मीदवारों की शैक्षणिक योग्यता, काम का अनुभव और अंतरराष्ट्रीय मामलों की समझ को अहमियत दी जाएगी। आवेदन करने वालों को अपने रिसर्च पेपर और कार्य रिकॉर्ड भी प्रस्तुत करना होगा। सरकार यह सुनिश्चित करना चाहती है कि जो व्यक्ति राजदूत बने, वह अपने काम में दक्ष हो और जिस देश में भेजा जाए, वहां की संस्कृति और राजनीति की अच्छी समझ रखता हो।
राजनीतिक कोटे की जगह विशेषज्ञों को मिलेगा मौका-अब तक नेपाल में आधे राजदूत विदेश मंत्रालय के अधिकारियों में से और बाकी आधे राजनीतिक कोटे से चुने जाते थे। लेकिन बालेन शाह सरकार इस राजनीतिक कोटे को खत्म कर विशेषज्ञों को मौका देना चाहती है। इससे उन लोगों को फायदा होगा जो राजनीतिक दलों से जुड़े बिना भी अंतरराष्ट्रीय मामलों में अच्छी पकड़ रखते हैं और देश की सेवा कर सकते हैं।
भारत-चीन में अनुभव को दी जाएगी प्राथमिकता-सरकार ने यह भी तय किया है कि विदेश सचिव बनने के लिए भारत या चीन में काम का अनुभव होना जरूरी होगा। नेपाल के लिए ये दोनों देश बेहद महत्वपूर्ण हैं, इसलिए वहां की समझ को जरूरी माना जा रहा है। फिलहाल भारत, चीन, अमेरिका समेत 17 देशों में राजदूत के पद खाली हैं, जिन्हें इसी नई प्रक्रिया से भरा जाएगा।|
फैसले पर विशेषज्ञों की मिली-जुली प्रतिक्रिया-जहां आम जनता इस कदम को पारदर्शिता की दिशा में बड़ा सुधार मान रही है, वहीं कुछ पूर्व राजनयिक इससे पूरी तरह सहमत नहीं हैं। उनका कहना है कि राजदूत का पद सिर्फ परीक्षा पास करने जैसा नहीं होता, इसमें देश के प्रति निष्ठा और गहरी समझ भी जरूरी है। कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि सरकार को सीधे योग्य और अनुभवी लोगों की पहचान करनी चाहिए, ताकि देश का सम्मान बना रहे।



