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हरियाणा में 12 साल बाद कांग्रेस ने फिर शुरू की ज़िला कमेटी की बहाली, लेकिन गुटबाज़ी बनी सबसे बड़ी चुनौती

12 साल बाद हरियाणा में कांग्रेस की कमर कसने की कोशिश!-करीब 12 साल बाद, हरियाणा कांग्रेस ने फिर से ज़िला स्तर की कमेटियों का गठन शुरू किया है। यह कदम ऐसे समय में उठाया गया है जब पार्टी विधानसभा में नेता विपक्ष तक चुनने में नाकाम रही है और पार्टी में अंदरूनी कलह चल रही है।

ज़िला कमेटियों का गठन: क्या होगा नया फॉर्मूला?-हर ज़िले में एक ऑब्जर्वर भेजा जाएगा, जिसकी मदद 3-4 और ऑब्जर्वर करेंगे। लेकिन राज्य स्तर के पर्यवेक्षकों के नामों का ऐलान अभी बाकी है। कांग्रेस आशा करती है कि इस कदम से पार्टी का जमीनी स्तर मज़बूत होगा और आने वाले चुनावों में बेहतर प्रदर्शन किया जा सकेगा।

 21 ऑब्जर्वरों की टीम: नेताओं और कार्यकर्ताओं से बातचीत-कांग्रेस ने 21 ऑब्जर्वरों की टीम बनाई है, जिनमें जगदीश ठाकोर, माणिकम टैगोर जैसे दिग्गज शामिल हैं। ये ऑब्जर्वर ज़िलों में जाकर नेताओं और कार्यकर्ताओं से बात करेंगे और एक रिपोर्ट तैयार करेंगे। यह रिपोर्ट पार्टी के आला नेताओं को सौंपी जाएगी जिससे ज़िला अध्यक्षों के चुनाव में मदद मिलेगी।

 ज़िला अध्यक्षों को मिलेगा खास अधिकार: गुजरात और मध्य प्रदेश का उदाहरण-इस बार ज़िला अध्यक्षों के चुनाव का तरीका अलग है। हाईकमान ज़िलों से मिली जानकारी के आधार पर अध्यक्ष का चुनाव करेगा और उन्हें पहले से ज़्यादा अधिकार दिए जाएँगे। यह तरीका गुजरात और मध्य प्रदेश में भी अपनाया गया है, जहाँ इसी तरह की कवायद की गई थी।

गुटबाज़ी की मार: कमज़ोर पड़ता संगठन-हरियाणा कांग्रेस में ज़िला कमेटियों के न होने से पार्टी को काफी नुकसान हुआ है। पिछले विधानसभा चुनाव में अच्छा प्रदर्शन करने के बावजूद, कांग्रेस बीजेपी से आगे नहीं निकल पाई। नेताओं का मानना है कि ज़मीनी स्तर पर संगठन की कमी से पार्टी कमज़ोर हुई है।

 हुड्डा, शैलजा और सुरजेवाला गुटों में तनातनी: नेता विपक्ष का मुद्दा-हरियाणा कांग्रेस में अंदरूनी कलह इतनी बढ़ गई है कि चुनाव के सात महीने बाद भी नेता विपक्ष का चुनाव नहीं हो पाया है। हुड्डा गुट अपने प्रतिद्वंद्वी को यह जिम्मेदारी देने को तैयार नहीं है। हुड्डा गुट का दावा है कि उन्हें 32 विधायकों का समर्थन है, जबकि शैलजा और सुरजेवाला गुट के पास केवल 5 विधायक हैं।

प्रदेश अध्यक्ष का सवाल: उदय भान के उत्तराधिकारी की तलाश-कांग्रेस को अब उदय भान के उत्तराधिकारी को भी प्रदेश अध्यक्ष चुनना है। लेकिन गुटबाज़ी की वजह से यह फैसला भी टल रहा है। पार्टी सूत्रों का कहना है कि नेता विपक्ष और प्रदेश अध्यक्ष को लेकर चल रही खींचतान ही इन नियुक्तियों में देरी की वजह है। अब देखना होगा कि क्या ज़िला कमेटियों के गठन से पार्टी मज़बूत होगी या नहीं।

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