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मेकेदातु डैम पर तमिलनाडु का सख्त रुख

 

मेकेदातु डैम पर तमिलनाडु का सख्त संदेश, विधानसभा में सर्वसम्मति से पारित हुआ प्रस्ताव-कावेरी नदी पर बनने वाले मेकेदातु जलाशय को लेकर तमिलनाडु और कर्नाटक के बीच विवाद फिर गरमाया है। तमिलनाडु विधानसभा ने सर्वसम्मति से प्रस्ताव पारित कर केंद्र से मांग की है कि मेकेदातु परियोजना की डीपीआर को मंजूरी न दी जाए। तमिलनाडु सरकार ने साफ कहा है कि बिना राज्य की सहमति के किसी भी तकनीकी या पर्यावरणीय मंजूरी को स्वीकार नहीं किया जाएगा। मुख्यमंत्री सी. जोसेफ विजय के नेतृत्व में यह प्रस्ताव किसानों के हितों की रक्षा का संदेश भी है।

किसानों के हितों की रक्षा को लेकर सरकार का स्पष्ट रुख-कावेरी नदी तमिलनाडु के लाखों किसानों की जान है। मेकेदातु परियोजना को लेकर किसानों में चिंता है कि इससे उन्हें मिलने वाला पानी कम हो सकता है। मुख्यमंत्री ने विधानसभा में कहा कि यह मुद्दा सिर्फ राजनीति नहीं, बल्कि किसानों के भविष्य का है। तमिलनाडु सरकार किसी भी ऐसी परियोजना का समर्थन नहीं करेगी जो किसानों के हितों को नुकसान पहुंचाए। इस प्रस्ताव से सरकार ने किसानों के प्रति अपनी प्रतिबद्धता जाहिर की है।

कांग्रेस शासित कर्नाटक के खिलाफ भी खुला विरोध-तमिलनाडु सरकार ने कर्नाटक की कांग्रेस सरकार के खिलाफ भी खुलकर विरोध जताया है। यह कदम इसलिए खास है क्योंकि तमिलनाडु में कांग्रेस के कुछ विधायक भी हैं। बावजूद इसके मुख्यमंत्री विजय ने स्पष्ट किया कि किसानों और राज्य के अधिकारों के मामले में कोई राजनीतिक समझौता नहीं होगा। कांग्रेस के नेता भी इस प्रस्ताव के समर्थन में हैं, जिससे यह साफ हो गया कि जल विवाद पर तमिलनाडु की राजनीति एकजुट है।

मेकेदातु परियोजना: विवाद की जड़-मेकेदातु परियोजना कर्नाटक की ओर से बेंगलुरु और आसपास के इलाकों को पानी देने के लिए प्रस्तावित है। कर्नाटक इसे जरूरी बताता है, लेकिन तमिलनाडु का कहना है कि कावेरी जल विवाद के आदेशों के बिना नया जलाशय बनाना गलत होगा। सुप्रीम कोर्ट और जल विवाद न्यायाधिकरण ने दोनों राज्यों के बीच पानी के बंटवारे के नियम बनाए हैं, जिनका पालन होना जरूरी है। तमिलनाडु का मानना है कि मेकेदातु से उसे मिलने वाला पानी प्रभावित होगा।

केंद्र सरकार और जल आयोग से की गई कड़ी मांग-तमिलनाडु विधानसभा ने केंद्र सरकार से कहा है कि मेकेदातु परियोजना को मंजूरी न दी जाए। साथ ही केंद्रीय जल आयोग से भी अनुरोध किया गया है कि कर्नाटक की डीपीआर की समीक्षा या मंजूरी की प्रक्रिया आगे न बढ़ाए। सरकार का कहना है कि कावेरी विवाद संवेदनशील है और किसी भी फैसले में सभी संबंधित राज्यों की सहमति जरूरी है। बिना सहमति के लिए गए फैसले भविष्य में तनाव बढ़ा सकते हैं।

कावेरी विवाद बना दक्षिण भारत की राजनीति का बड़ा मुद्दा-मेकेदातु परियोजना को लेकर कर्नाटक और तमिलनाडु के बीच संघर्ष तेज हो सकता है। कर्नाटक इसे विकास के लिए जरूरी मानता है, जबकि तमिलनाडु इसे किसानों के खिलाफ बताता है। विशेषज्ञों के अनुसार अगर सहमति नहीं बनी तो मामला फिर से न्यायालय और केंद्र सरकार के सामने आएगा। तमिलनाडु ने स्पष्ट कर दिया है कि वह इस लड़ाई को मजबूती से आगे बढ़ाएगा। कावेरी नदी दोनों राज्यों के लिए जीवनदायिनी है, इसलिए विवाद का असर व्यापक है।

 

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