इस हफ्ते शेयर बाजार में क्या होगा बड़ा बदलाव? निवेशकों की नजर इन 6 फैक्टर पर रहेगी टिकी

इज़राइल-ईरान तनाव: क्या है बाज़ार पर असर?-यह लेख शेयर बाज़ार में आने वाले उतार-चढ़ाव और उनके पीछे के कारणों पर चर्चा करता है। इसमें वैश्विक घटनाओं से लेकर घरेलू आर्थिक संकेतकों तक, कई पहलुओं पर प्रकाश डाला गया है।
इज़राइल-ईरान तनाव और वैश्विक अनिश्चितता-इज़राइल और ईरान के बीच बढ़ते तनाव ने वैश्विक बाज़ार में अनिश्चितता की स्थिति पैदा कर दी है। यह तनाव मिडिल ईस्ट में अस्थिरता को बढ़ा रहा है, जिसका सीधा असर दुनिया भर के शेयर बाज़ारों पर पड़ रहा है। विदेशी निवेशक पहले से ही जोखिम से बचने की कोशिश में हैं, और यह तनाव बाज़ार को और कमज़ोर कर सकता है। भारत जैसे उभरते बाज़ारों पर इसका विशेष प्रभाव पड़ सकता है क्योंकि निवेशक अपने पैसे सुरक्षित जगहों पर लगाना पसंद करते हैं।
तेल की बढ़ती कीमतें और महंगाई-कच्चे तेल की बढ़ती कीमतें एक और बड़ी चिंता का विषय हैं। ब्रेंट क्रूड की कीमतों में लगातार इज़ाफ़ा महंगाई को बढ़ावा दे रहा है। महंगाई बढ़ने से कंपनियों के मुनाफ़े और उपभोक्ता खर्च दोनों पर बुरा असर पड़ता है। तेल आयातक देशों जैसे भारत पर इसका सीधा प्रभाव पड़ता है, क्योंकि आयात पर खर्च बढ़ जाता है और इससे आम आदमी की जेब पर सीधा असर पड़ता है।
अमेरिकी फेडरल रिजर्व की ब्याज दर नीति-अमेरिकी फेडरल रिजर्व की ब्याज दर नीति भी बाज़ार की दिशा तय करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। फेड के फैसले से बाज़ार में राहत या गिरावट दोनों ही आ सकती है। ब्याज दरों में कमी से बाज़ार में सकारात्मकता आ सकती है, जबकि ब्याज दरों में बढ़ोतरी से शेयर बाज़ार में गिरावट आ सकती है। यह फैसला दुनिया भर के बाजारों को प्रभावित करता है।
पिछले हफ़्ते बाज़ार में गिरावट-पिछले हफ़्ते शेयर बाज़ार में भारी गिरावट देखी गई। सेंसेक्स और निफ्टी में लगभग 1% की गिरावट दर्ज की गई। इस गिरावट के पीछे कमज़ोर वैश्विक संकेत और कच्चे तेल की बढ़ती कीमतें मुख्य कारण हैं। इससे निवेशकों में घबराहट का माहौल बन गया है और कई निवेशकों को नुकसान हुआ है।
घरेलू आर्थिक संकेतक-भारतीय बाज़ार में निवेशक अब घरेलू आर्थिक संकेतकों पर भी ध्यान दे रहे हैं। मानसून की प्रगति, थोक महंगाई दर (WPI), विदेशी निवेश, और रुपये-डॉलर के विनिमय दर जैसे कारक बाज़ार को प्रभावित करते हैं। इन संकेतकों में कोई भी बदलाव बाज़ार की दिशा बदल सकता है क्योंकि ये सभी कारक देश की अर्थव्यवस्था को प्रभावित करते हैं।
सेक्टोरल मूवमेंट-हालांकि बाज़ार की गति धीमी रहने की उम्मीद है, लेकिन कुछ खास क्षेत्रों में हलचल देखी जा सकती है। सरकार के नीतिगत फैसले, जैसे टैरिफ या ड्यूटी में बदलाव, ऑटो, मैन्युफैक्चरिंग, या ऊर्जा जैसे क्षेत्रों को प्रभावित कर सकते हैं। इसलिए निवेशकों को केवल इंडेक्स पर ही नहीं, बल्कि अलग-अलग क्षेत्रों के रुझानों पर भी ध्यान देना चाहिए।



