बांग्लादेश चुनाव से पहले बढ़ती चिंता: हजारों लूटे गए हथियार अब भी गायब, गोलीबारी का खतरा गहराया

बांग्लादेश में चुनाव से पहले बढ़ती बंदूक हिंसा: लूटे गए हथियारों की बरामदगी में बड़ी कमी-बांग्लादेश में 2024 के आंदोलन के दौरान लूटे गए हजारों हथियार और गोलियां अब तक पूरी तरह बरामद नहीं हो पाई हैं। जैसे-जैसे फरवरी 2026 में राष्ट्रीय चुनाव नजदीक आ रहे हैं, सुरक्षा विशेषज्ञों ने चेतावनी दी है कि इससे देश में बंदूक से जुड़ी हिंसा बढ़ने का खतरा है। इस लेख में हम विस्तार से जानेंगे कि क्या है स्थिति और इसके पीछे की वजहें।
2024 के आंदोलन में लूटे गए हथियारों का बड़ा हिस्सा अभी भी गायब-जुलाई-अगस्त 2024 के दौरान हुए आंदोलन में पुलिस थानों, चौकियों, हिरासत केंद्रों और गाड़ियों से कुल 5,753 हथियार और करीब 6.51 लाख गोलियां लूट ली गई थीं। यह आंदोलन शेख हसीना सरकार के खिलाफ था और देश की राजनीतिक स्थिरता को हिला देने वाला साबित हुआ। अब तक 1,362 से ज्यादा हथियार और करीब ढाई लाख गोलियां बरामद नहीं हो पाई हैं, जो चिंता का विषय है।
चुनाव से पहले राजनीतिक हिंसा और गोलीबारी में तेजी-सुरक्षा विशेषज्ञों का कहना है कि 12 फरवरी 2026 के चुनाव से पहले राजनीतिक हिंसा और गोलीबारी के मामले बढ़ रहे हैं। पूर्व पुलिस महानिरीक्षक मोहम्मद नुरुल हुदा के अनुसार, हाल के महीनों में हथियारों से जुड़े कई राजनीतिक हत्याकांड सामने आए हैं, जो देश के कानून-व्यवस्था के लिए खतरा हैं। यह स्थिति चुनावी माहौल को और संवेदनशील बना रही है।
सुरक्षा एजेंसियों की कार्यक्षमता में कमी बनी हुई-बांग्लादेश इंस्टीट्यूट ऑफ पीस एंड सिक्योरिटी स्टडीज के अध्यक्ष रिटायर्ड मेजर जनरल एएनएम मुनीरुज्जामान ने कहा कि एक साल बाद भी सुरक्षा एजेंसियों की कार्यक्षमता कमजोर बनी हुई है। बड़ी संख्या में हथियार अभी भी बाहर हैं, जिससे चुनाव के दौरान हिंसा की आशंका बढ़ गई है। यह स्थिति प्रशासन के लिए बड़ी चुनौती है।
पहले लाठी-डंडे, अब खुलेआम बंदूकें-पहले चुनावी हिंसा में झगड़े लाठी-डंडों तक सीमित रहते थे, लेकिन अब हालात बदल गए हैं। अब खुलेआम बंदूकें इस्तेमाल हो रही हैं, जो स्थिति को और खतरनाक बना रही हैं। यह बदलाव राजनीतिक संघर्ष को और हिंसक और जानलेवा बना रहा है, जिससे आम जनता और उम्मीदवार दोनों असुरक्षित महसूस कर रहे हैं।
देश के कई इलाकों में बढ़ती गोलीबारी की घटनाएं-चट्टोग्राम, जशोर, कॉक्स बाजार, खुलना, पाबना, गाजीपुर और ढाका जैसे इलाकों में हाल के महीनों में कई गोलीकांड हुए हैं। इन हमलों में राजनीतिक कार्यकर्ता, कारोबारी और आम नागरिक मारे गए या घायल हुए हैं। इन घटनाओं ने चुनावी माहौल को तनावपूर्ण बना दिया है और उम्मीदवारों में भी डर फैलाया है।
राजनीतिक हत्याओं ने बढ़ाई दहशत-7 जनवरी को ढाका में स्वेच्छासेवक दल के पूर्व नेता अजीजुर रहमान मुसब्बिर की हत्या कर दी गई। इसके अलावा दिसंबर में चुनाव कार्यक्रम घोषित होने के बाद इनकिलाब मंच के प्रवक्ता शरीफ उस्मान हादी को भी गोली मारी गई, जिनकी बाद में मौत हो गई। ये हत्याएं राजनीतिक हिंसा की गंभीरता को दर्शाती हैं।
हथियार अब राजनीतिक हिंसा का आम जरिया बन गए हैं-इन हत्याओं और हमलों से साफ होता है कि बंदूकें अब आसानी से उपलब्ध हैं और राजनीतिक हिंसा में उनका इस्तेमाल सामान्य होता जा रहा है। दिसंबर में चुनाव कार्यक्रम घोषित होने के बाद से गोलीबारी के मामलों में तेजी से बढ़ोतरी हुई है, जो देश की सुरक्षा के लिए खतरा है।
उम्मीदवारों के बीच भी बढ़ा जान का खतरा-गोपलगंज-3 से बीएनपी उम्मीदवार एसएम जिलानी का बुलेटप्रूफ जैकेट पहनकर वीडियो वायरल हुआ, जिसमें उन्होंने अपनी जान को खतरा बताया। यह वीडियो चुनाव लड़ रहे नेताओं के बीच फैली चिंता को दर्शाता है और बताता है कि चुनावी माहौल कितना संवेदनशील हो गया है।
बीएनपी का आरोप: सरकार हथियार बरामदगी में नाकाम-बीएनपी महासचिव मिर्जा फखरुल इस्लाम आलमगीर ने सरकार पर आरोप लगाया है कि वह लूटे गए हथियारों को वापस पाने में पूरी तरह नाकाम रही है। उनका कहना है कि कानून व्यवस्था अभी भी संतोषजनक नहीं है और यह प्रशासन की असफलता को दर्शाता है।
सरकार का दावा: स्थिति नियंत्रण में है-वहीं, सरकार का कहना है कि स्थिति पूरी तरह नियंत्रण में है। गृह मंत्रालय और पुलिस लगातार हथियार बरामदगी अभियानों, मोस्ट वांटेड सूचियों और इनाम की घोषणाओं के जरिए स्थिति सुधारने की कोशिश कर रहे हैं। गृह मामलों के सलाहकार जहांगीर आलम चौधरी ने दिसंबर में कहा था कि सरकार नाकाम नहीं हुई है।



