बस्तर में माओवाद का आखिरी दौर: गिनती के बचे उग्रवादी, सुरक्षा बलों की सख्त चेतावनी

बस्तर में माओवाद का अंत: आत्मसमर्पण के बाद कमजोर हुआ माओवादी नेटवर्क-छत्तीसगढ़ के बस्तर इलाके में माओवाद अब अपने आखिरी पड़ाव पर पहुंचता दिख रहा है। बड़े कमांडरों के आत्मसमर्पण के बाद संगठन काफी कमजोर हो गया है, लेकिन कुछ कट्टर माओवादी अभी भी हथियार डालने को तैयार नहीं हैं। इस वक्त स्थिति एक निर्णायक मोड़ पर है, जहां आगे का रास्ता साफ होना बाकी है।
बड़े कमांडरों के सरेंडर से माओवादी नेटवर्क में आई तेजी से गिरावट-हाल ही में माओवादी कमांडर पापाराव और PLGA इंचार्ज सोढ़ी केसा के आत्मसमर्पण के बाद बस्तर में माओवादियों की संख्या में भारी कमी आई है। इन बड़े नेताओं के जाने से संगठन की पकड़ कमजोर हुई है और बाकी कैडर पर भी दबाव बढ़ गया है। इससे माओवादी गतिविधियां काफी हद तक प्रभावित हुई हैं।
कुछ कट्टर माओवादी अभी भी सक्रिय हैं-हालांकि संगठन कमजोर हुआ है, लेकिन कुछ गिने-चुने कट्टर माओवादी अब भी अंडरग्राउंड रहकर अपनी गतिविधियां जारी रखे हुए हैं। ये लोग सुरक्षा बलों को चुनौती देते हुए छिपकर काम कर रहे हैं और आत्मसमर्पण करने से इनकार कर रहे हैं। इसलिए माओवादी खतरा पूरी तरह खत्म नहीं हुआ है।
बस्तर के IG का अल्टीमेटम: “यह आखिरी मौका है”-बस्तर के IG सुंदरराज पी ने साफ कहा है कि बीजापुर, सुकमा, नारायणपुर और कांकेर के बॉर्डर इलाकों में अब बहुत कम माओवादी बचे हैं। उन्होंने चेतावनी दी है कि यह उनके लिए मुख्यधारा में लौटने का आखिरी मौका है, नहीं तो सुरक्षा बलों की कार्रवाई और तेज होगी। यह संदेश माओवादी कैडर के लिए एक बड़ा संकेत है।
तेलंगाना पुलिस की भी आत्मसमर्पण की अपील-तेलंगाना पुलिस के शिवधर रेड्डी ने भी तेलंगाना के माओवादियों से आत्मसमर्पण करने की अपील की है। उन्होंने बताया कि 2024 में जहां 125 माओवादी सक्रिय थे, अब उनकी संख्या घटकर सिर्फ 5 रह गई है। यह बदलाव माओवादी संगठन के कमजोर पड़ने का साफ संकेत है।
अभी भी कुछ बड़े नाम अंडरग्राउंड हैं-बचे हुए माओवादियों में कुछ बड़े नाम जैसे गणपति और महिला माओवादी रूपी शामिल हैं, जो कांकेर-नारायणपुर बॉर्डर पर सक्रिय बताए जा रहे हैं। ये अब भी अंडरग्राउंड हैं और सुरक्षा एजेंसियों के लिए चुनौती बने हुए हैं। इनके खिलाफ कार्रवाई जारी है।
निर्णायक मोड़ पर खड़ा माओवाद-कुल मिलाकर बस्तर में माओवाद का ढांचा लगभग टूट चुका है। अब बचे हुए माओवादी के सामने दो ही विकल्प हैं—या तो आत्मसमर्पण करें या फिर सुरक्षा बलों की सख्त कार्रवाई का सामना करें। आने वाले दिन तय करेंगे कि इस लंबे संघर्ष का अंत कैसे होता है और बस्तर में स्थिरता कब लौटती है।
इस तरह, बस्तर में माओवाद का अंत नजदीक है, लेकिन पूरी तरह खत्म होने में अभी कुछ समय लग सकता है। सुरक्षा बलों की लगातार कार्रवाई और आत्मसमर्पण की अपीलों से यह लड़ाई अपने अंतिम चरण में पहुंच चुकी है।



