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इजरायल-हिजबुल्लाह युद्धविराम: पश्चिम एशिया में शांति की उम्मीद

 

इजरायल और हिजबुल्लाह के बीच युद्धविराम, पश्चिम एशिया में तनाव कम होने की उम्मीद-पश्चिम एशिया में लंबे समय से जारी तनाव के बीच एक राहत भरी खबर आई है। इजरायल और लेबनान के सशस्त्र संगठन हिजबुल्लाह के बीच युद्धविराम पर सहमति बन गई है। अमेरिका और कतर की मध्यस्थता के साथ-साथ ईरान की भूमिका ने इस समझौते को संभव बनाया। शुक्रवार शाम से लागू होने वाले इस युद्धविराम से क्षेत्र में शांति लौटने की उम्मीद जगी है। पिछले दिनों दोनों पक्षों के बीच बढ़े संघर्ष ने पूरे क्षेत्र को बड़े युद्ध की कगार पर ला दिया था, लेकिन अब स्थिति में सुधार की संभावना दिख रही है।

रातभर चली हिंसा के बाद युद्धविराम की दिशा में बढ़े कदम-युद्धविराम से पहले लेबनान-इजरायल सीमा पर हालात बेहद तनावपूर्ण थे। रातभर दोनों तरफ से हमले और जवाबी कार्रवाई जारी रही। इजरायली हवाई हमलों में कम से कम 18 लोग मारे गए और कई घायल हुए। वहीं हिजबुल्लाह ने दक्षिणी लेबनान में इजरायली सेना पर बड़ा हमला किया, जिसमें चार सैनिकों की मौत हुई। यह हिजबुल्लाह का सबसे गंभीर हमला माना गया। बढ़ती हिंसा ने अंतरराष्ट्रीय समुदाय की चिंता बढ़ाई, जिससे कूटनीतिक प्रयास तेज हुए और अंततः युद्धविराम पर सहमति बनी।

अमेरिका, कतर और ईरान की भूमिका से संभव हुआ समझौता-अमेरिका और कतर ने मध्यस्थता कर युद्धविराम समझौते को अंतिम रूप दिया। बातचीत के दौरान ईरान भी सक्रिय था और उसने तनाव कम करने में सहयोग दिया। एक वरिष्ठ अमेरिकी अधिकारी ने बताया कि दिन में दोनों तरफ गोलीबारी हुई, लेकिन बाद में युद्धविराम पर सहमति बनी। ईरान की भागीदारी इस समझौते की सबसे अहम कड़ी रही क्योंकि हिजबुल्लाह को ईरान का समर्थन है। इसके बिना स्थायी समाधान मुश्किल था। अब दोनों पक्ष संघर्ष रोकने और हालात सामान्य करने की दिशा में काम करेंगे।

नेतन्याहू की सहमति और ट्रंप की सक्रियता बनी चर्चा का विषय-अमेरिकी अधिकारी के अनुसार इजरायल के प्रधानमंत्री नेतन्याहू ने इस समझौते का समर्थन किया है, हालांकि आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई। अमेरिकी पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने नेतन्याहू से बातचीत कर बढ़ती सैन्य कार्रवाई पर चिंता जताई। उन्होंने कहा कि हिजबुल्लाह के एक सदस्य की मौजूदगी पूरे ढांचे को नष्ट करने का कारण नहीं बन सकती। ट्रंप ने नेतन्याहू पर पूर्ण युद्धविराम स्वीकार करने का दबाव भी डाला। इस बातचीत के बाद कूटनीतिक गतिविधियां तेज हुईं।

अमेरिका-ईरान वार्ता पर भी पड़ रहा था संघर्ष का असर-लेबनान में बढ़ती हिंसा का असर अमेरिका और ईरान के बीच चल रही बातचीत पर भी पड़ा। दोनों देशों के बीच क्षेत्रीय तनाव कम करने के लिए पहले ही एक अंतरिम समझौता हुआ था, लेकिन लेबनान में संघर्ष ने इसे चुनौती दी। हिजबुल्लाह के एक सांसद ने कहा कि जब तक लेबनान में पूर्ण युद्धविराम नहीं होगा, तब तक वाशिंगटन के साथ बातचीत मुश्किल होगी। इसलिए यह युद्धविराम केवल लेबनान तक सीमित नहीं, बल्कि पूरे पश्चिम एशिया की कूटनीति पर असर डाल रहा था।

क्या अब पश्चिम एशिया में लौटेगी स्थिरता?-यह युद्धविराम पश्चिम एशिया में शांति की दिशा में बड़ा कदम माना जा रहा है। हालांकि विशेषज्ञ अभी भी सतर्क हैं क्योंकि पहले भी कई बार युद्धविराम हुए लेकिन लंबे समय तक टिक नहीं पाए। फिर भी यह समझौता ऐसे वक्त में हुआ है जब क्षेत्र में तनाव चरम पर था। यदि दोनों पक्ष अपने वादों पर कायम रहते हैं तो हजारों लोगों की जान बच सकती है और राजनीतिक-आर्थिक स्थिरता लौट सकती है। दुनिया की नजरें अब इस युद्धविराम की मजबूती पर टिकी हैं।

 

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