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CBSE का नया नियम: 9वीं में अब पढ़नी होंगी तीन भाषाएं, जानिए क्या होगा असर

CBSE ने 1 जुलाई 2026 से लागू किया थ्री लैंग्वेज फॉर्मूला, छात्रों और राज्यों में शुरू हुई बहस-CBSE ने 2026-27 के शैक्षणिक सत्र से कक्षा 9वीं में तीन भाषाएं पढ़ना अनिवार्य कर दिया है। यह फैसला नई शिक्षा नीति 2020 के तहत लिया गया है। इस नियम के लागू होते ही देशभर में चर्चा तेज हो गई है। जहां कुछ लोग इसे बहुभाषी शिक्षा की दिशा में बड़ा कदम मान रहे हैं, वहीं कई राज्यों और विपक्षी दलों ने इसे छात्रों पर अतिरिक्त बोझ बताया है।

थ्री लैंग्वेज फॉर्मूला क्या है?-थ्री लैंग्वेज फॉर्मूला का मतलब है कि छात्रों को तीन भाषाएं पढ़नी होंगी, जिनमें कम से कम दो भारतीय भाषाएं शामिल होंगी। यह नियम सरकारी और निजी दोनों स्कूलों पर लागू होगा। राज्यों और स्कूलों को भाषाओं के चयन में कुछ छूट दी गई है। इसका मकसद बच्चों में बहुभाषी क्षमता बढ़ाना और देश की भाषाई विविधता को बढ़ावा देना है।

थ्री लैंग्वेज नीति कब शुरू हुई?-तीन भाषा नीति कोई नई बात नहीं है। इसे सबसे पहले 1964-66 की कोठारी आयोग रिपोर्ट में सुझाया गया था और 1968 की राष्ट्रीय शिक्षा नीति में लागू किया गया। बाद में 1986 और 1992 की नीतियों में भी इसे दोहराया गया। इसका उद्देश्य राष्ट्रीय एकता को मजबूत करना और भाषाओं के बीच संतुलन बनाना था। इसमें मातृभाषा, आधिकारिक भाषा और एक आधुनिक भाषा शामिल होती थी।

NEP 2020 में क्या कहा गया?-नई शिक्षा नीति 2020 में बहुभाषी शिक्षा को बढ़ावा देने पर जोर दिया गया है। नीति के अनुसार छात्रों को तीन भाषाएं पढ़ाई जाएंगी, जिनमें दो भारतीय भाषाएं जरूरी होंगी। सरकार ने स्पष्ट किया है कि किसी भी राज्य पर कोई भाषा थोपी नहीं जाएगी। भाषा चुनने का अधिकार राज्यों, स्कूलों और छात्रों को रहेगा। इससे राष्ट्रीय एकता और सांस्कृतिक जुड़ाव मजबूत होगा।

विदेशी भाषाओं को लेकर नियम-नई नीति के तहत छात्र अंग्रेजी के साथ कोरियन, जापानी, फ्रेंच, जर्मन, स्पेनिश जैसी विदेशी भाषाएं भी पढ़ सकते हैं। लेकिन अंग्रेजी को अब विदेशी भाषा माना गया है। इसका मतलब है कि छात्र एक साथ अंग्रेजी और दूसरी विदेशी भाषा को तीन भाषा फॉर्मूले में शामिल नहीं कर पाएंगे। इससे कई छात्रों और स्कूलों के सामने नई चुनौतियां आ सकती हैं।

किताबें और शिक्षक तैयार हैं?-CBSE ने माना है कि सभी भाषाओं की नई किताबें अभी पूरी तरह तैयार नहीं हैं। इसलिए 2026-27 में कक्षा 9 के छात्र अस्थायी तौर पर कक्षा 6 की R3 भाषा की किताबों से पढ़ाई करेंगे। कई स्कूलों में भाषा शिक्षकों की कमी को देखते हुए बोर्ड ने अन्य विषयों के शिक्षकों को भी अस्थायी रूप से भाषा पढ़ाने की अनुमति दी है, यदि उन्हें उस भाषा का ज्ञान हो।

क्यों हो रहा है विरोध?-थ्री लैंग्वेज फॉर्मूला का सबसे ज्यादा विरोध तमिलनाडु में हो रहा है। यह राज्य लंबे समय से दो भाषा नीति (तमिल और अंग्रेजी) पर कायम है। हिंदी थोपने के खिलाफ यहां पहले भी बड़े आंदोलन हो चुके हैं। विपक्षी दलों का कहना है कि यह नियम छात्रों पर अतिरिक्त बोझ डालेगा और कई स्कूलों में संसाधनों की कमी के कारण लागू करना मुश्किल होगा। सरकार इसे छात्रों के बहुभाषी विकास के लिए जरूरी मानती है।

तमिलनाडु में विवाद की वजह-तमिलनाडु ने हमेशा से तीन भाषा नीति का विरोध किया है। 1937 में हिंदी अनिवार्य करने की कोशिश पर बड़े आंदोलन हुए थे। 1968 में भी राज्य ने थ्री लैंग्वेज फॉर्मूला लागू करने से इनकार किया था। आज भी तमिलनाडु सिर्फ तमिल और अंग्रेजी पढ़ाने की नीति पर कायम है। इसलिए CBSE के नए फैसले के बाद राजनीतिक बहस फिर से तेज हो गई है।

 

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