बंगाल के स्कूलों में मिड-डे मील से अंडा हटाने पर सियासी बहस, ISKCON की एंट्री से बढ़ी चर्चा

बंगाल के स्कूलों में मिड-डे मील से अंडा हटाने पर सियासी घमासान, ISKCON की एंट्री से पोषण और पहचान पर नई बहस-पश्चिम बंगाल में विधानसभा चुनाव खत्म होने के बाद भी मिड-डे मील को लेकर विवाद जारी है। राज्य की नई बीजेपी सरकार ने कोलकाता नगर निगम क्षेत्र के सरकारी स्कूलों में ISKCON को पका हुआ भोजन देने की जिम्मेदारी दी है। साथ ही मिड-डे मील के मेन्यू से अंडा हटाकर शाकाहारी प्रोटीन वाले विकल्प शामिल करने का फैसला किया गया है। इस फैसले ने राजनीतिक गलियारों से लेकर अभिभावकों और पोषण विशेषज्ञों तक बहस छेड़ दी है। एक तरफ इसे बेहतर भोजन का कदम माना जा रहा है, तो दूसरी ओर इसे बंगाल की खान-पान संस्कृति पर हमला बताया जा रहा है।
बजट में बढ़ा मिड-डे मील का खर्च, लेकिन अंडा हटाने पर मचा विवाद-सरकार ने प्राथमिक स्कूलों के मिड-डे मील पर खर्च बढ़ाकर प्रति छात्र 10 रुपये कर दिया है। इससे बेहतर गुणवत्ता वाला भोजन मिलने की उम्मीद जताई गई। लेकिन अंडा हटाकर शाकाहारी विकल्प देने के फैसले ने विवाद खड़ा कर दिया। अब बच्चों को पनीर, राजमा, सोया और दालें परोसी जाएंगी। सरकार का कहना है कि ये विकल्प भी पर्याप्त प्रोटीन देंगे। विपक्ष का आरोप है कि यह फैसला पोषण से ज्यादा सांस्कृतिक और वैचारिक सोच से प्रेरित है, जो बंगाल की पारंपरिक खान-पान को बदलने की कोशिश है।
विपक्ष का आरोप- बंगाल की खान-पान संस्कृति बदलने की कोशिश-तृणमूल कांग्रेस और अन्य विपक्षी दलों ने इस फैसले को बंगाल की खान-पान संस्कृति पर हमला बताया है। उनका कहना है कि मछली और अंडा बंगाल के खाने का अहम हिस्सा हैं, जिन्हें हटाना स्थानीय परंपराओं के खिलाफ है। वे कहते हैं कि कई पीढ़ियों से बच्चे पशु प्रोटीन खाते आए हैं, इसलिए स्कूलों में भी स्थानीय खान-पान का सम्मान होना चाहिए। राजनीतिक विश्लेषक मानते हैं कि चुनाव के दौरान भी खान-पान को लेकर बहस हुई थी और अब यह फैसला उसी बहस को फिर से जिंदा कर रहा है।
सरकार का जवाब- उद्देश्य सिर्फ बेहतर और पौष्टिक भोजन देना-सरकार ने विपक्ष के आरोपों को खारिज करते हुए कहा है कि उनका मकसद बच्चों को साफ-सुथरा और पौष्टिक भोजन देना है, न कि किसी विचारधारा को थोपना। मुख्यमंत्री सुवेंदु अधिकारी ने कहा कि सरकार किसी पर धार्मिक या सांस्कृतिक दबाव नहीं डाल रही। शिक्षा मंत्री दीपक बर्मन ने कहा कि दुनिया में करोड़ों लोग शाकाहारी हैं और स्वस्थ जीवन जी रहे हैं। उन्होंने बताया कि मेन्यू विशेषज्ञों की सलाह से तैयार किया गया है, जिसमें बच्चों को जरूरी पोषण मिलेगा।
स्कूलों में मिली मिली-जुली प्रतिक्रिया, शिक्षक बोले- बच्चों की पसंद भी जरूरी-सरकारी स्कूलों के कई शिक्षक कहते हैं कि अंडा मिलने वाले दिन बच्चों की उपस्थिति बढ़ जाती है, खासकर कमजोर परिवारों के बच्चे इसे पसंद करते हैं। कुछ शिक्षक मानते हैं कि भोजन की गुणवत्ता बढ़ाना अच्छा है, लेकिन बच्चों की पसंद भी मायने रखती है। वे सवाल उठाते हैं कि क्या बच्चे राजमा, सोया और पनीर को उतनी ही खुशी से खाएंगे जितना अंडा खाते थे। उनका कहना है कि पोषण के साथ बच्चों की पसंद और स्थानीय खान-पान को भी ध्यान में रखना चाहिए।
पोषण विशेषज्ञ बोले- बहस शाकाहार और मांसाहार की नहीं, संतुलित भोजन की है-पोषण विशेषज्ञों का कहना है कि यह बहस केवल शाकाहारी या मांसाहारी भोजन की नहीं है, बल्कि संतुलित और पौष्टिक भोजन की है। अंडा सस्ता और अच्छा प्रोटीन स्रोत है, लेकिन सोया, पनीर, दालें और दूध से भी पोषण पूरा किया जा सकता है। विशेषज्ञों के अनुसार भोजन की गुणवत्ता, नियमित आपूर्ति और संतुलित पोषण ही योजना की सफलता तय करेगा। यदि इन बातों का ध्यान रखा गया तो शाकाहारी भोजन भी प्रभावी साबित हो सकता है।
ISKCON ने भी दी सफाई, कहा- पोषण पर नहीं पड़ेगा कोई असर-ISKCON ने कहा कि वे कई राज्यों में लाखों बच्चों को मिड-डे मील देते हैं और सरकार के पोषण मानकों का पालन करते हैं। उनका कहना है कि केवल अंडे से ही प्रोटीन नहीं मिलता, बल्कि दाल, सोया और डेयरी उत्पादों से भी पर्याप्त पोषण मिलता है। बंगाल के लिए तैयार मेन्यू स्थानीय खान-पान और पोषण विशेषज्ञों की सलाह से बनाया जाएगा। ISKCON ने कहा कि बंगाल की गौड़ीय वैष्णव परंपरा भी शाकाहारी है, इसलिए शाकाहारी भोजन को अलग नहीं समझना चाहिए।



