‘महिला शक्ति’ ने लिखा इतिहास: कैसे थलापति विजय की जीत में महिलाओं ने बदली पूरी सियासत

थलापति विजय की ‘विजय’: कैसे ‘महिला शक्ति’ ने तमिलनाडु की सियासत में रच दिया इतिहास-तमिलनाडु की राजनीति के इतिहास में 4 मई 2026 की तारीख को एक बहुत बड़े बदलाव के रूप में याद किया जाएगा। सिनेमा के पर्दे से निकलकर राजनीति के मैदान में उतरे अभिनेता थलापति विजय ने अपनी पार्टी ‘तमिलगा वेट्ट्री कझगम’ (TVK) के साथ मिलकर वो कर दिखाया, जिसकी उम्मीद बड़े-बड़े दिग्गजों को भी नहीं थी। महज़ दो साल पुरानी पार्टी ने 234 सीटों वाली विधानसभा में 108 सीटें जीतकर सबको चौंका दिया है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि विजय के इस “विजय रथ” को असल में किसने चलाया? वो थीं तमिलनाडु की महिलाएं।
इस चुनाव के नतीजों ने साफ़ कर दिया है कि अब महिला वोटर और महिला उम्मीदवार सिर्फ एक ‘वोट बैंक’ नहीं हैं, बल्कि वे सत्ता पलटने की ताकत रखती हैं। फिलहाल राज्य में सरकार बनाने की तैयारियाँ ज़ोरों पर हैं और ऐसी खबर है कि 7 मई को विजय मुख्यमंत्री के रूप में शपथ ले सकते हैं।
महिला उम्मीदवारों ने कैसे बदली चुनाव की दिशा-इस बार का चुनाव सिर्फ वोटों का खेल नहीं था, बल्कि यह साबित करने का मौका था कि महिलाएँ चुनावी राजनीति को किस तरह प्रभावित कर सकती हैं। थलापति विजय की पार्टी TVK ने अपनी रणनीति में महिलाओं को बहुत तवज्जो दी। उन्होंने 23 महिला उम्मीदवारों को टिकट दिया, जिनमें से 13 ने शानदार जीत दर्ज की। यह जीत इसलिए भी बड़ी है क्योंकि इन महिलाओं ने अपने-अपने क्षेत्रों में बरसों से राजनीति कर रहे दिग्गज पुरुषों को धूल चटाई है।अक्सर कहा जाता है कि राजनीति में महिलाओं के लिए जगह बनाना मुश्किल है, लेकिन TVK की इन महिला विधायकों ने दिखाया कि अगर पार्टी का साथ और जनता का भरोसा हो, तो मैदान मारना नामुमकिन नहीं है। उन्होंने अपने इलाकों में जाकर लोगों से सीधा संवाद किया, उनकी समस्याओं को समझा और एक भरोसेमंद विकल्प के रूप में खुद को पेश किया। यही वजह रही कि जहाँ अनुभवी नेता हार गए, वहां इन महिला चेहरों ने जीत का परचम लहराया। यह आंकड़ा भविष्य की राजनीति के लिए एक बड़ा इशारा है कि अब महिलाओं को दरकिनार करना किसी भी पार्टी के लिए मुमकिन नहीं होगा।
आंकड़ों की जुबानी: समझिए महिला शक्ति का असली असर-अगर हम आंकड़ों पर नज़र डालें, तो इस चुनाव में महिलाओं का दबदबा साफ़ दिखाई देता है। पूरे चुनाव में करीब 4,000 से ज़्यादा उम्मीदवार मैदान में थे, जिनमें से 400 के करीब महिलाएँ थीं। लेकिन सफलता के प्रतिशत के मामले में TVK की महिलाएँ सबसे आगे रहीं। जहाँ TVK की 23 में से 13 महिला उम्मीदवारों ने जीत हासिल की,वहीं AIADMK की 20 में से सिर्फ 6 महिलाएँ ही जीत सकीं।सबसे चौंकाने वाली बात DMK और बीजेपी के लिए रही। DMK ने 18 महिलाओं को मैदान में उतारा था, लेकिन उनकी झोली खाली रही। यही हाल बीजेपी का भी हुआ। इन आंकड़ों से एक बात शीशे की तरह साफ़ हो जाती है—जनता अब सिर्फ पार्टी का नाम देखकर वोट नहीं दे रही, बल्कि वो यह देख रही है कि कौन उनकी आवाज़ बन सकता है। TVK की महिला विधायकों ने न सिर्फ अपनी सीटें जीतीं, बल्कि हज़ारों वोटों के अंतर से जीत दर्ज कर यह साबित किया कि तमिलनाडु की ग्रामीण और शहरी दोनों तरह की महिलाएँ एक नया बदलाव चाहती थीं। यह जीत राज्य की राजनीति में एक नए ‘जेंडर बैलेंस’ की शुरुआत है।
DMK और BJP की महिला उम्मीदवारों की हार के बड़े कारण-अक्सर चुनावों में ‘वुमेन कार्ड’ खेलने की कोशिश की जाती है, लेकिन इस बार DMK और बीजेपी का यह दांव काम नहीं आया। इसके पीछे की बड़ी वजह यह रही कि इन पारंपरिक पार्टियों ने महिलाओं को टिकट तो दिए, लेकिन उन्हें उस तरह से प्रमोट नहीं किया जैसे TVK ने किया। कई जगहों पर ऐसा लगा कि महिलाओं को सिर्फ नाम के लिए टिकट दिया गया है, जबकि ग्राउंड पर असली लड़ाई पुरुषों के इर्द-गिर्द ही घूमती रही।दूसरा बड़ा कारण रहा जनता से कटाव। थूथुकुडी और अवनाशी जैसी हाई-प्रोफाइल सीटों पर भी DMK की महिला उम्मीदवार पिछड़ गईं क्योंकि जनता को उनमें वो नयापन और भरोसा नहीं दिखा जो विजय की पार्टी के उम्मीदवारों में था। टीवीके की महिला उम्मीदवारों ने एक ‘कॉमन मैन’ (Common Man) वाली छवि बनाई, जिससे लोग आसानी से जुड़ पाए। बीजेपी के साथ भी यही दिक्कत रही—उनका नैरेटिव ज़मीनी स्तर पर महिलाओं की रोजमर्रा की जरूरतों से उस तरह नहीं जुड़ पाया जैसा विजय के वादों ने कर दिखाया। यह चुनाव बड़ी पार्टियों के लिए एक सबक है कि सिर्फ महिला उम्मीदवार खड़ा करना काफी नहीं है, उन्हें सशक्त बनाना भी ज़रूरी है।
TVK का महिला-फोकस्ड घोषणापत्र: जिसने पलटी बाजी-विजय की जीत का सबसे बड़ा हथियार उनका ‘चुनावी घोषणापत्र’ (Manifesto) था। 16 अप्रैल 2026 को जब उन्होंने अपना घोषणापत्र जारी किया, तो उसमें महिलाओं के लिए ऐसे वादे थे जिन्होंने सीधे दिल पर चोट की। विजय ने वादा किया कि हर महिला घर की मुखिया को ₹2,500 प्रति माह की आर्थिक मदद दी जाएगी। इसके साथ ही साल में 6 गैस सिलेंडर मुफ्त, गरीब लड़कियों की शादी में सोने का सिक्का और साड़ी, और पढ़ाई के लिए विशेष आर्थिक सहायता जैसे वादों ने महिलाओं को टीवीके की ओर खींच लिया। ये योजनाएं सुनने में सरल लगती हैं, लेकिन एक मध्यमवर्गीय या गरीब परिवार की महिला के लिए ये बहुत बड़ी राहत होती हैं। पहली बार वोट देने वाली लड़कियों (First-time voters) ने भी विजय के विजन पर भरोसा जताया क्योंकि उन्होंने शिक्षा और रोजगार पर बात की। जब एक महिला को घर चलाने में मदद और अपनी बेटियों के भविष्य की सुरक्षा दिखती है, तो वह अपना वोट सोच-समझकर देती है। यही वजह थी कि महिला-बहुल इलाकों में वोटिंग का प्रतिशत भी बढ़ा और उन वोटों का बड़ा हिस्सा विजय के खाते में गया।
राजनीति में नया रंग: दिखा बड़ा सांस्कृतिक बदलाव-इस बार का चुनाव सिर्फ हार-जीत तक सीमित नहीं था, बल्कि इसमें एक अलग तरह का जोश और रंग देखने को मिला। थलापति विजय के समर्थकों ने एक अनोखा तरीका अपनाया—सफ़ेद शर्ट और खाकी पैंट। यह ड्रेस कोड पार्टी की पहचान बन गया। कमाल की बात तो यह रही कि मतदान केंद्रों पर बड़ी संख्या में महिलाएँ भी इसी ‘यूनिफॉर्म’ में नज़र आईं।यह कोई मामूली बात नहीं है। यह दिखाता है कि राजनीति अब सिर्फ रैलियों में जाने का जरिया नहीं, बल्कि एक ‘कल्चर’ बन गई है। जब महिलाएँ एक खास ड्रेस कोड अपनाकर वोट डालने निकलती हैं, तो यह उनके गहरे जुड़ाव और पार्टी के प्रति वफादारी को दर्शाता है। विजय ने अपनी पार्टी को एक ब्रैंड की तरह पेश किया जिससे युवा और महिलाएँ खुद को जोड़ पाए। यह सांस्कृतिक बदलाव बताता है कि तमिलनाडु के लोग अब पुरानी ढर्रे वाली राजनीति से ऊब चुके हैं और कुछ नया, कुछ अपना सा चाहते हैं।
भविष्य की राजनीति में महिलाओं की बढ़ती भूमिका-तमिलनाडु विधानसभा चुनाव 2026 ने भारतीय राजनीति को एक नया रास्ता दिखाया है। अब जो नई सरकार बनेगी, उसमें 13 महिला विधायक TVK से और 6 AIADMK से होंगी। इसका मतलब है कि विधानसभा में अब सिर्फ पुरुषों का शोर नहीं होगा, बल्कि महिलाओं की समस्याओं पर भी प्रभावी ढंग से बात होगी। महिलाओं की यह बढ़ती ताकत आने वाले समय में राज्य की नीतियों और कानूनों में बड़े बदलाव लाएगी।7 मई को जब विजय शपथ लेंगे, तो उनके कंधों पर उन लाखों महिलाओं की उम्मीदों का बोझ होगा जिन्होंने उन्हें इस मुकाम तक पहुँचाया है। यह चुनाव सिर्फ एक मुख्यमंत्री चुनने के लिए नहीं था, बल्कि यह महिलाओं के उस भरोसे की जीत है जो उन्होंने एक नए नेता पर दिखाया है। अब हर राजनीतिक दल को यह समझना होगा कि बिना ‘नारी शक्ति’ के सत्ता का सपना पूरा होना नामुमकिन है।



